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गणेश चतुर्थी का वैज्ञानिक महत्व, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पक्ष

22/08/20
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जब भी हम कोई पूजा या अनुष्ठान करते हैं तो सर्वप्रथम गौरी नंदन गणेशजी की उपासना करते हैं। सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माने जाने वाले गणेश जी का अवतरण दिवस गणेश चतुर्थी का पावन पर्व देश ही नहीं। अपितु विश्वभर के सनातन धर्मावलम्बियों द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। चारों तरफ उत्सव ही उत्सव, बस सबके मन में एक ही इच्छा कि हे विघ्नहर्ता हमारे भी बिगड़े काम बनाओ। जो भी भक्ति भाव से इन्हें पुकारता है गणपति उनकी मनोकामना अवश्य ही पूरी करते हैं। बड़े ही मनमोहक से दिखने वाले गणेश जी के भव्य और दिव्य स्वरुपए शारीरिक संरचना में भी विशिष्ट व गहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव यानी ॐ कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उद, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूंड है। इनकी चार भुजाएं चारों दिशाओं में सर्वव्यापता की प्रतीक हैं। उनकी छोटी पैनी आँखें सूक्ष्म .तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं। समस्त देवी.देवताओं में गणेशजी को बहुत अधिक बुद्धिमान माना गया है। गजानन जी की लम्बी सूंड महाबुद्धित्व का प्रतीक है। लम्बी सूंड तीव्र घ्राण शक्ति की महत्वता को प्रतिपादित करती है जिसका अर्थ है कि जो समझदार व्यक्ति है वह अपने आस.पास के माहौल को पहले से ही सूंघ सकता है। गणेश जी की सूंड हमेशा हिलती .डुलती रहती है जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को हमेशा सचेत रहना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार सुख एसमृद्धि व ऐश्वर्या की प्राप्ति के लिए उनकी बायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए और यदि किसी शत्रु पर विजय प्राप्त करनी हो तो दायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए।
गणेश चतुर्थी के पर्व पर पूजा प्रारंभ होने की सही तारीख किसी को ज्ञात नहीं हैए हालांकि इतिहास के अनुसारए यह अनुमान लगाया गया है कि गणेश चतुर्थी 1630-1680 के दौरान छत्रपति शिवाजी मराठा साम्राज्य के संस्थापक के समय में एक सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया जाता था। शिवाजी के समय, यह गणेशोत्सव उनके साम्राज्य के कुलदेवता के रूप में नियमित रूप से मनाना शुरू किया गया था। पेशवाओं के अंत के बादए यह एक पारिवारिक उत्सव बना रहा, यह 1893 में बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक द्वारा पुनर्जीवित किया गया।
महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार से मुक्त होने के लिए मनाना शुरु किया था। गणेश विसर्जन की रस्म बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित की गई थी। धीरे.धीरे लोगों द्वारा यह उत्सव परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाना शुरू किया गया। समाज और समुदाय के लोग इस पर्व को एक साथ सामुदायिक त्योहार के रुप में मनाने के लिए बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत समारोहों, लोक नृत्य करना आदि क्रियाओं को सामूहिक रुप से करते हैं। लोग तारीख से पहले एक साथ मिलते हैं और उत्सव मनाने के साथ ही साथ यह भी तय करते है कि इतनी बड़ी भीड़ को कैसे नियंत्रित करना है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसारए यह माना जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ माह में चतुर्थी ;उज्ज्वल पखवाड़े के चौथे दिनद्ध हुआ था। तब सेए भगवान गणेश के जन्म की तारीख गणेश चतुर्थी के रूप में मनानी शुरू की गई। आजकलए यह त्योहार हिंदू एवं बहुत से अन्य समुदाय के लोगों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है।गणेश चतुर्थी का पर्व पूरे भारत में बड़ी ही श्रद्धाभाव के साथ मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। महाराष्ट्रए गुजरातए उत्तर प्रदेश सहित भारत के समस्त राज्यों में गणेश चतुर्थी का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। घरों में गणेश जी को स्थापित किया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश जी की धूमधाम से विदाई की जाती है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व दो से दस दिन तक मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 22 अगस्त से शुरू हो रहा है। भगवान गणेश जी को बुद्धिए विवेकए धन.धान्यए रिद्धि.सिद्धि का कारक माना जाता है। मान्यता है कि गणेश जी को प्रसन्न करने से घर में सुखए समृद्धि और शांति की स्थापना होती है। गणेश जी को प्रसन्न्ग करने से पूरे वर्ष घर में शुभ प्रभाव रहते हैं।इस साल यह तिथि 22 अगस्त 2020 ;शनिवारद्ध को पड़ रही है। इस तिथि को भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जानते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन गणपति को स्थापित किया जाता है। इस पर्व को दो ये दस दिन तक मनाया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान गणेश संकटए कष्ट और दरिद्रता से मुक्ति दिलाते हैं। कहते हैं कि गणपति की विधि.विधान से पूजा करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं।गणेश चौथ के दौरान प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाओं कि पूजा जड़ी . बूटियों और पत्तियों से कि जाती है। बारिश के मौसम की वजह से और बाढ़ कि समस्या से बहुत सी बीमारियों का सामना करना पड़ता है जो कि दूषित जल के कारण होता है।
गणेश विसर्जन में पूजा की गई पत्तियों को उनकी प्रतिमाओं के साथ नदीए समुद्र आदि में बहा दिया जाता हैए जिससे कि उन पत्तियों के गुणकारी तत्व जल में मिल कर जल को शुद्ध कर देते हैं। इसी तरह प्राकृतिक मिट्टी की बनी प्रतिमा जब जल मग्न हो जाती है तो प्रदूषण कि वजह से दूषित जल को साफ कर देती है।गणेश जी को हम मोदक आदि का प्रसाद अर्पण करते है। यह प्रसाद भाप में बना होता है जो कि हमारे स्वास्थ्य के लिए अति गुणकारी होता है। आयुर्वद में भी कहा गया है कि भाप में बना खाना सेहत के लिए अच्छा होता है। इसी तरह गुड़ जिसके अनगिनत लाभ है, भोग में इसे देकर यह हमारे स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा होता है। तिल जिसके अनेक गुण है वह भी प्रसाद में उपयोग होती है, जिससे दृष्टि को स्वस्थ रखने में लाभ होता है। अंग विज्ञान के अनुसार बड़ा उदर खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक होता है।
गणेश जी का बड़ा उदर सुखपूर्वक जिंदगी जीने के लिए अच्छी और बुरी सभी बातों को पचाने का संकेत देता है। इससे ये भी सन्देश मिलता है क़ि मनुष्य को हर बात अपने अंदर रखकर किसी भी बात का निर्णय बड़ी सूझ .बूझ के साथ लेना चाहिए व लम्बोदर स्वरुप से हमें ग्रहण करना चाहिए कि बुद्धि के द्वारा हम समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं और सबसे बड़ी समृद्धि प्रसन्नता है। श्री गणेश जी का एक नाम श्गजकर्ण भी है। अंग विज्ञान के अनुसार लंबे कान वाले व्यक्ति भाग्यशाली और दीर्घायु होते हैं। गणेश जी के कान सूप की तरह हैं और सूप का स्वभाव है क़ि वह सार.सार को ग्रहण कर लेता है और कूड़ा करकट को उड़ा देता है। गणेश जी के कानों से यह सन्देश मिलता है कि मनुष्य को सुननी सबकी चाहिए, लेकिन अपने बुद्धि विवेक से ही किसी कार्य का क्रियान्वयन करना चाहिए। गणेश जी का एक ही दांत है दूसरा दन्त खंडित है। बाल्यकाल में भगवान गणेश का परशुराम जी से युद्ध हुआ था। इस युद्ध में परशुराम ने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत काट दिया। तभी से ही गणेशजी एकदंत कहलाने लगेएएक दन्त होते हुए भी वे पूर्ण हैं।
गणेश जी ने अपने टूटे हुए दांत को लेखनी बना लिया और इससे पूरा महाभारत ग्रंथ लिख डाला। गणेश जी अपने टूटे हुए दांत से यह सीख देते हैं कि हमारे पास जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उसी में हमें दक्षता के साथ कार्य संपन्न करना चाहिए। गणपति अक्सर वर मुद्रा में दिखाई देते हैं। वरमुद्रा सत्वगुण की प्रतीक है। इसी से वे भक्तोंकी मनोकामना पूरी कर अपने अभय हस्त से संपूर्ण भयों से भक्तों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार गणेश जी का उपासक रजोगुण एतमोगुण, सत्वगुण इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर एक विशेष आनंद का अनुभव करने लगता है। गणपति अक्सर वर मुद्रा में दिखाई देते हैं। वरमुद्रा सत्वगुण की प्रतीक है। इसी से वे भक्तोंकी मनोकामना पूरी कर अपने अभय हस्त से संपूर्ण भयों से भक्तों की रक्षा करते हैं। किन्तु अन्य पर्वों की तरह इस पर्व पर भी कोरोना का प्रभाव भी दिख रहा है। इसका असर प्रतिमा बनाने वाले कारीगर भी मायूस हैं। गणेश चतुर्थी से पूर्व ही बाजारों में गणेशजी की प्रतिमाएं बिकने का सिलसिला शुरू हो जाता था। उत्तराखंड के मूर्तिकार बड़ी संख्या में मूर्तियां बनाना शुरू करते थे। एक फुट से लेकर विशाल आकार की प्रतिमाएं इनके द्वारा बनायी जाती थीं। किन्तु इस साल कोरोना संकट के चलते इन कारीगरों को धंधा भी चौपट हो गया है। हालांकि कुछ प्रतिमाएं इनके द्वारा बनायी गयी हैंए किन्तु इनके खरीददार नजर नहीं आ रहे हैं। कारीगर ने बताया कि पूर्व में गणेश चतुर्थी से पहले ही प्रतिमाओं के बनाने के आर्डर आ जाते थेए किन्तु इस बार एक आर्डर नहीं आया है। जो प्रतिमाएं बनायी भी गयी हैं उनके भी खरीददार नहीं है। ऐसे में उनका धंधा बिलकुल चौपट हो गया है। आलम यह है कि उनके समक्ष परिवार का भरण.पोषण करने का भी संकट आ गया है। कारोबारियों ने बताया कि कोरोना के साथ मानसून की दोहरी मार उनको झेलनी पड़ रही है।

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