डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में साल 2025 भी खेती किसानी के लिए कुछ खास उत्साह वाला नहीं रहा. आंकड़े बताते हैं कि तमाम उत्पादों में गिरावट आई और खासतौर पर गढ़वाल मंडल में फसलों के उत्पादन में गिरावट देखी गई. जाहिर है कि कम होती कृषि भूमि के बीच तमाम फसलों के उत्पादन में देखी जा रही कमी, खेती के लिहाज से निराशाजनक रही है. आइए जानते हैं उत्तराखंड में कृषि को लेकर उत्पादन की दृष्टिकोण से क्या कहते हैं आंकड़े?साल 2025, खेती-किसानी के लिहाज से सरकारी आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि राज्य में कई प्रमुख फसलों के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है. खासतौर पर गढ़वाल मंडल में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक रही. जहां पहले से ही सीमित संसाधनों के बीच खेती करना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है. उत्पादन में कमी के साथ-साथ तेजी से घटती कृषि भूमि ने भविष्य की चिंताओं को और गहरा कर दिया है.वैसे तो उत्तराखंड की बड़ी आबादी आज भी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है, लेकिन इस क्षेत्र में सुधार के बजाय हालात लगातार बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं. पर्वतीय जिलों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवनशैली का अहम हिस्सा रही है. बावजूद इसके, बदलते मौसम, जंगली जानवरों का बढ़ता खतरा, सिंचाई सुविधाओं की कमी और सरकारी योजनाओं का अपेक्षित लाभ न मिल पाने के कारण किसान हतोत्साहित हो रहे हैं. कृषि विभाग के मुताबिक, अगर सालाना आंकड़ों के जरिए फसलों की स्थिति को समझा जाए तो तस्वीर और भी साफ हो जाती है. साल 2025 में उत्तराखंड में आलू का कुल उत्पादन 1 लाख 29 हजार 920 मीट्रिक टन दर्ज किया गया. यह आंकड़ा साल 2024 के 1 लाख 24 हजार 351 मीट्रिक टन से थोड़ा बेहतर जरूर है, लेकिन जब इसे साल 2023 के 1 लाख 33 हजार 485 मीट्रिक टन और साल 2022 के 1 लाख 53 हजार 620 मीट्रिक टन से तुलना की जाती है, तो साफ दिखता है कि बीते तीन वर्षों में आलू के उत्पादन में करीब 23 हजार मीट्रिक टन से अधिक की गिरावट आ चुकी है. यह गिरावट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ा है. दालों के उत्पादन में भी यही कहानी दोहराई गई. साल 2025 में राज्य में 48 हजार 56 मीट्रिक टन दालों का उत्पादन हुआ. यह आंकड़ा भले ही साल 2024 के 46 हजार 777 मीट्रिक टन से थोड़ा ज्यादा हो, लेकिन साल 2023 में दालों का उत्पादन 53 हजार 658 मीट्रिक टन और साल 2022 में 57 हजार 231 मीट्रिक टन रहा था. यानी महज तीन साल में दालों के उत्पादन में करीब 9 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई है. कमी के ये आंकड़े केवल आलू और दालों तक सीमित नहीं हैं, अदरक, मटर, चावल और कई अन्य फसलों में भी साल 2025 के आंकड़े बीते वर्षों के मुकाबले कमजोर नजर आते हैं. खास तौर पर गढ़वाल क्षेत्र में अदरक और आलू जैसी नकदी फसलों का उत्पादन तेजी से घटा है. किसानों का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में जिस तरह की योजनाएं और प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं, वे जमीनी स्तर पर पर्याप्त साबित नहीं हो रहे. अगर गेहूं के उत्पादन पर नजर डालें तो यहां कुछ हद तक राहत की तस्वीर जरूर दिखाई देती है. साल 2025 में उत्तराखंड में गेहूं का कुल उत्पादन 9 लाख 39 हजार 263 मीट्रिक टन रहा. यह आंकड़ा साल 2024 के 8 लाख 62 हजार 423 मीट्रिक टन और साल 2023 के 8 लाख 31 हजार 575 मीट्रिक टन से अधिक है. इस तरह गेहूं के मामले में उत्पादन में बढ़ोतरी देखी गई है, जिसे संतोषजनक कहा जा सकता है. लेकिन चावल के उत्पादन में स्थिति फिर से निराशाजनक हो जाती है. साल 2025 में राज्य में चावल का कुल उत्पादन 5 लाख 85 हजार 455 मीट्रिक टन रहा, जबकि साल 2024 में यह 6 लाख 72 हजार 166 मीट्रिक टन था. इससे पहले साल 2023 में 6 लाख 40 हजार 997 मीट्रिक टन और साल 2022 में 7 लाख 8 ह जार 888 मीट्रिक टन चावल का उत्पादन हुआ था. यानी साल 2022 की तुलना में 2025 में चावल के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है. खेती को लेकर बढ़ती निराशा को किसान खुद अपनी जुबान से बयां कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि मौजूदा हालात में खेती फायदे का सौदा नहीं रह गई है. जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नुकसान, बाजार में उचित दाम न मिलना और लागत का लगातार बढ़ना किसानों को खेती छोड़ने पर मजबूर कर रहा है. उनका मानना है कि अगर समय रहते ठोस बदलाव नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में खेती की स्थिति और भी खराब हो सकती है. सिंचाई सुविधाओं की कमी हालात को और गंभीर बनाते हैं. राज्य की कुल कृषि भूमि में से केवल करीब 3.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है. पर्वतीय इलाकों में बारिश पर निर्भर खेती होने के कारण मौसम की मार का सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है. इसके साथ ही जंगली जानवरों की समस्या भी किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है. पहाड़ों में बंदर, सूअर और अन्य वन्यजीव फसलों को बर्बाद कर रहे हैं, तो मैदानी इलाकों में हाथियों का आतंक बढ़ता जा रहा है. पशुपालन भी अब सुरक्षित नहीं रहा, क्योंकि जंगली जानवरों के हमलों से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. कुल मिलाकर साल 2025 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अगर खेती को बचाने के लिए बड़े और ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो उत्तराखंड में कृषि का भविष्य और भी संकट में पड़ सकता है. किसानों को प्रोत्साहन, सुरक्षा और सुविधाएं देने के साथ-साथ कृषि भूमि को बचाना आज सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है. बारिश का इंतजार जल्द खत्म नहीं होता है, तो हालात सूखे जैसे हो जाएंगे। इससे किसानों को भारी नुकसान होगा और खेती-बाड़ी पर निर्भर लोगाें को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ेगा। अभी तक बारिश नहीं होने के कारण तापमान में भी गिरावट नहीं आई है बारिश का इंतजार जल्द खत्म नहीं होता है, तो हालात सूखे जैसे हो जाएंगे। इससे किसानों को भारी नुकसान होगा और खेती-बाड़ी पर निर्भर लोगाें को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ेगा। अभी तक बारिश नहीं होने के कारण तापमान में भी गिरावट नहीं आई है उत्तराखंड की पहाड़ी कृषि, जो इसकी लगभग 80% ग्रामीण आबादी की जीवनरेखा है, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न संकट से जूझ रही है।। आज भी काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर है। सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए विकसित किए गए नए बीजों के बावजूद मानसून की बारिश अब भी खेती की सफलता का अहम निर्धारक बनी हुई है। बारिश के पैटर्न में बदलाव, सूखा पड़ने या अत्यधिक वर्षा होने से फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है और कीट व बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। सामान्य या अच्छी वर्षा से खेती की उत्पादकता बढ़ती है, जबकि असमान वर्षा से कृषि क्षेत्र को गंभीर नुकसान उठाना पड़ता है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











