डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जल ही जीवन है कहते हम थकते नहीं मगर जल बचाने के लिए कुछ करते धरते भी नहीं। शायद यह सोचकर चुप बैठ जाते है कि मेरा पडोसी जल बचाएगा मुझे क्या जरुरत है। हमारी यही दकियानुसी सोच हमें बबार्दी की और ले जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब हमारे प्यासे मरने की नौबत आ जाएगी। तब तक बहुत देर हो जाएगी। भारत सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की माने तो देश इस समय भीषण जल संकट से गुजर रहा है और इस आसन्न संकट पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो हालत बदतर होने की सम्भावना है।नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार भारत अब तक के सबसे बड़े जल संकट से जूझ रहा है। आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के करीब 60 करोड़ लोग पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। करीब 75 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। साथ ही, देश में करीब 70 प्रतिशत पानी पीने लायक नहीं है। आयोग का कहना है कि इस संकट के चलते लाखों लोगों की आजीविका और जिंदगी खतरे में है। आयोग ने चेतावनी भी दी है कि हालात और बदतर होने वाले हैं। उसके मुताबिक साल 2030 तक देश में पानी की मांग मौजूदा आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है। साफ और सुरक्षित पानी नहीं मिलने की वजह से हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत होती है। रिपोर्ट में कहा गया है प्रदूषण के मुद्दे पर लोगों को जागरूक करने के लिए जिस तरह मीडिया कैंपेन चलाए गए हैं, समय आ गया है कि पानी के मुद्दे पर भी उसी तरह कैंपेन चलाए जाएं । गौरतलब है जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत दुनिया के 122 देशों में 120वें स्थान पर है।जल की उपलब्धता को लेकर वर्तमान में भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व चिन्तित है। जल ही जीवन है। जल के बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव का अस्तित्व जल पर निर्भर करता है। पृथ्वी पर कुल जल का अढ़ाई प्रतिशत भाग ही पीने के योग्य है। इनमें से 89 प्रतिशत पानी कृषि कार्यों एवं 6 प्रतिशत पानी उद्योग कार्यों पर खर्च हो जाता है। शेष 5 प्रतिशत पानी ही पेयजल पर खर्च होता है। यही जल हमारी जिन्दगानी को संवारता है।आँकड़े बताते हैं कि विश्व के पौने 2 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। आज विश्व में जल का संकट सर्वत्र व्याप्त है। विश्व में चहुंमुखी विकास का दिग्दर्शन हो रहा है। किंतु स्वच्छ जल मिल पाना कठिन हो रहा है। साफ जल की अनुपलब्धता के चलते ही जल जनित रोग महामारी का रूप ले रहे हैं। इंसान जल की महत्ता को लगातार भूलता गया और उसे बर्बाद करता रहा, जिसके फलस्वरूप आज जल संकट सबके सामने है। देश के कई हिस्सों में अभी से जबरदस्त जल संकट गहरा गया है। जनसंख्या के भारी विस्फोट के साथ कल-कारखाने, उद्योगीकरण और पशुपालन को बढ़ावा दिया गया, उस अनुपात में जल संरक्षण की ओर ध्यान नहीं गया, जिस कारण आज गिरता जल स्तर बेहद चिंता का कारण बना हुआ है। एक रपट में बताया गया है कि पृथ्वी के जलमण्डल का 97.5 प्रतिशत भाग समुद्रों में खारे जल के रूप में है और केवल 2.4 प्रतिशत ही मीठा पानी है ।धरती के क्षेत्रफल का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से भरा हुआ है। परंतु, पीने योग्य जल मात्र तीन प्रतिशत है। इसमें से भी मात्र एक प्रतिशत मीठे जल का ही वास्तव में हम उपयोग कर पाते हैं। पानी का इस्तेमाल करते हुए हम पानी की बचत के बारे में जरा भी नहीं सोचते, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश जगहों पर जल संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है। जल का संकट एवं विकट स्थितियां अति प्राचीन समय से बनी हुई है। इसी कारण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश आदि प्रांतों में जल संरक्षण के लिये नाड़ी, तालाब, जोहड़, बन्धा, सागर, समंद एवं सरोवर आदि बनाने की प्राचीन परम्परा रही है। राजा-महाराजाओं तथा सेठ-साहूकारों ने अपने पूर्वजों की स्मृति में अपने नाम को चिरस्थायी बनाने के उद्देश्य से इन प्रदेशांे के विभिन्न भागों में कलात्मक बावड़ियों, कुओं, तालाबों, झालरों एवं कुंडों का निर्माण करवाया। जहाँ प्रकृति एवं संस्कृति परस्पर एक दूसरे से समायोजित रही हैं। राजस्थान के किले तो वैसे ही प्रसिद्ध हैं पर इनका जल प्रबन्धन विशेष रूप से अनुकरणीय हैं। जल संचयन की परम्परा वहाँ के सामाजिक ढाँचे से जुड़ी हुई हैं तथा जल के प्रति धार्मिक दृष्टिकोण के कारण ही प्राकृतिक जलस्रोतों को पूजा जाता है। जल की कमी दुनिया के लिए एक उभरती हुई वास्तविकता एवं ज्वलंत समस्या है। चूंकि जलवायु परिवर्तन और जल की कमी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए इनमें से किसी एक मुद्दे का मुकाबला करने के तरीके खोजने से दूसरे की बेहतरी में मदद मिलेगी, इसमें ग्लेशियर संरक्षण जल संकट का प्रभावी समाधान हो सकता है।नदियां मात्र जलधाराएं नहीं हैं, वे जीवन की धमनियां हैं, सभ्यता की जननी हैं और प्रकृति का शाश्वत उपहार हैं। मानव सभ्यता का इतिहास गवाह है कि हर संस्कृति और हर महान नगरी का उदय नदियों के तट पर हुआ। गंगा, सिंधु, नील, अमेज़न, यांग्त्सी जैसी नदियाँ केवल भूगोल का निर्माण ही नहीं करतीं, बल्कि कृषि, व्यापार, परिवहन, ऊर्जा, आस्था और संस्कृति को भी दिशा देती हैं। विश्व स्तर पर हर वर्ष सितंबर के चौथे रविवार को मनाया जाने वाला विश्व नदी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि नदियां हमारी अस्तित्व-रेखा हैं और उनका संरक्षण करना किसी विकल्प का नहीं बल्कि हमारे जीवन के अस्तित्व का प्रश्न है। 2005 में, संयुक्त राष्ट्र के ‘जीवन के लिए जल दशक’ की शुरुआत के उपलक्ष्य में, नदी अधिवक्ता मार्क एंजेलो ने विश्व नदी दिवस के गठन का प्रस्ताव रखा। यह अंतर्राष्ट्रीय प्रयास कनाडा में 1980 में एंजेलो द्वारा शुरू किए गए बीसी नदी दिवस की सफलता से प्रेरित था। विश्व नदी दिवस नदियों के महत्व को रेखांकित करता है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नदियों की बेहतर देखभाल-संरक्षण-संवर्धन का समर्थन करते हुए जन जागरूकता बढ़ाने का प्रयास करता है। इस वर्ष की थीम ‘हमारी नदियाँ, हमारा भविष्य’ है, जो नदियों की रक्षा, जल अधिकारों को बनाए रखने और नदी प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की आवाज को सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर केंद्रित है।संयुक्त राज्य अमेरिका का लगभग 65 प्रतिशत पेयजल नदियों से आता है, इसी तरह भारत सहित अनेक देशों में पेयजल का मुख्य स्रोत नदियां ही है। नदियां हमें बिजली पैदा करने, फसलों को पानी देने और पीने योग्य पानी उपलब्ध कराती हैं। यही कारण है कि एम्स्टर्डम, बैंकॉक और बर्लिन जैसे समृद्ध शहर नदियों के किनारे बसे हैं। दुर्भाग्य यह है कि जिन नदियों ने हमें जीवन दिया, हमने उन्हीं को प्रदूषण और विनाश की गर्त में धकेल दिया। औद्योगिक इकाइयों का रासायनिक कचरा, नगरों का गंदा पानी, प्लास्टिक और घरेलू अपशिष्ट ने नदियों को गटर में बदल दिया है। अंधाधुंध बांध निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं ने उनकी प्राकृतिक धारा को बाधित किया है। धार्मिक आस्थाओं और अंधविश्वासों के नाम पर मूर्तियों और अस्थियों का विसर्जन नदियों की पवित्रता को विषाक्त बना रहा है। जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा है। भारत में गंगा, यमुना, चंबल, साबरमती जैसी नदियां इस प्रदूषण और शोषण का शिकार हैं, वहीं विश्व स्तर पर अमेज़न, नील और डेन्यूब जैसी नदियां भी प्रदूषण और अत्यधिक दोहन की मार झेल रही हैं। पृथ्वी की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी जीविका के लिए मछलियों पर निर्भर है, इसलिए हमें औद्योगिक कचरे के कारण नदियों के क्षरण को सक्रिय रूप से रोकने और पानी के नीचे के पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।
नदियां केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि जीव-जंतुओं और वन्य जीवन की धुरी हैं। असंख्य मछलियां, कछुए, पक्षी और जलीय प्राणी नदियों से अपना जीवन पाते हैं। जब नदी प्रदूषित होती है तो यह जैवविविधता समाप्त होने लगती है, खेत बंजर हो जाते हैं, भूजल स्तर गिर जाता है और प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगता है। नदियों की मृत्यु वास्तव में पृथ्वी/सृष्टि की मृत्यु है। इन परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि नदियों के संरक्षण को हम केवल सरकारी योजनाओं या नीतियों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे जनांदोलन का रूप दें। प्रदूषण पर कठोर नियंत्रण, जल प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, शोधन संयंत्रों की अनिवार्यता और सामाजिक जागरूकता ही वे उपाय हैं जिनसे नदियों को नया जीवन दिया जा सकता है। गंगा एक्शन प्लान और नमामि गंगे जैसी योजनाएँ तभी सार्थक होंगी जब समाज ईमानदारी से अपने हिस्से का कर्तव्य निभाएगा। नदियों को गंदा करना आत्मघात है और उन्हें बचाना जीवन रक्षा का संकल्प।भारत में कई नदियां सूखने या प्रदूषित होने के कारण मरने के कगार पर हैं। इन नदियों की हालत इतनी खराब हो गई है कि कुछ तो नालों में बदल गई हैं और उनका नदी होना भी मुश्किल है। तेजी से बढ़ते प्रदूषण, तथाकथित भौतिकवादी सोच एवं नदियों के प्रति उपेक्षा एवं दोहन के कारण कई नदियां अब ‘मृत’ होने की कगार पर है। गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां भी दुनिया की प्रदूषित नदियों में शामिल हो चुकी है। नदियां के अत्यधिक ख़तरे में होने से मानव जीवन, पर्यावरण एवं प्रकृति भी संकट में है। जरूरत है मानसूनी जल को नदियों से जोड़ने एवं संरक्षित करने की। देश में सर्वत्र नदियों का अस्तित्व खतरे में है। विशेषतः उत्तर प्रदेश में नदियों की संख्या लगभग 1,000 है, जिनका 55 हजार किलोमीटर का नेटवर्क है। उनमें से 30 हजार किलोमीटर क्षेत्र में जल घटा है या सूखा है। प्रदेश की 100 छोटी और सहायक नदियां सूख चुकी हैं। बिहार की 50 से अधिक नदियां संकट में हैं। इनमें 32 बड़ी नदियां सूख चुकी हैं, जबकि 18 में पानी थोड़ा बचा है। यमुना नदी भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है और यह अत्यधिक प्रदूषण और पानी के अत्यधिक दोहन के कारण मरने के कगार पर है। साहिबी नदी, जो कभी दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान की एक महत्वपूर्ण नदी थी। हैरानी की बात है कि गंगा, सोन और अघवारा जैसी बड़ी नदियों में भी पानी कम है। उत्तराखंड में अल्मोड़ा-हल्द्वानी की लाइफलाइन कोसी और गौला नदियों का जलस्तर कम हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के तरीकों में बदलाव आया है, जिससे कुछ क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बढ़ गई है और नदियों में पानी का प्रवाह कम हो गया है। नदियों से रेत का अवैध खनन भी नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है और नदियों के बहाव को बदल रहा है। जंगलों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है, जिससे नदियों में गाद जमा हो रही है और उनकी गहराई कम हो रही है। भारत नदियों का एक अनोखा देश है जहां नदियों को पूजनीय माना जाता है। गंगा, यमुना, महानदी, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु (सिंधु), और कावेरी जैसी नदियों को देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन में बनाया गया जल शक्ति मंत्रालय, नदी घाटियों में आर्द्रभूमि के पुनरुद्धार और संरक्षण और नदी प्रदूषण के खतरनाक स्तर से निपटने पर ध्यान केंद्रित करता है। देश के समक्ष वाटर विजन 2047 प्रस्तुत किया गया है यानी आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक देश को प्रत्येक वह कार्य करना है, जो देश को पानी के मामलों में सबल बना सके। इसमें हमारी नदियां भीशामिलहैं।नदियां मानव अस्तित्व का मूलभूत आधार है और देश एवं दुनिया की धमनियां हैं, इन धमनियों में यदि प्रदूषित जल पहुंचेगा तो शरीर बीमार होगा, लिहाजा हमें नदी रूपी इन धमनियों में शुद्ध जल के बहाव को सुनिश्चित करना होगा। नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किये जाने की जरूरत है। देश में नदी जल एवं नदियों के लिए कानून बने हुए है, आवश्यक हो गया है कि उस पर पुनर्विचार कर देश के व्यापक हित में विवेक से निर्णय लिया जाना चाहिए। हमारे राजनीतिज्ञ, जिन्हें सिर्फ वोट की प्यास है और वे अपनी इस स्वार्थ की प्यास को इस पानी से बुझाना चाहते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारे देश में गर्मी और लू के दिन जहां बढ़ रहे हैं, वहीं बरसात के दिन घटते जा रहे हैं। हमारे दैनिक जीवन में जल का बहुत महत्व है। हमारा जीवन तो इसी पर निर्भर है। यह पाचन कार्य करने के लिए शरीर में मदद करता है और हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। यह हमारी धरती के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमारे जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करने में महत्वपूर्ण घटक है और सार्वभौमिक है। धरती पर जब तक जल नहीं था तब तक जीवन नहीं था और जल ही नहीं रहेगा तो जीवन के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। वर्त्तमान समय में जल संकट एक विकराल समस्या बन गया है। नदियों का जल स्तर गिर रहा है. कुएं, बावडी, तालाब जैसे प्राकृतिक स्त्रोत सूख रहे हैं. घटते वन्य क्षेत्र के कारण भी वर्षा की कमी के चलते जल संकट बढ़ रहा है. वहीं उद्योगों का दूषित पानी की वजह से नदियों का पानी प्रदूषित होता चला गया लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।ऐसे में मानसूनी वर्षा के जल को यदि सलीके से नहीं सहेजा गया तो देश की सामाजिक-आर्थिक-प्राकृतिक स्थिति पर जल-संकट का बड़ा घातकप्रभावहोगा।यदि नदियां सूख जाएंगी, प्रदूषित हो जाएंगी या विलुप्त हो जाएंगी तो मानव सभ्यता का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। नदियां हमारी जीवनरेखा और सांस्कृतिक धरोहर हैं, उनका संरक्षण करना ही आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन और आशा को बचाना है। यह अवसर हमें यह संकल्प लेने का आह्वान करता है कि हम नदियों को केवल उपयोग की वस्तु न समझें, बल्कि जीवित प्राणी की तरह उनका सम्मान करें, क्योंकि नदी बचेगी तो जीवन बचेगा, नदी बहेगी तो संस्कृति बहेगी।। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*











