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उत्तराखंड में 25 सालों में विकास के लिए कटे 46 हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगल

10/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड राज्य गठन के इन 25 सालों में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई है. सूचना के अधिकार से मिली जानकारी में खुलासा हुआ है कि सबसे ज्यादा वन भूमि जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण और खनन गतिविधियों के लिए दी गई है. वहीं, कुल हस्तांतरित वन भूमि में अकेले देहरादून जिले की हिस्सेदारी करीब 47 फीसदी है. उत्तराखंड राज्य गठन के इन 25 सालों में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई है. सूचना के अधिकार से मिली जानकारी में खुलासा हुआ है कि सबसे ज्यादा वन भूमि जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण और खनन गतिविधियों के लिए दी गई है. वहीं, कुल हस्तांतरित वन भूमि में अकेले देहरादून जिले की हिस्सेदारी करीब 47 फीसदी है. इसके अलावा सड़क निर्माण के लिए 10,070.03 हेक्टेयर, खनन कार्यों के लिए 9,289.81 हेक्टेयर, पारेषण (हाई वोल्टेज) लाइनों के लिए 3,005.51 हेक्टेयर, सिंचाई परियोजनाओं के लिए 456.18 हेक्टेयर और पेयजल योजनाओं के लिए 294.56 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई. इसके अलावा अन्य परियोजनाओं के लिए भी 2,837.60 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया गया है. राज्य गठन के बाद विकास परियोजनाओं की बढ़ती जरूरतों के साथ वन भूमि के उपयोग में लगातार वृद्धि हुई है. विशेष रूप से जल विद्युत परियोजनाएं और सड़क निर्माण वन भूमि हस्तांतरण के सबसे बड़े कारण बनकर उभरे हैं. जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा वन भूमि देहरादून जिले में हस्तांतरित की गई है. देहरादून में 21,618.32 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं के लिए दी गई. इसके बाद हरिद्वार में 6,002.32 हेक्टेयर, नैनीताल में 3,603.83 हेक्टेयर, चमोली में 3,065.34 हेक्टेयर, टिहरी में 2,555.29 हेक्टेयर और पिथौरागढ़ में 2,360.67 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई. जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा वन भूमि देहरादून जिले में हस्तांतरित की गई है. देहरादून में 21,618.32 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं के लिए दी गई. इसके बाद हरिद्वार में 6,002.32 हेक्टेयर, नैनीताल में 3,603.83 हेक्टेयर, चमोली में 3,065.34 हेक्टेयर, टिहरी में 2,555.29 हेक्टेयर और पिथौरागढ़ में 2,360.67 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई. आंकड़ों से स्पष्ट है कि राजधानी देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं का दबाव सबसे ज्यादा रहा है. कुल हस्तांतरित वन भूमि का करीब आधा हिस्सा अकेले देहरादून जिले से संबंधित है. यानी दून घाटी में पेड़ों से भरे वन भूमि को स्तांतरित की गई है. जाहिर है इससे हजारों पेड़ों पर आरियां चली होंगी. उत्तराखंड के 25 सालों के विकास मॉडल पर गंभीर चर्चा की जरूरत है. आज प्रदेश में पर्यटन और यातायात सुविधाओं को विकास की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इसके बदले प्राकृतिक संसाधनों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. सबसे चिंताजनक तथ्य ये है कि देहरादून जिला राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा रखता है, लेकिन पिछले 25 सालों में विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित कुल वन भूमि में उसकी हिस्सेदारी करीब 47 फीसदी है. उनके अनुसार यह असंतुलन बताता है कि विकास का दबाव किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा पड़ा है. उत्तराखंड को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने वाला मॉडल अपनाने की जरूरत है. ताकि, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके देहरादून एयरपोर्ट से ऋषिकेश मार्ग के फोरलेन चौड़ीकरण के लिए वन क्षेत्र में 3,000 से अधिक पेड़ों का कटान शुरू होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ समय पूर्व विभिन्न सामाजिक, पर्यावरणीय एवं राजनीतिक संगठनों ने संयुक्त रूप से आंदोलन चलाकर पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधते हुए उन्हें बचाने का संकल्प लिया था, लेकिन सरकार ने जनता की भावनाओं और पर्यावरणीय चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।आम जनता में व्यर्थ की पर्यावरण बचाने और नदी बचाओ का नारा देने वाले इन सरकारों के कर्णधारों का असली चेहरा बहुत ही विद्रूप, कुरूप, क्रूर और छद्म है। लाखों सालों से संरक्षित व अत्यंत जटिल प्राकृतिक व जैविक प्रक्रियाओं से निर्मित वन हम मानव बना ही नहीं सकते। सबसे बड़ी चीज लाखों सालों से उनमें उपस्थित करोड़ों तरह की झाड़ियों, लताओं, दरख्तों और उसमें रहने वाले भृंगों, तितलियों, जुगनुओं, भौंरों, केचुओं, मधुमक्खियों, ततैयों, वीर-बहूटियों, सरीसृपों, परिंदों, गिलहरियों, खरहों, लोमड़ियों, हिरनों, तेंदुओं, गौरों और अतिविशिष्ट भारतीय समाज में गणेश जी के प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले गजराजों को विलुप्त होने के बाद इस धरती पर पुनः ला ही नहीं सकते।इन सत्ता के कर्णधारों को यह समझा पाना बहुत मुश्किल है कि कोयले के विकल्प सौर ऊर्जा,पवन उर्जा, जल ऊर्जा, एटॉमिक ऊर्जा आदि बहुत से विकल्प तो हैं, परन्तु इस धरती से प्रकृति द्वारा अपने लाखों-करोड़ों सालों के सतत प्रयासों द्वारा बनाए गये इकोसिस्टम और किसी जीव के विनष्ट हो जाने पर उसको पुनः पुनर्जीवित करने का कोई विकल्प मानव प्रजाति के पास फिलहाल तो नहीं ही हैहमारे चारों ओर का वातावरण पर्यावरण कहलाता है। इसमें धरती-आकाश, नदी-पर्वत, वन-उपवन, जल-वायु तथा जीव-जन्तु सभी आते हैं। मनुष्य इस ब्रह्मांड की तुच्छ इकाई है, जो पूर्णत: अन्य तत्वों पर निर्भर है। उसकी लाचारी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उसकी एक सांस भी वायु के बिन नहीं चलती, पर आज मनुष्य इनकी उपादेयता नहीं समझता। दुरुपयोग भी करता है और प्रदूषित भी।हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि केवल तपस्वी नहीं, वरन अनुसंधानी विज्ञानी भी थे। तभी पंचमहाभूतों को देवता माना और उनसे आत्मिक रिश्ता जोड़ा। धरती को मां और आकाश को पिता कहकर पुकारा। जब हम किसी को रिश्तों में बांध लेते हैं तो उनका सम्मान करते हैं, प्रदूषित नहीं। जब ये तत्व शुद्ध रहेंगे, पर्यावरण शुद्ध रहेगा। तब मानव शरीर भी स्वस्थ रहेगा। वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के द्यौ, पृथ्वी, अग्नि आदि सूक्त इसके प्रमाण हैं। जिनमें पृथ्वी, जल, वायु आदि सभी तत्वों से प्राणि जगत के योगक्षेम की प्रार्थना की गई है। विविध जीव-जन्तुओं को देवों का वाहन कहकर उनका संरक्षण सुनिश्चित किया गया है।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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