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एसिड अटैक ने आंखें छीनीं हौसला नहीं आज सैकड़ों महिलाओं की ‘रोशनी’ बनीं कविता बिष्ट

07/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
फरवरी 2008 को अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खी बनी यह खबर हमारे और आपके लिए एक दिल दहला देने वाली घटना थी, जिसे हम पढ़कर कबका भूल चुके हैं। मगर, किसी के लिए यह एक अंतहीन संघर्ष की शुरुआत थी।यह कहानी है, अदम्य साहसी और कभी हार न मानने वाली कविता बिष्ट की, जिन्होनें जीवन की चुनौतियों का डटकर सामना किया है और अपने सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मविश्वास के बलबूते आज हजारों लड़कियों का संबल बनी हुई हैं।कविता कहती हैं, ”समाज में मुझे आज भी लोग हतोत्साहित करने से पीछे नहीं रहते, पर मुझे आगे बढ़ना है। इसलिए मैं उनकी बातों पर ध्यान नहीं देती। मैं लोगों से कहना चाहती हूं कि अगर आप मदद नहीं कर सकते हैं, तो अपशब्द या उल्टा-सीधा न बोलें, मैं अपने पैरो पर खड़ी हूं, किसी पर आश्रित नहीं हूं, कृपया अपनी सोच बदलें।”धीरे – धीरे कविता अपने परिवार का आर्थिक संबल बनीं और अपने जैसी कई महिलाओं की मदद करना शुरू किया। सरकार ने इनके सामाजिक कार्यों को देखते हुये उन्हें उत्तराखंड में महिलाओं के लिए ब्रांड एंबेसडर बनाया। वे पूरे राज्य में महिला सशक्तिकरण की आवाज़ बनी और 4 सितंबर 2021 को राजीव गांधी नेशनल एक्सीलेन्स अवार्ड फॉर कोरोना वॉरियर से उन्हें सम्मानित किया गया है। इतना ही नहीं आज कविता 18 से भी ज़्यादा सम्मान और पुरस्कार पा चुकी हैं।कविता बिष्ट की कहानी संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की ऐसी मिसाल है, जो यह साबित करती है कि अगर मन में विश्वास और लगन हो, तो कोई भी मुश्किल इंसान को आगे बढ़ने से रोक नहीं सकती. कविता बिष्ट पर साल 2008 में दिल्ली में काम करने के दौरान दो युवकों ने एसिड अटैक कर दिया था. इस हमले में कविता बिष्ट का पूरा चेहरा बुरी तरह झुलस गया और दोनों आंखों की रोशनी भी चली गई. यह घटना किसी भी व्यक्ति को जिंदगी से हार मानने पर मजबूर कर सकती थी, लेकिन कविता ने हार मानने के बजाय अपने जीवन को एक नई दिशा देने का फैसला किया. दृष्टि खोने के बाद भी उन्होंने खुद को कमजोर नहीं होने दिया. उन्होंने कढ़ाई, बुनाई, डिजाइनिंग, मोमबत्ती बनाना और विभिन्न प्रकार की हस्तकलाओं का प्रशिक्षण लेना शुरू किया. धीरे-धीरे उन्होंने इन कौशलों में महारत हासिल की और अपने हुनर को दूसरों के लिए भी अवसर में बदल दिया. कविता बताती हैं कि उनकी कोशिश रहती है कि महिलाएं अपने घर और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी मजबूत बनें. इसलिए उनकी कार्यशाला में महिलाएं अपनी सुविधा के अनुसार काम करती हैं. कोई घर से दीये बनाती हैं तो कोई सजावटी सामान डिजाइन करती हैं.दृष्टि खो देने के बाद भी कविता ने अपनी रचनात्मकता को कभी खत्म नहीं होने दिया. आज भी वह अपनी टीम के साथ मिलकर कई तरह के डिजाइन तैयार करती हैं और महिलाओं को नई-नई चीजें बनाना सिखाती हैं. इन दिनों वह जूट के बैग की तैयारियों में व्यस्त हैं. उनकी कार्यशाला में ऐपण से सजे दीये, सजावटी मालाएं, मोमबत्तियां और घरों को सजाने वाले हस्तनिर्मित उत्पाद बनाए जा रहे हैं. इन उत्पादों की खासियत यह है कि ये पूरी तरह हाथ से बने होते हैं. इनमें स्थानीय कला और परंपरा की झलक भी दिखाई देती है. कविता का दिल सिर्फ महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि जरूरतमंद बच्चों के लिए भी धड़कता है. करीब आठ महीने पहले उन्होंने एक दिव्यांग बच्ची को गोद लिया, जो पैरों से कमजोर थी.कविता और उनके परिवार की देखरेख व प्यार की वजह से अब उस बच्ची की हालत पहले से काफी बेहतर हो गई है, वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही है. कविता कहती हैं कि यह बच्ची अब उनके जीवन का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. कविता बिष्ट के साहस और समाज के लिए किए जा रहे कार्यों को देखते हुए उत्तराखंड सरकार ने साल 2013 में उन्हें महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में ब्रांड एंबेसडर बनाया था. हालांकि यह जिम्मेदारी और सहायता सिर्फ एक साल तक ही सीमित रही, इसके बावजूद कविता ने अपने काम को कभी रुकने नहीं दिया. सरकार ने मुझे सम्मान जरूर दिया, लेकिन स्थायी सहयोग नहीं मिल पाया. फिर भी मैं निराश नहीं हूं, क्योंकि मुझे अपने काम और लोगों के समर्थन पर भरोसा है. उनकी यही सोच आज कई महिलाओं की जिंदगी बदल रही है, जो महिलाएं कभी घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, वे आज अपने हाथों के हुनर से कमाई कर रही हैं और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत बना रही हैं.आज कविता बिष्ट उत्तराखंड के रामनगर क्षेत्र के जस्सागाजा इलाके में महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बन चुकी हैं. उन्होंने अपने प्रयासों से 200 से अधिक महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ दिया है. उनकी कार्यशाला में महिलाएं कई तरह के उत्पाद बनाती हैं, जिनमें शामिल हैं, गोबर से बने पर्यावरण अनुकूल दीये, पारंपरिक ऐपण से सजाए गए दीये, जूट के बैग, कढ़ाई और बुनाई के उत्पाद, मोमबत्तियां, स्कूल बैग और सजावटी सामान. इन उत्पादों को स्थानीय बाजारों और मेलों में बेचा जाता है, जहां लोगों को यह सामान काफी पसंद आते हैं.मेरे सपनों की उड़ान आसमान तक है, मुझे बनानी अपनी पहचान आसमान तक है.” ये पंक्तियां उत्तराखंड की साहसी महिला कविता बिष्ट के जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं. साल 2008 में हुए एक दर्दनाक एसिड अटैक ने भले ही उनका चेहरा और आंखें छीन ली हों, लेकिन उनके हौसले और जज्बे को कभी कमजोर नहीं कर पाया. आज वही कविता बिष्ट न सिर्फ अपने जीवन को मजबूती से आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि सैकड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा बनकर उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही हैं. आज भले ही उनकी आंखें इस दुनिया को नहीं देख पातीं, लेकिन उनके सपनों की रोशनी सैकड़ों महिलाओं की जिंदगी को उजाला दे रही है. कविता बिष्ट सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि साहस, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की एक जीवंत मिसाल बन चुकी हैं. उनकी यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि सपनों की उड़ान आंखों से नहीं, बल्कि हौसलों से तय होती है. वहीं क्षेत्र की ग्राम प्रधान का कहना है कि वे कविता की हौसला अफजाई को सलाम करती हैं, जो जीवन में इतनी बड़ी घटना होने के बाद भी एक नए जीवन की शुरुआत करते हुए आज हिंदुस्तान की कई महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी हैं. ऐसी महिलाओं को स्पोर्ट करने की जरूरत है. दृढ़ इच्छाशक्ति, गरिमा और उद्देश्य के बल पर पीड़ित होने की स्थिति से परे एक नई पहचान बनाई है। ऐसा करके उन्होंने यह साबित कर दिया है कि मानवता अपने सबसे सच्चे और वास्तविक रूप में आराम में नहीं, बल्कि साहस में विद्यमान होती है। वे हममें से अधिकांश लोगों से कहीं बेहतर, साहसी और मानवीय हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि हिंसा और अन्याय से भरी दुनिया में भी मानवीय भावना तेजाब से भी तेज और नफरत से भी अधिक शक्तिशाली हो सकती है। और अपनी कहानियों के माध्यम से वे अनगिनत लोगों को अपनी आवाज़, अपने सपनों और अपनी नियति को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती हैं।यह सिर्फ उनकी कहानी नहीं है। यह उन सभी लोगों के लिए एक आह्वान है जो पीड़ा झेल रहे हैं—उठो, लड़ो और उस अंधकार से कभी परिभाषित न हो जो वे सह रहे हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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