डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
, आईटीबीपी जवानों को औली में एडवेंचर स्पोर्ट्स की विशेष ट्रेनिंग दी जाती है. हाई एल्टीट्यूड में सर्वाइवल की ट्रेनिंग दी जाती है. इस बल के जवान माउंटेनिय.ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सीमा क्षेत्र में निर्माण कार्य भी चुनौतीपूर्ण रहता है. काम करने वाले श्रमिकों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ता है. उत्तर भारत के अधिकतर इलाके इन दिनों शीत लहर की चपेट में है। दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश, न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे है। इतने कम तापमान में ही हमारी कंपकंपी छूट रही है। अब जरा कल्पना कीजिए। तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से भी कम हो तो क्या हो? कुल्फी जम जाएगी। मगर उस -30 डिग्री वाली ठंड में भी भारतीय सेना के जवान पूर्व लद्दाख की उन चोटियों पर काबिज हैं जिनपर चीन कब्जा चाहता है। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ है और बर्फ की उसी चादर पर कैंप लगाए हमारे जवान दिन-रात मुस्तैद रहते हैं ताकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के किसी भी नापाक मंसूबे को नाकाम किया जा सके।चीन-तिब्बत सीमा से सटे दुर्गम और ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात आईटीबीपी जवानों को सर्दियों में पेयजल संकट से निजात दिलाने की कवायद तेज हो गई है. अत्यधिक ठंड में नदी-नाले और प्राकृतिक जलस्रोत जम जाने से प्रभावित होने वाली पेयजल व्यवस्था के स्थायी समाधान के लिए सीमा चौकियों पर बोरिंग आधारित जलापूर्ति योजना तैयार की जा रही है. करीब एक करोड़ रुपये की इस योजना के तहत नौ स्थानों पर बोरिंग की जानी है. इनमें सात स्थानों पर बोरिंग का काम पूरा हो चुका है.आईटीबीपी की ओर से उपलब्ध कराई गई धनराशि से जल संस्थान योजना को धरातल पर उतार रहा है. नेलांग, कोपांग, नागा, पीडीए, सुमला, सोनम और त्रिपानी स्थित सीमा चौकियों पर बोरिंग पूरी कर ली गई है. अधिकारियों के अनुसार प्रत्येक बोरिंग से 100 लीटर प्रति मिनट से अधिक पानी मिलने की उम्मीद है. शेष दो स्थानों पर भी कार्य आगे बढ़ाया जाना है.योजना के अगले चरण में बोरिंग से प्राप्त पानी को सुरक्षित रखने के लिए टैंक बनाए जाएंगे. इसके साथ ही भूमिगत पाइपलाइन और डीजल जनरेटर भी लगाए जाएंगे, जिससे अत्यधिक ठंड और प्रतिकूल मौसम में भी जलापूर्ति व्यवस्था को संचालित रखा जा सके. फिलहाल योजना की डीपीआर में कुछ संशोधन प्रस्तावित हैं. इसके लिए संशोधित डीपीआर भेजी गई है. मौसम अनुकूल होते ही सिविल वर्क शुरू कराया जाएगा. सीमा चौकियों पर वर्तमान में कई स्थानों पर गुरुत्व आधारित पेयजल व्यवस्था से पानी पहुंचाया जा रहा है. सर्दियों में तापमान बेहद कम होने के कारण प्राकृतिक जलस्रोत, नदी और नाले जम जाते हैं. इससे जवानों के लिए नियमित पेयजल उपलब्ध कराना चुनौती बन जाता है. वहीं, अत्यधिक ऊंचाई और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण सीमा क्षेत्र में निर्माण कार्य भी चुनौतीपूर्ण रहता है. काम करने वाले श्रमिकों के स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ता है. उत्तर भारत के अधिकतर इलाके इन दिनों शीत लहर की चपेट में है। दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश, न्यूनतम तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे है। इतने कम तापमान में ही हमारी कंपकंपी छूट रही है। अब जरा कल्पना कीजिए। तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से भी कम हो तो क्या हो? कुल्फी जम जाएगी। मगर उस -30 डिग्री वाली ठंड में भी भारतीय सेना के जवान पूर्व लद्दाख की उन चोटियों पर काबिज हैं जिनपर चीन कब्जा चाहता है। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ है और बर्फ की उसी चादर पर कैंप लगाए हमारे जवान दिन-रात मुस्तैद रहते हैं ताकि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के किसी भी नापाक मंसूबे को नाकाम किया जा सके।विपरीत हालात में खुद को बचाने के साथ दुश्मन पर कैसे वार किया जाए, ये ट्रेनिंग का खास हिस्सा होता है. स्कीइंग इन जवानों की अपने रणकौशल का हिस्सा है. ट्रेनिंग के दौरान आईटीबीपी जवानों को बर्फीले मौसम में दुश्मन के मिशन को नाकाम करना सिखाया जाता है. साथ ही पलटवार करना सिखाया जाता है. .लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











