डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
एक सितंबर 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर सुबह से हजारों की संख्या में लोग खटीमा की सड़कों पर आ गए थे। इस दौरान ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जनसभा हुई, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक शामिल थे।जनसभा के बाद दोपहर का समय रहा होगा, सभी लोग जुलूस की शक्ल में शांतिपूर्वक तरीके से मुख्य बाजारों से गुजर रहे थे। जब आंदोलनकारी कंजाबाग तिराहे से लौट रहे थे तभी पुलिस कर्मियों ने पहले पथराव किया, फिर पानी की बौछार करते हुए रबड़ की गोलियां चला दीं। उस समय भी जुलूस में शामिल आंदोलनकारी संयम बरतने की अपील करते रहे।इसी बीच अचानक पुलिस ने बिना चेतावनी दिए अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी, जिसके परिणामस्वरूप प्रताप सिंह मनोला, धर्मानंद भट्ट, भगवान सिंह सिरौला, गोपी चंद, रामपाल, परमजीत और सलीम शहीद हो गए और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यूपी से सटा सीमांत क्षेत्र खटीमा उत्तराखंड की जननी है। यहां एक सितंबर 1994 के आंदोलन ने उत्तराखंड बनाने के लिए मार्ग प्रशस्त किया थाएक सितम्बर 1994 को उत्तराखंड में काले दिन के रूप में याद किया जाता है। हर उत्तराखंडी के जेहन में आज भी वर्ष 1994 के सितंबर महीने की पहली तारीख का वो मंजर ताजा है जब उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर सुबह से हजारों की संख्या में लोग खटीमा की सड़कों पर आ गए थे। इस दौरान ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जनसभा हुई, जिसमें बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक शामिल थे। उनकी शांतिपूर्ण आवाज दबाने के लिए पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार करते हुए निहत्थे उत्तराखंडियों पर गोली चलाई थी, जिसमें सात राज्य आंदोलनकारी शहीद हो गए थे, जबकि कई लोग घायल हुए थे। जिसके बाद ही उत्तराखंड आंदोलन ने रफ़्तार पकड़ी और इसी के परिणाम स्वरुप अगले दिन यानी दो सितम्बर को मसूरी गोली काण्ड की पुनरावृति हुई और यह आंदोलन तब एक बड़े जन आंदोलन के रूप में बदल गया। खटीमा गोली कांड के शहीदों की याद में हर वर्ष सत्ता से लेकर विरोधी दल के नेता श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए खटीमा पहुंचते हैं। लेकिन इस वीभत्स कांड के 26 साल और राज्य निर्माण के 22 वर्ष बाद भी शहीद स्मारक का निर्माण नहीं होना हर राज्य आंदोलनकारी और शहीदों के परिजनों को सालता है। गौर करने वाली बात यह है कि सीएम ने शहीद स्मारक की घोषणा की लेकिन उनकी सरकार के बाद भी परवान नहीं चढ़ी है। अलग राज्य का सपना आंदोलनकारियों की शहादत से पूरा तो हुआ लेकिन राज्य गठन से पूर्व देखे गए सपने धरे के धरे रह गए। राज्य में अराजकता, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई, बेरोजगारी, पलायन, अफसरशाही, राजशाही, भूमि विवाद, प्राधिकरण जैसे मुद्दे आज भी पहले की ही तरह हावी है। जहाँ पलायन आज भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है तो वहीँ राज्य आज भी अपनी मूलभूत सुविधाओं के लिए भटक रहा है।उतराखंड राज्य को बने भले ही बीस साल हों गये हो, लेकिन उतराखंड की जनता को अपने सपनों के इस उतराखंड के बनने का अभी इंतजार करना पड़ेगा. अब देखना होगा की सत्ता पर काबिज सरकारें इसे कब पूरा करती हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य निर्माण आंदोलन में प्राणों की आहुति देने वाले आंदोलनकारियों के बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने को सरकार प्रतिबद्ध है। राज्य के विकास को और अधिक गति देने के साथ ही पलायन की रोकथाम, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार प्राथमिकता से कार्य कर रही है। राज निर्माण के लिए सबसे पहली शहादत खटीमा की धरती पर दी गयी थी लेकिन पिछले 22 सालों में कांग्रेस-भाजपा के बारी-बारी सत्ता में आने के चक्रानुक्रम के साथ जैसा राज्य बना है,क्या ऐसे राज्य के लिए तमाम शहादतें और कुर्बानियां थी? जमीन,शराब और खनन के माफिया के वर्चस्व वाले, नेताओं-नौकरशाहों के भ्रष्टाचारी गठबंधन वाले,राज्य को देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि ऐसे जनता के हितों पर कुठाराघात करते राज्य के लिए किसी को भी शहीद होना चाहिए।हत्याकांडों के शहीदों के लिए न्याय मांगते हुए ऐसा लगता है कि उन शहीद हुए लोगों और राज्य के लिए लड़ने वालों को, सिर्फ हत्याकांडों के लिए ही न्याय नहीं चाहिए,बल्कि जैसा राज्य बन गया है,उसका इन्साफ किये जाने की भी दरकार है। शहीदों के सपनों के अनुरूप उत्तराखण्ड राज्य का विकास करने के लिए राज्य सरकार संकल्पबद्ध है. हमारे राज्य आंदोलनकारियों ने रोजगार, सड़क, शिक्षा आदि को लेकर जो सपने देखे, उन्हें पूरा करने के लिए हमारी सरकार लगातार प्रयासरत है. आने वाले 10 वर्षों में निश्चित रूप से उत्तराखंड को देश का आदर्श राज्य बनाएंगे. लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरतहैं।











