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प्रेशर कुकर नहीं, पहाड़ी भडडु में बनता था स्वाद होता था लाजवाब

10/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ों की अनोखी संस्कृति में सिर्फ खान-पान ही नहीं, बल्कि पारंपरिक बर्तनों की भी खास पहचान थी. आज की तरह प्रेशर कुकर, गैस चूल्हा और नॉन-स्टिक बर्तन पहले नहीं हुआ करते थे. उस समय पहाड़ों में बड़े पीतल के बर्तन में खाना बनाया जाता था, जिसे भडडु कहा जाता था. यह आकार में बड़ा और मजबूत होता था, इसलिए इसमें एक साथ पूरे परिवार या गांव के लोगों के लिए दाल, चावल और खास मौकों पर चिकन बनाया जाता था.भडडु खास तौर पर सामूहिक भोज, शादी-ब्याह या त्योहारों में इस्तेमाल होता था. इसे पारंपरिक चूल्हे पर लकड़ी की आग में रखा जाता था. धीमी आंच पर जब दाल या मांस पकता था, तो उसकी खुशबू पूरे आंगन में फैल जाती थी. बुजुर्गों का मानना है कि पीतल के बर्तन में बना खाना स्वाद में अलग और सेहत के लिए भी बेहतर होता था. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके जमाने में भडडु का काफी इस्तेमाल होता था. वे कहते हैं कि पहले हर बड़े घर में यह बर्तन जरूर मिलता था. समय के साथ-साथ चीजें बदल गईं और कुकर ने कई पारंपरिक बर्तनों की जगह ले ली. अब लोग जल्दी बनने वाले साधनों को ज्यादा पसंद करने लगे हैं. उनका यह भी कहना हैं कि भडडु में खाना बनने में समय लगता था, लेकिन उसी समय में परिवार और पड़ोसी आपस में बैठकर बातें करते थे. कोई अपने सुख-दुख साझा करता था, तो कोई पुराने किस्से सुनाता था. खाना पकने की प्रक्रिया सिर्फ भोजन बनाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह आपसी मेल-मिलाप का समय भी होती थी. भडडु उन्हें शांति और सादगी भरा जीवन याद दिलाता है. आज स्थिति बिल्कुल अलग है. प्रेशर कुकर में दो सीटी में चावल और दाल तैयार हो जाते हैं. जीवन की रफ्तार तेज हो चुकी है. लोग सुबह से शाम तक भागदौड़ में लगे रहते हैं. किसी के पास बैठकर बात करने का समय नहीं है. पहले जहां खाना बनने का इंतजार एक साथ बिताया जाता था, अब हर कोई अपने काम में व्यस्त है. धीरे-धीरे आधुनिकता के कारण भडडु जैसे पारंपरिक बर्तन घरों से गायब हो गए. नई पीढ़ी ने इन्हें सिर्फ कहानियों में सुना है. हालांकि कुछ गांवों में आज भी खास अवसरों पर भडडु का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि परंपरा जिंदा रहे. भडडु सिर्फ एक बर्तन नहीं था, बल्कि पहाड़ों की जीवन शैली और सामूहिक संस्कृति का प्रतीक था. यह हमें याद दिलाता है कि असली खुशी सादगी और साथ बैठने में होती है. बदलते समय के साथ चीजें बदलना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं को याद रखना भी उतना ही जरूरी है. किसी घर के कोने में पड़े भड्डू को देखकर राजकपूर साहब की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का वो गीत याद आता है कि ‘जाने कहां गए वो दिन..’। सच में वो दिन लद गए, पहाड़ों में बिताए वो दिन बस अब यादों में ही बचे हैं। गांव घरों का भी हाल कुछ अच्छा नहीं है. लोगों ने देखा—देखी में मिट्टी के चूल्हे से दूरी बना ली है, आज कल गांव—देहात में भी लोग गैस के चूल्हे का ज्यादा उपयोग कर रहे हैं, क्योंकि मिट्टी के चूल्हे में खाना बनाने से बर्तनों की साफ सफाई में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है जो कि लोगों को पसंद नहीं है. गैस सिलेंडर बचाने के लिए इंडक्शन बिजली से खाना बनाने वाला चूल्हा भी पहाड़ चढ़ चुका है और साथ में नॉन स्टिक बर्तन भी अपने साथ पहाड़ ले आया है. लोगों को लगता है कि इससे उनका समय भी बचेगा और गैस सिलेंडर की खपत भी कम होगी और बर्तन धोने में भी सहूलियत रहेगी. आज जब ये सब हो रहा है तो भड्डू कहां से देखने को मिलेगा. गैस चूल्हे और इंडक्शन पर भड्डू में दाल नहीं पक सकती, इसी वजह से आज की पीढ़ी भड्डू और उसमें बनने वाली दाल के स्वाद से अपरिचित है।वर्तमान समय में बाज़ार में भड्डू की जगह प्रेशर कुकर, सौर कुकर, इलेक्ट्रिक कुकर आदि ने ले ली है. भड्डू आज की आधुनिक जीवन शैली में यदि दिखता भी है इसकी उपयोगिता ना के बराबर है और यदि कहीं दिख भी जाय तो वो सिर्फ और सिर्फ घर में बने शोकेस में एक एंटीक पीस जैसा रखा हुआ है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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