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नवरात्रि व्रत में तल्ड खाएं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं

29/09/19
in उत्तराखंड, संस्कृति, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय विजयकाल रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। नवरात्रि को स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से अत्याधिक महत्व दिया जाता है। इस समय व्रत करने से न केवल मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, बल्कि शरीर और विचारों की भी शुद्धि होती है। जिस प्रकार से हम नहाकर अपने शरीर की सफाई करते हैं। उसी प्रकार नवरात्रि के इस पावन अवसर पर शरीर के साथ-साथ विचारों की शुद्धि की जाती है। जो अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। जिस समय मौसम बदलता है। उस समय शरीर को रोगों से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाना पड़ता है। नवरात्रि पर व्रत करने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। इसलिए नवरात्रि को विशेष माना जाता है।
नवरात्रि हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। नवरात्रि में नौ दिनों तक दुर्गा माता की पूजा.अर्चना की जाती है शारदीय नवरात्र का शुभारंभ इस बार 29 सितंबर से होगा। सनातन हिंदू धर्म में नवरात्र का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में पूजा करने से भक्त पर मां भगवती की कृपा बनी रहती है। इस बार नवरात्रों में शुभ योग बन रहा है। नवरात्र में सर्वार्थसिद्धि और अमृत सिद्धि योग एक साथ बन रहे हैं। तल्ड की सब्जी तो उत्तराखण्ड में शिवरात्रि के व्रत के समय अक्सर खाने को मिलती है तथा बाजार में ठेलियों में अक्सर बिकने को आता है। उत्तराखण्ड में तो यह प्राचीन समय से ही सूखी सब्जी के रूप में खाया जाता है, जिसे स्थानीय लोग जंगलों से खोद कर लाते हैं। प्राचीन समय से ही तथा कई साहित्यों के अनुसार तल्ड निकालने का उचित समय नवम्बर से मार्च तक माना जाता है जब पौधा अधिकतम आकार प्राप्त कर चुका होता है। इस समय तल्ड के कंद में सर्वाधिक मात्रा में Diosgenise तथा Yamogenin की मात्रा पायी जाती है जिसका चिकित्सा विज्ञान अत्यधिक महत्व है। तल्ड के बेल की तरह पौधा होता है जिसमें जमीन के अन्दर कन्द बनते है जो विभिन्न आकार के होते हैं। विश्वभर में डाइसकोरिया जीनस अन्तर्गत लगभग 600 प्रजातियां आती है जो डाइसकोरेइसी परिवार से सम्बंध रखती है। उत्तराखण्ड तथा अन्य हिमालय राज्यों में तो यह जंगली रूप में ही पाया जाता है, परन्तु इसकी व्यवसायिक क्षमता देखते हुए भारत के कुछ राज्यों जैसे पंजाब, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में इसकी व्यवसायिक खेती की जाती है। विश्वभर में सामान्यतः यह Tropical क्षेत्र का पौधा है परन्तु कुछ प्रजातियां Temprate क्षेत्रों तक विस्तार पाया जाता है। तल्ड की कुछ जंगली प्रजातियां मानव स्वास्थ्य के लिए Steroidal saponins के मौजूद होने के कारण जहरीली पाई जाती है, जिसको Detoxify करके खाने योग्य बनाया जाता है। प्राचीन समय से ही खाने योग्य तल्ड तथा जहरीले तल्ड की प्रजाति की पहचान उसकी पत्तियों से की जाती है, क्योंकि खाद्य प्रजाति की पत्तियां विपरीत पाई जाती है तथा जहरीले प्रजाति में alternate पत्तियां पायी जाती है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में तो जहरीली प्रजातियां में भी मौजूद Steroidal saponins को कई रासायनिक क्रियाओं से गुजारने के बाद Steroida hormones तथा गर्भ निरोधक के लिए प्रयोग किया जाता है। चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में तल्ड का अत्यधिक महत्व है इसमें मौजूद Diosgenin की वजह से ही है जो इसका प्राकृतिक स्रोत है। तल्ड में लगभग 4.8 प्रतिशत Diosgenin पाया जाता है। जो वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में Progesterone तथा Steroid औषधि निर्माण में व्यवसायिक रूप से प्रयुक्त होता है। इसके साथ.साथ Diosgenin से Cortisone को भी Synthesis किया जाता है जो Arthritis के निवारण में प्रयुक्त होता है तथा Diosgenin से व्यवसायिक रूप Stigmasterol, Sapogenins, Cortisone, pregnenolone, Progesterone, बीटा.Sitosterol, Ergosterol बनाये जाते है जो Progestorone को Synthesis करने में सहायक होते है तथा शरीर में विटामिन D3 को Synthesis करने में भी सहायक होते है। इसी गुणवत्ता की वजह से आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में लुप्त प्रायः माने जाने वाला तल्ड जिसको की केवल किसी व्रत के मौके पर ही खाया जाता था अचानक विश्व भर में एक नयी पहचान मिलने लगी है। जिसकी वजह से विश्वभर में फार्मास्यूटिकल उद्योगों में इसकी सर्वाधिक मांग रहती है।
तल्ड में मौजूद Diosgenin जो सेक्स हॉरमोन तथा गर्भ.निरोधक के अलावा बॉडी बिल्डर्स भी शरीर में टेस्टी स्ट्रोन का स्तर बढाने के लिए प्रयोग करते हैं। फार्मास्यूटिकल उद्योग में बढती मांग की वजह से इसका अवैज्ञानिक एवं अत्यधिक दोहन होने की वजह से रेड डाटा बुक ऑफ इण्डियन प्लाट्स ने Vulnerable पौधों की श्रेणी में रखा है। सन् 1998 में मोलर तथा वॉकर के सर्वे के अनुसार जंगलों में तल्ड की 80 प्रतिशत संख्या कम हो गयी है और तभी से इसे आशंकित पौधों की श्रेणी में रखा गया था। Convention on International trade in Endangered species (CITES) के अनुसार जंगलों से उत्पादित सभी उत्पादों के निर्यात पर रोक लगा दी गयी केवल व्यवसायिक रूप से उत्पादित उत्पादों को ही Legal Procurement Certificate (LPC) दिया जाता था। सन् 1997 से 2002 तक भारत की आयात.निर्यात नीति के तहत तल्ड तथा तल्ड से उत्पादित उत्पादों का फार्मालेशन के सिवाय पूर्णतः रोकथाम लगा दी गयी थी। यदि तल्ड की पोष्टिकता की बात की जाय तो यह औषधीय गुणों के साथ.साथ पोष्टिकता के रूप में भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है इसमें प्रोटीन 3.40 प्रतिशत, फाइबर.7.50 प्रतिशत, वसा.1.20 प्रतिशत तथा कार्बाहाइड्रेट. 22.6 प्रतिशत तक पाये जाते है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में एक कि0ग्रा0 सूखे तल्ड की कीमत 58.65 डॉलर तक पायी जाती है। उत्तराखण्ड हिमालय राज्य होने के कारण बहुत सारे बहुमूल्य उत्पाद जिनकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अत्यधिक मांग रहती है। प्राकृतिक रूप से जंगलों में पाये जाते है। इसका विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन तथा व्यवसायिक क्षमता का आंकलन कर यदि नवरात्रि सूखी सब्जी के रूप में खाया जाता अत्याधिक महत्व दिया जाता तो व्यवसायिक खेती की जाय तो यह प्रदेश की आर्थिकी का बेहतर साधन बन सकती है । उत्तराखंड में इसका इस्तेमाल नवरात्रि के तौर पर भी किया जाता है। ऐसी वनस्पतियों को यदि रोजगार से जोड़े तो शायद इसमें मेहनत भी कम हो सकती है वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रोटीन के लिए एक वयस्क की दैनिक आवश्यकता लगभग 90 ग्राम है। उपवास के दौरान, शरीर में प्रोटीन खाद्य पदार्थों का सेवन तेजी से कम हो जाता है। सोया और अन्य फलियां, सूरजमुखी के बीज, मशरूम, नट्स के कारण पशु प्रोटीन की कमी के लिए मुआवजा, जो उनके अमीनो एसिड संरचना में मांस उत्पादों के बहुत करीब हैं।
इसके अलावा, प्रोटीन भोजन की कमी उन लोगों को स्थानांतरित करना आसान है जो पर्याप्त नींद लेते हैं और बहुत समय बाहर बिताते हैं सब्जी के रूप में खाया जाता तो मांग दैनिक आवश्यकता व्यवसायिक रूप जब हम उत्तराखंड के संसाधनों की बात कर रहे हैंए तो हम एक ऐसे भूगोल की बात कर रहे हैं जो विविधता से भरा हुआ है। उत्तराखंड के पास गंगा.यमुना मैदान का उत्तरी छोर है जिसको हम तराई कहते हैं वह बहुत उपजाऊ है। सबसे बड़ा जमीनी संघर्ष वहीं है और वहीं से उत्तराखंड राज्य न बनने के स्वर बुलंद हुए। इस उत्तराखंड में जरा और आगे जाते हैं तो भाभर का इलाकाए दून का इलाका आता है। दून हमारे इलाके में बहुत विशेष है, क्योंकि नेपाल की तरफ वह गुम हो जाता है और जम्मू की तरफ जाते.जाते वह बहुत दूसरे किस्म का रूप ले लेता है। इसके बाद फिर हम पहाड़ों में घुसते हैं। बाहरी हिमालय से चलते.चलते उच्च हिमालय तक चले जाते हैं। जिसमें उत्तराखंड की बहुल जनसंख्या निवास करती है। इस दौरान आलू, शकरकंद, अरबी, सूरन, गाजर, खीरा और लौकी जैसी सब्जियों को खाने की सलाह दी जाती है। जोकि उत्तराखण्ड में पारम्परिक एवं अन्य फसलों के साथ सुगमता से लगाया जा सकता है जिससे एक रोजगार परक जरिया बनने के साथ साथ इसके संरक्षण से पर्यावण को भी सुरक्षित रखा जा सकता हैए ताकि इस बहुमूल्य सम्पदा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिकी का जरिया बनाया जा सके। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में अगर की खेती वैज्ञानिक तरीके और व्यवसायिक रूप में की जाए तो यह राज्य की आर्थिकी का एक बेहतर पर्याय बन सकता है।

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