डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कभी जीवन को सरल बनाने के लिए ईजाद किया गया प्लास्टिक आज इंसानों की मुसीबत बन गया है। हवा, पानी और जमीन में मौजूद यह प्लास्टिक हमारी रगों तक पहुंच रहा है। इसके विषैले और कैंसरकारक तत्व जीवन दीमक की तरह चाट रहे हैं। यह समुद्री जीवों के पेट से निकल रहा है। धरती पर विचर रहे इंसानों और जानवरों के शरीर में पहुंच जा रहा है। एक अध्ययन के अनुसार, घरों को आपूर्ति किए जाने वाले दुनिया के कई हिस्सों के पानी में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए जा रहे हैं।देश और दुनिया भर में प्लास्टिक रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल हो चुका है. इसने इंसानों के लिए कई मायनों में सुविधाएं बढ़ाई है, लेकिन इसके बढ़ते उपयोग के कारण इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई देने लगे हैं. चिंता की बात यह है कि अपनी सुविधा बढ़ाने के चक्कर में इंसानों ने खुद को तो मुसीबत में डाल ही लिया है, साथ ही इंसानों की लापरवाही का हर्जाना वन्यजीवों को भी भुगतना पड़ रहा है. यह स्थिति तब वन महकमे के सामने आई है, जब राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में वन्यजीवों के पोस्टमार्टम के दौरान उनके शरीर से प्लास्टिक मिल रहा है.राज्य के संरक्षित क्षेत्र तक भी प्लास्टिक के पहुंचने से वन्यजीवों की परेशानी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. इसके पीछे की वजह वन क्षेत्र से गुजरने वाले तमाम रेलवे ट्रैक और रोड कनेक्टिविटी को माना जा रहा है. दरअसल राज्य में ऐसे संरक्षित क्षेत्र भी है, जहां से या तो रेलवे ट्रैक गुजर रहे हैं या फिर आम लोगों की सुविधा के लिए रोड कनेक्टिविटी दी गई है. देखा जा रहा है कि रेलवे ट्रैक होने के कारण अक्सर सफर के दौरान लोग ट्रेन से वन क्षेत्र में ही प्लास्टिक को फेंक रहे हैं. इसके अलावा कुछ जगहों पर जंगलों के बीच से गुजरने वाली सड़कों में लोगों की गतिविधियों के दौरान भी इसी तरह प्लास्टिक जंगलों के आसपास पहुंच रहा है. वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की मृत्यु के बाद उनका पोस्टमार्टम किया जाता है. इसी तरह रेलवे ट्रैक की चपेट में आने वाले हाथी, सांभर या दूसरे वन्यजीवों का पोस्टमार्टम करने के बाद ही उनके शरीर को डिस्पोज किया जाता है. वन विभाग में वन्यजीवों के उपचार और उनकी चिकित्सा सुविधा के लिए काम कर रहे पशु चिकित्सकों को इस दौरान वन्यजीवों के शरीर से पॉलिथीन या प्लास्टिक मिल रहा है. वन क्षेत्रों में प्लास्टिक पहुंचने के पीछे एक वजह रेलवे ट्रैक पर संरक्षित क्षेत्र के बीच में ही लोगों का प्लास्टिक के साथ खाद्य पदार्थ फेंकना भी है. ऐसी स्थिति में वन विभाग के कर्मचारियों को रेलवे ट्रैक क्षेत्र में निरंतर साफ सफाई करने के निर्देश भी दिए जाते रहे हैं. लेकिन इससे बाद भी यह समस्या बढ़ती दिख रही है. लोग जो खाद्य पदार्थ प्लास्टिक के साथ जंगलों में फेंक देते हैं. उसकी सुगंध वन्यजीवों को आकर्षित कर रही है. दूर से ही वन्यजीव इसकी सुगंध को महसूस करते हुए वहां तक पहुंच जाते हैं और उसके बाद खाद्य पदार्थ को प्लास्टिक के साथ ही निगल जाते हैं. इस तरह खाद्य पदार्थ की सुगंध के कारण वन्यजीव प्लास्टिक को भी निगलने से परहेज नहीं कर रहे. जिस तरह वन क्षेत्र या इसके आसपास इंसानों द्वारा खाद्य पदार्थ फेंका जा रहा है, उसे जंगलों में वन्यजीवों की गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ खाद्य पदार्थ की सुगंध पाकर तमाम वन्यजीव जंगलों के बाहर या आसपास पहुंच रहे हैं तो वहीं इन वन्यजीवों को खाने वाले शिकारी वन्यजीव भी इनके पीछे जंगलों से बाहर निकल रहे हैं. इस तरह देखा जाए तो इंसानों की यह लापरवाही वन्यजीवों की गतिविधियों को भी प्रभावित कर रही है और उन्हें प्लास्टिक के दुष्प्रभावों की तरफ भी धकेल रही है. वनों के आसपास रहने वाले लोग भी जंगलों के किनारे घर का कचरा और खाद्य पदार्थ फेंक रहे हैं और इसके कारण कई जगहों पर तमाम वन्यजीवों के साथ भालू जैसा शिकारी वन्यजीव भी इस कचरे की तरफ खींचा आ रहा है. इसके अलावा हिरण, सांभर जैसे वन्यजीव भी जंगलों के बाहर निकल रहे हैं और उनके पीछे तेंदुआ और बाघ भी इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ रहे हैं. इंसानों की यही आदत मानव वन्यजीव संघर्ष के लिए भी बड़ा कारण बन रही है. जंगल में हाथी का प्लास्टिक की बोतल खाने की कोशिश करता हुआ एक चितांजनक वीडियो सामने आया है. वीडियो में एक हाथी जमीन पर पड़ी प्लास्टिक की बोतल को सूंड से उठाकर मुंह में डालते हुए दिख रहा है. हाथी पहले बोतल को पैरों से उछालता है और फिर उसे मुंह में डालकर खाने की कोशिश करता दिखाई देता है. यह वीडियो फाटो पर्यटन जोन के ग्रीन वॉटर होल क्षेत्र का बताया जा रहा है. हालांकि, इसकी जांच की जा रही है, लेकिन वीडियो से चिंता बढ़ गई है. वास्तव में अगर फाटो पर्यटन जोन का है तो यह बेहद गंभीर और दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. उन्होंने कहा कि अगर फाटो जोन में इस तरह की घटना हुई है तो यह वन विभाग की व्यवस्थाओं पर भी सवाल खड़े करता है.जंगल के अंदर प्लास्टिक की बोतल आखिर पहुंची कैसे? यह एक बड़ा सवाल है. अगर पर्यटक प्लास्टिक लेकर जा रहे हैं तो उन्हें रोका क्यों नहीं गया और इसके लिए क्या व्यवस्थाएं की गई है? उन्होंने इसे क्षेत्र और जंगल दोनों के लिए खतरनाक व शर्मनाक बताया. उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं से प्रदेश में गलत संदेश जाता है. वहीं, वन्यजीव प्रेमी और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताया. उन्होंने कहा कि जंगल से सटे फाटो पर्यटन जोन में हाथी के प्लास्टिक बोतल खाते हुए दिखाई देना बेहद चिंताजनक है. उन्होंने प्रशासन और वन विभाग से इस मामले की गंभीरता से जांच करने की मांग की है.उनका कहना है कि विभाग को ये देखना होगा कि आखिर जंगल में प्लास्टिक कैसे पहुंच रही है? उन्होंने कहा कि पर्यटकों के बीच जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है. ताकि, पर्यटक जंगल में प्लास्टिक या अन्य कचरा न फेंकें. उनका कहना है कि इस तरह का कचरा वन्यजीवों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. डीएफओ ने कहा कि भविष्य में प्लास्टिक की बोतलों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की भी योजना बनाई जा रही है. इसके तहत पर्यटकों को स्टेनलेस स्टील की बोतल उपलब्ध कराई जाएगी, जिसे वापसी पर गेट पर जमा करना होगा. जानकारी के अनुसार हाथी अपने दिन का लगभग 80 प्रतिशत समय भोजन की तलाश और खाने में बिताते हैं. हाथी हर दिन 150 से 200 किलो भोजन खाते हैं. शाकाहारी होने के कारण हाथी कई तरह के पौधे खाते हैं. नतीजतन, उनके गोबर में बीज भरे होते हैं. चूँकि इन बीजों में अंकुरण क्षमता अच्छी होती है, इसलिए ये पौधों को बढ़ने में मदद करते हैं और जैव विविधता को बढ़ाने में भी मदद करते हैं. हर मिनट दुनिया भर में दस लाख पेयजल के लिए प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैं। हर साल दुनिया में पांच लाख करोड़ सिंगल यूज प्लास्टिक के बैग इस्तेमाल होते हैं। दुनिया में कुल जितना प्लास्टिक बनता है उसके आधे हिस्से का सिर्फ एक बार ही इस्तेमाल हो पाता है। बाकी को कचरे के हवाले कर दिया जाता है। वर्ष 1950-70 के दौरान दुनिया भर में बहुत कम मात्र में प्लास्टिक का उत्पादन होता था जिससे इसके कचरे का तुलनात्मक प्रबंध आसान था। 1970-90 दो दशकों के दौरान प्लास्टिक उत्पादन तीन गुना बढ़ा। इसी अनुपात में इसके कचरे में भी बढ़ोतरी हुई।आंकड़े बताते हैं कि हर साल 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। यह वजन दुनिया की इंसानी आबादी के वजन के बराबर है। शोधकर्ताओं के अनुसार, 1950 के बाद से अब तक 8.3 अरब टन प्लास्टिक दुनिया में पैदा किया गया है। इसका 60 फीसद हिस्सा या तो लैंडफिल में जमा हुआ या फिर किसी प्राकृतिक स्थल को तबाह करने का काम किया। साल 2000 के बाद पहले ही दशक में जितना प्लास्टिक का उत्पादन हुआ वह पिछले चालीस साल के दौरान हुए उत्पादन से अधिक था। भारत की बात करें तो 25,940 टन प्लास्टिक कचरा हर रोज पैदा होता है। यह नौ हजार एशियाई हाथियों के वजन के बराबर है।। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












