शंकर सिंह भाटिया
देहरादून। उत्तराखंड की पांचवीं विधानसभा के चुनाव संपन्न हो गए हैं। अब सिर्फ नतीजे आने बाकी हैं। लेकिन मतदान के बाद मतदाताओं का रुझान बता देता है कि इस बार भी मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच ही है। राज्य की लड़ाई लड़ने वाला क्षेत्रीय दल उक्रांद लगातार हासिए पर जा रहा है, सिमटता जा रहा है। 2017 में विधानसभा में प्रतिनिधित्व को लेकर शून्य हो चुके क्षेत्रीय दल का भविष्य क्या होगा? उक्रांद के इस जर्जर हालातों के लिए जिम्मेदार कौन है?
हम सब जानते हैं कि क्षेत्रीय दल किसी भी राज्य में प्रहरी की भूमिका में होते हैं। उत्तराखंड में क्षेत्रीय दल मजबूत न होने की वजह से दो राष्टीय दल अपनी मनमर्जी करते रहे हैं। चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दे न उठने की वजह से उनका समाधान नहीं हो पाता। जिस तरह से भाजपा-कांग्रेस उत्तराखंड के क्षेत्रीय मुद्दों को हवा में उड़ाते रहते हैं, क्षेत्रीय दल का मजबूत न होना इसकी मुख्य वजह है।
बीसवीं सदी के आंखिरी दो दशकों में उक्रांद इस क्षेत्र की दूसरी राजनीतिक ताकत था। भाजपा का तब इस क्षेत्र में नाम लेवा भी कोई नहीं था। 1991 से शुरू हुए राम मंदिर आंदोलन के जरिये भाजपा ने अपनी जगह बनानी शुरू की और उक्रंाद की पूरी ताकत को अपने में समेट लिया। उक्रांद बिखरता चला गया। इसकी दो वजहें थी। एक उक्रांद एक आंदोलनकारी संगठन था, जिसे उक्रांद के नेता एक परिपक्व राजनीतिक दल बनाने में पूरी तरह नाकाम रहे। दूसरा दल में अपना बर्चस्व स्थापित करने के लिए नेतृत्व करने वाले नेता कुमाउं-गढ़वालवाद फैलाते रहे। इस संघर्ष में दल कम से कम पांच बार टूटा। राज्य के पहले चुनाव में आशा थी कि जनता से उक्रांद को अच्छी ताकत मिलेगी, जनता ने भी सिर्फ चार सीटें देकर राज्य की लड़ाई लड़ने वाले दल को बहुत भाव नहीं दिया। यदि चार सीटों को लेकर उक्रांद ने सत्ता के खिलाफ ढंग से संघर्ष किया होता तो संभव है उक्रांद आगे और मजबूत होता चला जाता। लेकिन नारायण दत्त तिवारी की गोद में बैठकर दल ने संघर्ष की विसात को ही भुला दिया। उसके बाद भी उक्रांद विभाजित होता रहा। इन सब कारणों से उक्रांद लगातार छीजता चला गया। जो 2017 में आकर शून्य हो गया।
उक्रांद के हालातों के लिए दल के नेताओं की सत्तालोलुपता कम जिम्मेदार नहीं रही। स्थायी सरकार का बहाना बनाकर 2007 में भाजपा को समर्थन देना और एक मात्र विधायक द्वारा 2012 में कांग्रेस को समर्थन देना यह साबित करने के लिए काफी था कि उक्रांद एक सत्तालोलुप संगठन है, जो सत्ता के लिए भाजपा-कांग्रेस किसी की भी गोद में जाकर बैठ सकता है।
विधानसभा चुनाव 2022 के अभी नतीजे नहीं आए हैं, लेकिन चुनाव संघर्ष में कुछ युवाओं ने उक्रांद की लौ को जलाकर रखा है, चाहे नतीजे कुछ भी क्यों न हों, यह बात तय है कि उक्रांद राज्य के लोगों के दिलों में आज भी मौजूद है, उस मौजूदगी को वोट में कंवर्ट करने की क्षमता पैदा करनी होगी।
इस बार उक्रांद के कुछ युवा प्रत्याशियों को चुनाव लड़ते हुए हमने देखा, उन्होंने उक्रांद के पुराने ढर्रे को आइना दिखाया है। देहरादून में कैंट सीट से अनिरुद्ध काला, धर्मपुर सीट से किरन रावत, डोईवाला से शिव प्रसाद सेमवाल, यमकेश्वर से शांति प्रसाद भट्ट, रुद्रप्रयाग से मोहित डिमरी और भीमताल से राहुल ने उक्रांद के चुनाव लड़ने के पुराने ढर्रे को आयना दिखाया है। उक्रांद संगठन ने कभी विधानसभा, ब्लाक, बूथ स्तर पर अमनी मौजूदगी नहीं दिखाई है। चुनाव लड़ लिया और नतीजा आया तो 400-500 वोट तक सिमट गए। इस बार देहरादून में दिखाई दिया कि जहां से प्रत्याशी चुनाव लड़ रहा है, वहां हर बूथ पर उक्रांद का बस्ता लगा है। बस्ते पर युवाओं की टीम सक्रिय होकर काम कर रही है। युवा प्रत्याशियों ने दल के पुराने नेताओं को यह दिखाया कि युवा पीढ़ी पर विश्वास किया जाए तो दल का परफारमेंस बेहतर हो सकता है। उन्होंने यह भी संदेश दिया है कि अब वरिष्ठ नेता सत्ता का मोह त्यागकर नेतृत्व युवाओं को हस्तांतरित करें, तभी दल सही दिशा में जा सकता है।









