डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौन्दर्य ही नहीं रसीले फलों के लिए भी जाना जाता है. जिसने एक बार पर्वतीय क्षेत्रों के फलों को चख लिया उसका स्वाद लोगों की जुबां से उतरता ही नहीं हैं. उत्तराखंड की पहाड़ी वादियों में पैदा होने वाले फलों के फल अब मैदानी क्षेत्रों में भी पहुंचने लगे हैं. नैनीताल और अल्मोड़ा क्षेत्रों के फल आड़ू, खुमानी, पुलम और लीची बाजार में छाए हुए हैं. जिनकी लोग हाथों हाथ खरीददारी कर रहे हैं. पहाड़ी फलों के मैदानी क्षेत्र में बेहतर दाम मिल रहा है लेकिन उस उत्पादकता कम होने की वजह से किसान मायूस भी हैं ।हल्द्वानी मंडी में रोजाना 2 करोड़ रुपए की पहाड़ी फलों की आवक है जो कि मैदानी इलाकों में निर्यात किए जा रहे हैं ।फल सब्जी आढ़ती एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है कि गर्मी में पहाड़ी फलों की डिमांड मैदानी इलाकों में दूर-दूर तक होती है लिहाजा किसानों को धान तो कहते मिल रहे हैं लेकिन उत्पादन कम होने की वजह से इस वर्ष किसानों को नुकसान भी हुआ है। अप्रैल जैसे गर्मी के महीने में भी भारत के कई राज्यों में तूफानी मौसम देखने को मिला. जहां इस मौसम ने कई राज्यों को राहत दी वहीं कई राज्यों में भारी और तूफानी बारिश का कहर टूटा. बता दें कि बुधवार सुबह पूरे ज़िले में हुई बारिश ने किसानों को मुश्किल में डाल दिया और उनकी महीनों की मेहनत को बर्बाद कर दिया. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि मैदानी इलाकों में, गेहूं की खड़ी फसलें जो कटाई के लिए तैयार थीं और जो फसलें पहले ही काटी जा चुकी थीं, दोनों ही बारिश के पानी में भीगने से बर्बाद हो गईं. साथी ही, पहाड़ी इलाकों में, ओलावृष्टि की वजह से आड़ू, आलू और बेर जैसी फसलों पर चोट के निशान और धब्बे पड़ गए हैं. सीधा-सीधा मार्किट में पहुँचने से पहले फलों को भी भारी नुकसान हुआ है. लगभग 65% कृषि वर्षा पर निर्भर है, जो इसे मौसम की समस्याओं के प्रति बेहद संवेदनशील बनाता है। 2025 में पहले ही कई राज्यों में बेमौसम बारिश और हीटवेव्स जैसी चरम मौसम की घटनाओं ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है, जिससे टमाटर, प्याज और आलू जैसी मुख्य खाद्य पदार्थों की कमी हुई और कीमतें बढ़ीं। न्यूनतम समर्थन मूल्य) प्रणाली, जो एक न्यूनतम मूल्य की गारंटी देती है, किसानों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने या उन्हें आधिकारिक क्रॉप इंश्योरेंस या फ्यूचर्स मार्केट (का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करने में ज्यादा मदद नहीं कर रही है। इससे कृषि क्षेत्र की जोखिम झेलने की क्षमता कमजोर हो रही है। लगभग 80% भारतीय किसान छोटे भू-भाग पर खेती करते हैं और जलवायु जोखिमों का सामना करते हैं, उनकी अनुकूलन क्षमता सिंचाई की कमी और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण सीमित है। इससे ग्रामीण इलाकों से पलायन बढ़ रहा है। सीधे कृषि नुकसान से परे, वर्तमान गर्म मौसम के पैटर्न हिमालयी क्षेत्र में व्यापक पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याओं को बढ़ा रहे हैं। उत्तराखंड में जंगल की आग की घटनाओं में काफी वृद्धि देखी गई है, नवंबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 54 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसके बाद फरवरी के मध्य से मार्च मध्य तक 60 और घटनाएं हुईं, जिन्होंने हेक्टेयर जंगल भूमि को नुकसान पहुंचाया। इन गर्म सर्दियों का मतलब पानी की उपलब्धता में कमी भी है। रीना देवी ने बताया कि उनके यहां नल में पानी का बहाव कम हो गया है, जिससे उन्हें पीने के पानी के लिए दूर जाना पड़ता है। उच्च तापमान सीधे तौर पर किसानों की काम करने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है, उन्हें गर्मी के कारण अपने दैनिक कार्यक्रम बदलने पड़ रहे हैं। बड़े पैमाने पर, जलवायु परिवर्तन उन समुदायों के लिए बड़े सामाजिक और आर्थिक खतरे पैदा कर रहा है जो मौसम पर निर्भर उद्योगों, जैसे हिमालय में खेती, वानिकी और पर्यटन पर बहुत अधिक निर्भर हैं। कमजोर वर्ग अपनी सीमित क्षमता, गरीबी और खराब बुनियादी ढांचे के कारण अधिक जोखिम में हैं। पूर्वानुमान बताते हैं कि हीट स्ट्रेस के कारण काम के घंटों में बड़ी गिरावट आ सकती है, जिससे लाखों नौकरियां खत्म हो सकती हैं और भारत को भारी आर्थिक नुकसान हो सकता है। ये जलवायु, कृषि और पर्यावरणीय समस्याएं एक दुष्चक्र बनाती हैं जो भेद्यता को बढ़ाती है, दीर्घकालिक आजीविका और क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डालती है। ओलावृष्टि होने के कारण किसानों को भारी नुकसान हुआ है. खासतौर पर फल उगाने वाले इलाके ज्यादा प्रभावित हुए हैं. सबसे ज्यादा नैनीताल में इसका असा देखने को मिला. रिपोर्ट्स के मुताबिक नैनीताल ज़िले में ही, लगभग 19,000 हेक्टेयर ज़मीन पर गेहूं की खेती की जाती है. मौसम में आए इस अचानक और भारी बदलाव से किसान बहुत चिंतित हैं. भारी बारिश की वजह से खेतों में खड़ी गेहूं की फसलें पूरी तरह से भीग गई हैं, जिससे कटाई के काम में काफी दिक्कतें आने की उम्मीद है. उत्तराखंड में खराब मौसम का यह दायरा केवल वीकेंड तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सप्ताह के पहले दिन यानी सोमवार को भी मौसम के मिजाज में कोई बदलाव नहीं होगा. मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अप्रैल को राज्य के उन्हें पांच सीमांत जिलों उत्तरकाशी से पिथौरागढ़ तक हल्की से मध्यम बारिश और 3300 मीटर की ऊंची चोटियों या इससे ऊपर बर्फबारी है. इसके अलावा शेष आठ जिलों देहरादून, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में भी बारिश की है. उत्तराखण्ड में नैनीताल के ओखलकांडा, धारी और रामगढ़ क्षेत्र के कई गांवों में भीषण ओलावृष्टि ने भारी तबाही मचा दी है।यहां किसानों की मेहनत पर पानी फिर गया है, इससे आलू, मटर, सेब, नाशपाती, प्लम, आड़ू और नाशपाती, चुस्किया जैसी फल फूल बुरी तरह से बर्बाद हो गई हैं।आपदा पहाड़ की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों के लिए अब गहरा संकट पैदा हो गया है। अब उनके सामने आजीविका और भविष्य दोनों पर खतरा मंडरा रहा है। मौसम के बदले हालात के बीच हुई बेमौसमी बर्फबारी-ओलावृष्टि ने फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। राज्य के कई क्षेत्रों में सेब सहित अन्य फल फसलों को भारी नुकसान हुआ है। बागबानों का कहना है कि इस बार केवल आगामी सीजन ही नहीं, बल्कि कई वर्षों की मेहनत और कमाई भी दांव पर लग गई है। राज्य के कई क्षेत्रों में भारी बर्फबारी के कारण पेड़ों पर जमी मोटी बर्फ का भार इतना अधिक हो गया कि पेड़ों की टहनियां और कई जगह सेब के पौधे टूट गए हैं। इन पेड़ों पर लगे फूल और कलियां भी बर्बाद हो गई हैं, इससे इस साल उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। इस अप्रैल के तीसरे हफ्ते में हुई बारिश और बर्फ़बारी ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के खेतों-बगीचों में कहर ढा दिया है। बागवान और किसान रुआंसे हो गए हैं। कहते हैं कि प्रकृति की बुरी मार पड़ी है। जनवरी से मार्च तक सूखा झेल रहे थे। जब बारिश की जरूरत थी, एक बूंद नहीं गिरी और अब सब कुछ नष्ट कर गई।। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












