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उत्तराखंड में पहाड़ की राह नहीं चढ़ पा रहा विकास

19/12/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
एक लंबे जन आंदोलन के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। लेकिन, राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी प्रदेश का पहाड़ी क्षेत्र विकास को तरस रहा है। उत्तराखंड का विकास केवल मैदान के तीन जिले देहरादून, हरिद्वार व ऊधसिंहनगर तक सिमटकर रह गया है। नेताओं के विकास के वादे दशकों बाद भी पहाड़ की राह नहीं चढ़ पा रहे हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य, शिक्षा व रोजगार के अभाव में पहाड़ से लगातार पलायन का दौर जारी है। वर्तमान में वन्यजीव के हमले व आपदा भी पहाड़ियों की जान पर भारी पड़ रही है।पहाड़ पर उद्योग चढ़ाने के सरकार के प्रयास तो पूरी तरह परवान नहीं चढ़ पा रहे हैं, लेकिन अब डाटा सेंटर पार्क बनाने के प्रस्ताव पर मंथन किया जा रहा है. राज्य में आईसीटी इलेक्ट्रोनिक पॉलिसी तैयार की जा रही है. जिसके तहत डिजीटल दुनिया से जुड़ी कंपनियों को पहाड़ पर अपने डाटा सेंटर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा ताकि रोज़गार भी बढ़े.पर्वतीय विकास को लेकर राज्य सरकार कई प्रयोग कर रही है. इसी के चलते अब पहाड़ पर डाटा सेंटर पार्क बनाने की तरफ भी मंथन किया जा रहा है. राज्य सरकार ने पहाड़ पर औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए एमएसएमई पॉलिसी भी लागू की है, लेकिन उसका उम्मीद के मुताबिक नतीजा नहीं मिल पा रहा है.आटी सचिव का कहना है कि सरकार पॉलिसी पर काम कर रही है. इससे राज्य में पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के रास्ते खुलेंगे. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग नीति के तहत पहाड़ पर नए उद्यम ज्यादा नहीं स्थापित हो पा रहे हैं. इसके अलावा अब आईटी विभाग के जरिये पहाड़ पर डाटा सेंटर पार्क बनाने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है. जिसके तहत ई-बिज़नेस और डिजीटल वर्लड्स से जुड़ी कंपनियां अपना डाटा सेंटर उत्तराखंड में बना सकेंगी. इसमें जरुरत के मुताबिक उत्तराखंड से कुशल युवाओं को रोज़गार भी मिल सकेगा.दरअसल डाटा सेंटर पार्क एक ऐसा कंसेप्ट है, जिसके तहत कंपनियां अपना सारा डाटा एक स्थान पर स्टोर करती हैं. ये इलेक्ट्रोनिक और डिजीटल डाटा स्टोर करने के लिए बड़े केंद्र में सर्वर स्थापित करने पड़ते हैं. इसमें सेटेलाईट नेटवर्किंग की उपलब्धता अहम होती है और इसमें किसी प्रकार के मालवाहक वाहनों का आवागमन ज्यादा नहीं होता है. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के संगठन से जुड़े लोग सरकार की इस प्रयास को अच्छा मान रहे हैं. इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है कि डाटा सेंटर पार्क की स्थापना पहाड़ पर सुरक्षा और सामाजिक नजरिये से अच्छा विकल्प हो सकता है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में पहाड़ पिछड़ता जा रहा था। विकास की किरण पहाड़ तक नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में पहाड़ियों के मन में एक अलग राज्य की भावना जागी। लंबे संघर्ष व सैकड़ों शहादत के बाद जब 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ तो पूरा पहाड़ खुशी से झूम उठा। हर कोई अपने प्रदेश के बेहतर विकास का सपना देख रहा था। लेकिन, आज तक यह सपना धरातल पर रंग नहीं ला पाया। त्तराखंड ने 2018 से 2023 के बीच किसानों की आय दोगुनी करने में सफलता हासिल की है, इस तथ्य के बल पर यह देश का पहला शून्य-गरीबी वाला राज्य बनने की आकांक्षा भी रख सकता है. वास्तव में, कुल गरीबी अनुपात पहले ही 10 प्रतिशत से कम है—31 मई इस साल के अनुसार यह ठीक 9.67 प्रतिशत है. जिलेवार विभाजन और भी स्पष्ट है. जितना यह विरोधाभासी लग सकता है, पहाड़ी जिले हरिद्वार और उधम सिंह नगर के मैदान जिलों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन कर चुके हैं. राज्य का औसत हरिद्वार की 16.2 प्रतिशत गरीबी दर और उधम सिंह नगर की 11.26 प्रतिशत दर से नीचे खींचा गया है. जाहिर है कि हरिद्वार में लगभग 22 लाख और उधम सिंह नगर में लगभग 16 लाख लोग रहते हैं, जो राज्य की सबसे बड़ी और तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले जिले हैं.इसका अर्थ यह है कि यदि राज्य इन जिलों में संवेदनशील क्षेत्रों और जनसंख्या का मानचित्रण करने पर ध्यान केंद्रित करता है, जहां अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक जनसंख्या का प्रतिशत भी अधिक है, तो रोजगार, सूक्ष्म उद्यम और औद्योगिक क्षेत्रों में कौशल विकास के लिए जीवनयापन में परिवर्तनकारी बदलाव लाना संभव हो सकता है. यह काम राज्य के बड़े कृषि क्षेत्रों में श्रम बढ़ाने वाले उपकरण और उत्पादन बढ़ाने वाले उपकरण के साथ किया जा सकता है.इसके लिए एक अलग तरह की कल्पना की जरूरत है: आवंटन का उपयोग अवसंरचना को मजबूत करने के लिए करना, कृषि की प्रोफ़ाइल को ज्यादा कीमत वाली फसलों, डेयरी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और 25 किमी के भीतर बाजारों के लिए खेत के पास मूल्य संवर्धन की ओर स्थानांतरित करना. ट्रैक्टर और हल्के व्यावसायिक वाहन के लिए लीज़िंग नीति, राज्य की अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विकास वित्त निगम की मिलती-जुलती सहायता के साथ, खेत से बाजार तक मूल्य असमानता को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है.विकास के मामले में पहाड़ व मैदान के बीच एक गहरी खाई बन गई। पलायन आयोग की रिपोर्ट बताती है कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड की करीब 60 प्रतिशत आबादी यानि 32 लाख लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। रिपोर्ट कहती है कि उत्तराखंड के 17 सौ गांव भूतहा हो चुके हैं। जबकि, करीब एक हजार गांव ऐसे हैं, जहां सौ से कम लोग बचे हैं। कुल मिलाकर 3900 गांव से पलायन हुआ है।वर्ष 2024 में उत्तराखंड में बेरोजारों की संख्या 8 लाख 83 हजार 3 सौ 46 पहुंच गई है। यही नहीं सेवा योजन कार्यालय में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में13.2 प्रतिशत बेरोजगारी दर है। प्रदेश में पेपर लीक व नौकरी में धांधली के मामले भी प्रकाश में आ चुके हैं। सरकार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास कर रही है। लेकिन, रफ्तार काफी सुस्त है। पहाड़ी लोग, जिनकी आजीविका कृषि पर निर्भर है, दिन-रात अथक परिश्रम करते हैं और कई प्रकार की फसलें उगाते हैं। हालांकि, जंगली सूअर, भालू, बंदर आदि जैसे जंगली जानवरों के आतंक के कारण उनकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है। ये जंगली जानवर रात के समय फसलों को नष्ट कर देते हैं। इस क्षेत्र में अक्सर जंगली तेंदुए दिखाई देते हैं, जो जीवन के लिए गंभीर खतरा हैं। हर साल सैकड़ों लोग तेंदुए के हमले में अपनी जान गंवा देते हैं। इसलिए, जंगली जानवरों से होने वाले कृषि नुकसान से बचने और इस भय से दूर शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए ये लोग मैदानी इलाकों में पलायन कर जाते हैं। राज्य बनने के बाद युवाओं ने सोचा था, अब अपने ही राज्य में नौकरी के लिए अवसर मिलेंगे, परंतु सरकारी भर्तियों का हाल सबके सामने है, या तो सालों तक परीक्षाएँ नहीं होतीं, और जब होती हैं, तो पेपर लीक की खबरें सामने आ जाती हैं। मेहनत करने वाला युवा सिस्टम से हारता हुआ नजर आ रहा हैं। विकास के नाम पर जो हो रहा है, उसने पहाड़ों की रूह को घायल कर दिया है। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाएँ तेज़ी का प्रतीक ज़रूर हैं, लेकिन इनकी कीमत पर जंगलों का अस्तित्व मिटा दिया गया।हजारों पेड़ काटे गए, पहाड़ों का पेट चीर दिया गया, और अब वही इलाके हर बरसात में भूस्खलन का शिकार बन रहे हैं। जहाँ कभी हवा में देवदार की खुशबू थी, अब वहाँ धूल और मशीनों की गड़गड़ाहट है।राजधानी देहरादून और कुछ शहर जरूर चमके हैं, पर पहाड़ों के गाँव आज भी खाली हो रहे हैं। बुजुर्ग अकेले हैं, खेत बंजर हैं, और नौजवान मैदानों में रोज़गार ढूँढने को मजबूर हैं। शिक्षा का हाल भी चिंता का विषय है-स्कूल हैं, पर शिक्षक नहीं। कॉलेज हैं, पर दिशा नहीं।25 बरसों का ये सफर बहुत कुछ सिखा गया- विकास सिर्फ सड़कों और इमारतों का नहीं होता, विकास तब होता है जब कोई युवा बेरोज़गार न रहे, जब कोई माँ अपने बेटे को पलायन के लिए रवाना न करे। अब वक्त है कि उत्तराखंड फिर से अपने लोगों का राज्य बने,वरना ये पहाड़ एक दिन सिर्फ यादों में रह जाएंगे। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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