शंकर सिंह भाटिया
उत्तराखंड में 14 फरवरी को चुनाव संपन्न हो जाने के बाद राजनीतिक हलकों में एक बयान पर काफी चर्चा हो रही है। यह बयान पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री हरीश रावत का है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वह या तो मुख्यमंत्री बनेंगे, यदि ऐसा नहीं हो पाएगा तो घर बैठ जाएंगे। हरीश रावत के इस बयान पर कांग्रेस में चुप्पी है, तो भाजपा ने चुटकी ली है। इस बयान को लेकर समर्थकों और विरोधियों के बीच चर्चा गरम है।
यदि हम हरीश रावत के इस बयान के संदर्भ पर गौर करते हैं तो कह सकते हैं कि यह दूध से जले एक राजनेता का छांस को फूंककर पीने की कवायद है। कांग्रेस हाई कमान की बात करें तो उसने हरीश रावत के साथ बार-बार धोखा किया है। 2002 में कांग्रेस राज्य के पहले चुनाव में बहुमत हासिल कर पाई तो उसमें हरीश रावत की भूमिका से कौन इंकार कर सकता है? लेकिन कांग्रेस हाई कमान ने उत्तराखंड का विरोध करने वाले नारायण दत्त तिवारी को सिंहासन पर बैठा दिया। पांच साल तक हरीश रावत अपनी ही सरकार से लोहा लेते रहे। 2012 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में लौटी, तब भी हरीश रावत के प्रयासों को किसी से कमतर नहीं आंका जा सकता था। तब हाई कमान ने उत्तराखंड की राजनीति में सिर्फ पर्यटक की भूमिका में रहे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। विजय बहुगुणा कितने सक्षम थे, केदारनाथ हादसे में उनकी प्रशासनिक कुशलता की परीक्षा हो गई। बिल्ली के भाग से छींका टूट गया और इन विपरीत परिस्थितियों में हरीश रावत को सत्ता सौंपने के लिए हाई कमान को मजबूर होना पड़ा।
अब एक बार फिर 2022 के चुनाव संपन्न हो चुके हैं, सिर्फ नतीजे आने बाकी हैं। इन चुनावों से पहले हरीश रावत ने हाई कमान के सामने उत्तराखंड में पार्टी का चेहरा घोषित करने की मुहिम छेड़ी थी, लेकिन हाई कमान इसके लिए तैयार नहीं हुआ। संभवतः संतुलन बनाए रखने के लिए हाई कमान ने यह निर्णय किया। हरीश रावत इस पर भी मान गए। लेकिन अब उन्हें डर लग रहा है कि जिस तरह दो-दो बार उनके साथ हाई कमान ने धोखा किया है, इस बार भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। क्योंकि हरीश रावत को दरकिनार करने के लिए कभी नारायण दत्त तिवारी जैसे सर्वमान्य नेता आ जाते हैं, भले ही वह राज्य विरोधी ही क्यों न हों, तो कभी विजय बहुगुणा किसी बुल्स का सपना हाई कमान को दिखाकर आ जाते हैं, सारी योज्ञताएं और संघर्ष धरे का धरा रह जाता है। इस बार भी उनके विरोधी ऐसा ही कुछ कर सकते हैं, हरीश रावत को यही डर सबसे अधिक सता रहा है।
यदि हरीश रावत के संघर्ष की बात करें तो इसी चुनाव में कई बार यह बात सामने आई थी कि एक तरफ भाजपा जैसा एक संगठित और साधन संपन्न दल है, उसके महारथी योगी, मोदी, अमित साह, राजनाथ, नड्डा हैं, उनके मुकाबले कांग्रेस में सिर्फ हरीश रावत हैं। भाजपा के सभी महारथी हरीश रावत को ही निशाना बनाते रहे। यदि भाजपा के प्रहारों से हरीश रावत खेत रह जाते तो कोई दूसरा पार्टी को संभालने वाला नहीं था। भाजपा के सामने पार्टी ध्वस्त हो जाती। हरीश रावत सारे हमलों को झेलते रहे और सहजता के साथ उनके प्रत्युत्तर भी देते रहे, इसका सटीक उदाहरण है जब अमित शाह ने हरीश रावत को ‘धोबी का…. न घर का…’ कहकर हरीश रावत पर आक्रमण किया तो उत्तराखंड की अस्मिता से जोड़ते हुए हरीश रावत ने जिस तरह उसका उत्तर दिया, भाजपा के पास उसे आगे बढ़ाने का कोई अवसर बाकी नहीं था।
इन परिस्थितियों में हरीश रावत के डर को ऐसे ही कहकर दरकिनार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि उनके खिलाफ राज्य के अंदर और अपनी ही पार्टी के अंदर बहुत सारी ताकतें सक्रिय हैं, तो दिल्ली में भी उन्हें पटकनी देने वालों की कमी नहीं है जो मौके की तलाश में हैं। हरीश रावत का डर इस वजह से वाजिब कहा सकता है, इसलिए उन्होंने पहले ही हाई कमान को चेतावनी दे दी है कि उनके साथ यदि पहले जैसा कुछ किया गया तो पार्टी देखे, ऐसी स्थिति में वह घर बैठ जाएंगे। इससे कांग्रेस हाई कमान की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।
भाजपा ने हरीश रावत की इस दुखती रग पर हाथ रखा है और चुटकी ली है कि हरीश रावत खयाली पुलाव पका रहे हैं, सत्ता में तो भाजपा लौट रही है, कांग्रेस ऐसे ही सपने देख रही है। भाजपा जब खुद सत्ता की दावेदार है और 60 पार का नारा लेकर आई है तो वह कांग्रेस के दावों को कैसे मान सकती है। 20 दिन बाद पता चल जाएगा कि सत्ता में कौन लौट रहा है, सबके डर और संदेह तब मिट जाएंगे।









