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आयुर्वेद शोध संस्थान उम्मीद को फिर एक बार पंख नहीं

29/10/24
in उत्तराखंड, चमोली, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

आयुर्वेद के जनक चरक ऋषि की कर्मस्थली चरेख डांडा में अंतरर्राष्ट्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान खुलने की
उम्मीद को फिर एक बार पंख नहीं लग गए हैं। करीब 10 वर्ष पूर्व की गई यह घोषणा सरकारी फाइलों में
दबी थी। राज्य सरकार ने अब इसके लिए बजट में व्यवस्था कर दी है। जून 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री
ने कोटद्वार भ्रमण के दौरान चरेख डांडा में अंतरर्राष्ट्रीय आयुर्वेद शोध संस्थान खोलने की घोषणा की थी।
मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप शासन से इस संबंध में शासनादेश भी जारी किया, लेकिन यह योजना
परवान नहीं चढ़ी। अब राज्य सरकार ने फिर इस ओर कदम उठाए हैं।आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए बजट
में और भी व्यवस्था की गई है। इनमें वह योजनाएं भी शामिल हैं, जिन्हें लेकर घोषणाएं जरूर हुई पर वह
अमल में नहीं आई। मसलन बजट में प्रत्येक जनपद में संपूर्ण सुविधा युक्त आयुष ग्राम की स्थापना की बात
कही गई है। इसके अलावा प्रत्येक चिकित्सालय जहां पर्याप्त भूमि है, वहां हर्बल गार्डन की स्थापना की
जाएगी। आयुर्वेद विधा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रत्येक जनपद में आरोग्य मेला व कैंप भी आयोजित किए
जाएंगे। इस अलावा राज्य सरकार प्रदेश में योग, आयुर्वेद आदि के विकास के लिए निजी क्षेत्र की
सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए शीघ्र नीति तैयार करेगी।उत्तराखंड सरकार प्रदेश को आयुष प्रदेश
बनाने की दिशा में तमाम पहल कर रही है. इसी क्रम में आयुष विभाग ने आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को
बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के 186 गांवों को चिन्हित किया है. जिनमें से हर एक गांव में एक ही तरह के
जड़ी बूटियों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा. इससे इन गावों की पहचान उनकी जड़ी बूटियों के नाम
से होगी. इसके लिए आयुर्वेद विभाग की ओर से ग्रामीणों को जड़ी-बूटी के पौधे भी दिए जा रहे हैं. जिससे
संबंधित रिपोर्ट आयुष विभाग ने आयुष मंत्रालय, भारत सरकार को भी भेजी है.प्रदेश के अल्मोड़ा जिले के
35 गांव, बागेश्वर के 12 गांव, पिथौरागढ़ जिले के 23 गांव, रुद्रप्रयाग जिले के पांच गांव, टिहरी जिले के
24 गांव, चमोली जिले के चार, हरिद्वार जिले के तीन गांव, नैनीताल जिले के 15 गांव, पौड़ी जिले के 42
गांव, ऊधमसिंह नगर जिले के 10 गांव और उत्तरकाशी जिले के 13 गांवों को जड़ी बूटी ग्राम बनाने को
लेकर चिन्हित किया गया है. जिन्हें जड़ी बूटियों के पौधे दिए जा रहे हैं. इसके अलावा, आयुष विभाग अगले
महीने से प्रदेश के 3900 स्कूलों में आयुर्विद्या कार्यक्रम भी शुरू करने जा रहा है. जिसके तहत आयुर्वेद
डॉक्टर, स्कूलों में जाकर बच्चों को आयुष चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूक करेंगे.आयुष सचिव ने बताया
प्रदेश के तमाम गांव को एक-एक जड़ी बूटी के साथ जोड़ना चाहते हैं, ताकि एक गांव में एक जड़ी बूटी का
उत्पादन अत्यधिक हो. लिहाजा, विभाग इस योजना पर काम कर रहा है. ऐसे में अगर एक गांव एक ही
जड़ी बूटी का उत्पादन करता है तो इससे लोगों में जड़ी बूटियां के प्रति न सिर्फ जानकारी बढ़ेगी, बल्कि एक
साथ बड़ी मात्रा में जड़ी बूटियां का उत्पादन भी हो सकेगा. जिससे जड़ी बूटियां को बेचने में भी काफी

सहूलियत होगी. आयुष सचिव ने कहा इस योजना के तहत आयुष विभाग, अपने हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर के
जरिए ग्रामीणों को जड़ी बूटियों के पौधे दे रहा है. कोशिश की जा रही है की एक गांव में एक तरह के ही
जड़ी बूटियां का उत्पादन किया जाये. उत्तराखंड राज्य गठन के बाद, राज्य की भारतीय चिकित्सा परिषद
ने उत्तर प्रदेश के आयुष चिकित्सकों के पंजीकरण को वैध मानते हुए उन्हें उत्तराखंड में पंजीकृत किया था।
उस समय का नियम यह था कि यूपी में पंजीकृत आयुष चिकित्सक उत्तराखंड में भी अपनी प्रैक्टिस जारी
रख सकते थे। हालांकि, समय के साथ इस नियम का दुरुपयोग होने लगा। वर्ष 2019 से मार्च 2022 तक,
उत्तराखंड में भारतीय चिकित्सा परिषद ने उन डिप्लोमा धारकों को भी पंजीकृत करना शुरू कर दिया,
जिनके पास अन्य राज्यों के डिप्लोमा थे, लेकिन वे डिप्लोमा मान्यता प्राप्त नहीं थे।उत्तरांचल (संयुक्त प्रांत
भारतीय चिकित्सा अधिनियम 1939) अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश 2002 की धारा 27, 28, 29, 30 के
तहत नए डिप्लोमाधारकों को भी पंजीकरण देने की प्रक्रिया शुरू हुई। वर्ष 2019 से 2022 तक 500 से
अधिक आयुष और यूनानी डिप्लोमा धारकों को पंजीकरण दिया गया, जो अब विभिन्न स्थानों पर प्रैक्टिस
कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश चिकित्सकों के पास डीआईयूएम (डिप्लोमा इन यूनानी मेडिसिन) या
डीआईएएम (डिप्लोमा इन आयुर्वेदिक मेडिसिन) जैसे डिप्लोमा थे, जिनकी मान्यता को लेकर कई विवाद
उठे हैं।उत्तराखंड राज्य गठन के बाद, राज्य की भारतीय चिकित्सा परिषद ने उत्तर प्रदेश के आयुष
चिकित्सकों के पंजीकरण को वैध मानते हुए उन्हें उत्तराखंड में पंजीकृत किया था। उस समय का नियम यह
था कि यूपी में पंजीकृत आयुष चिकित्सक उत्तराखंड में भी अपनी प्रैक्टिस जारी रख सकते थे। हालांकि,
समय के साथ इस नियम का दुरुपयोग होने लगा। वर्ष 2019 से मार्च 2022 तक, उत्तराखंड में भारतीय
चिकित्सा परिषद ने उन डिप्लोमा धारकों को भी पंजीकृत करना शुरू कर दिया, जिनके पास अन्य राज्यों
के डिप्लोमा थे, लेकिन वे डिप्लोमा मान्यता प्राप्त नहीं थे।उत्तरांचल (संयुक्त प्रांत भारतीय चिकित्सा
अधिनियम 1939) अनुकूलन एवं उपांतरण आदेश 2002 की धारा 27, 28, 29, 30 के तहत नए
डिप्लोमाधारकों को भी पंजीकरण देने की प्रक्रिया शुरू हुई। वर्ष 2019 से 2022 तक 500 से अधिक आयुष
और यूनानी डिप्लोमा धारकों को पंजीकरण दिया गया, जो अब विभिन्न स्थानों पर प्रैक्टिस कर रहे हैं।
इनमें से अधिकांश चिकित्सकों के पास डीआईयूएम (डिप्लोमा इन यूनानी मेडिसिन) या डीआईएएम
(डिप्लोमा इन आयुर्वेदिक मेडिसिन) जैसे डिप्लोमा थे, जिनकी मान्यता को लेकर कई विवाद उठे हैं।
उत्तराखंड पहली बार अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेद सम्मेलन की मेज़बानी करेगा, जिसका आयोजन 12 से 15
दिसंबर तक एफआरआई देहरादून में होगा। आयुष मंत्रालय ने इस आयोजन की जिम्मेदारी उत्तराखंड को
सौंप दी है और आयुर्वेद विभाग ने सम्मेलन की तैयारियों को लेकर काम शुरू कर दिया है। सम्मेलन में
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थानों के विशेषज्ञ, आयुष फार्मा कंपनियों के प्रतिनिधि और अन्य प्रमुख
वक्ता आयुष चिकित्सा और इसके संभावनाओं पर विचार-विमर्श करेंगे।इस सम्मेलन का उद्देश्य उत्तराखंड
को आयुष हब के रूप में स्थापित करना है। इसमें 8 से 10 देशों के प्रतिनिधि भाग लेंगे और विभिन्न आयुष
चिकित्सा एवं शोध संस्थानों के विशेषज्ञ आयुष चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए चर्चा करेंगे। सम्मेलन के

दौरान राज्य में आयुष और वेलनेस क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करने के लिए कंपनियों के साथ एमओयू
करने की योजना भी बनाई जा रही है। कोरोना काल में लोगों का आयुर्वेद पर विश्वास बढ़ा है। कोरोना से
जंग के लिए ज्यादातर लोग घरों में काढ़ा तैयार कर पी रहे हैं, क्योंकि कोरोना के इलाज के लिए अभी तक
कोई दवा उपलब्ध नहीं है। कोरोना को वे ही लोग मात दे पा रहे हैं, जिनका इम्युन सिस्टम स्ट्रांग है।
इम्युनिटी के लिए आयुर्वेद को ही सर्वोत्तम माना गया है। लोगों ने पुरातन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को
अपनाया भी है।गिलोय, कालीमिर्च, अश्वगंधा, अदरक व तुलसी आदि के उपयोग के साथ आयुर्वेद औषधियों
की डिमांड भी बढ़ी है। वहीं घरों में ताजा व संतुलित आहार भी इम्युन सिस्टम को स्ट्रांग बनाए हुए है।
आयुष मंत्रालय ने भी गिलोय, पिप्पल, अश्वगंधा व आयुष 64 पर ट्रायल शुरू किए तो उसके परिणाम
बेहतर मिले हैं। कोरोनाकाल में आयुर्वेद का महत्व आयुर्वेद दवाइयों के आए सकारात्मक परिणाम कोरोना
काल में आयुर्वेद औषधियां प्रभावी सिद्ध हुई हैं। आईसीएमआर ने जिन एलोपैथी दवाओं और प्लाज्मा के
इस्तेमाल को झंडी दी थी, उन्हें ही बाद में बेअसर बता दिया। एंटीवायरल दवा के मुकाबले संक्रमण के
दौरान गिलोय व अश्वगंधा के बेहतर सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। आयुष मंत्रालय ने भी इन्हें
असरकारक बताया तो लोगों में और विश्वास पैदा हो गया। अब लोग घरों में अपने स्तर पर काढ़ा बनाकर
पी रहे हैं। सरल शब्दों में कहें तो स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही आयुर्वेद का उद्देश्य है।
आचार्यों द्वारा संहिताओं में वर्णित उपायों का सरल अर्थ लेते हुए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आरोग्य प्राप्ति एवं संतुलित जीवन हेतु समुचित आहार (फूड), विहार (ऐक्टिविटी), आचार (हेबिट्स) एवं
विचार (थॉट्स) आवश्यक हैं।

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