डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जिस सुसवा नदी को कभी देहरादून की जीवनरेखा कहा जाता था, आज उस नदी से सरकार और प्रशासन रुसवा नजर आ रहे है. सरकार के दावों से उलट सुसवा नदी गंदे नाले में तब्दील होती दिख रही है. काला पड़ता पानी, प्लास्टिक, झाग की परतें और बदबू अब सुसवा की पहचान बन चुके हैं. हिमालय की गोद में बसे देहरादून जैसे शहर में अगर नदी का यह हाल है तो हालात केवल पर्यावरण संकट तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि खेती और आजीविका पर भी सीधा खतरा बन जाते हैं. बासमती सुसवा नदी आज स्वरूप के साथ अपनी पहचान भी बदल चुकी है. कभी जीवनदायिनी कही जानी सुसवा को लोग अब अभिशाप मानने लगे हैं. बड़ी बात यह है कि नदी के किनारे बसे दुधली क्षेत्र में कैंसर के मामले बढ़ने लगे हैं. स्थानीय लोग इन मामलों के लिए इसे ही जिम्मेदार बताने लगे हैं. जानिए सुसवा नदी के पानी पर आज क्यों उठने लगे हैं सवाल.नदियों के किनारे सभ्यताएं जन्मीं और इसका विकास भी हुआ. देहरादून की सुसवा नदी के किनारे भी इसके स्वच्छ जल के कारण एक बड़ी आबादी ने ना केवल खेती-बाड़ी में इसके पानी का उपयोग किया, बल्कि यहां बड़ा रिहायशी क्षेत्र भी विकसित हुआ. लेकिन पिछले दो दशक में तेजी से नदी का स्वरूप बदला है. स्थिति ये है कि अपने जलस्तर से लेकर पानी के रंग और इसकी निर्मलता में भी जबदस्त बदलाव आया. बात सिर्फ शहर के बदले स्वरूप के चलते नदी में आए बदलाव की ही नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर दिखाई देने वाले इसके असर की भी है. दून शहर की रिस्पना और बिंदाल नदियों के पानी से ही बनने वाली सुसवा आज प्रदूषित हो चुकी है. इसमें प्रदूषण किस हद तक हो चुका है, इसके लिए किसी रिपोर्ट की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे देखकर ही कोई भी यह कह सकता है कि सुसवा नदी का पानी अब पीने लायक तो दूर सिंचाई योग्य भी नहीं है. बहरहाल नई चिंता नदी को लेकर उन दावों से बढ़ गई है, जिनमें इस नदी को बीमारी देने वाली नदी के रूप में बताया जाने लगा है. हैरानी की बात यह है कि ऐसा कहने वाले वही लोग हैं, जो कभी इसे जीवनदायिनी कहते थे. दरअसल दुधली क्षेत्र के ही कुछ इलाकों में कैंसर के मामले बढ़ने की बात कही जा रही है. बड़ी बात यह है कि लोग कैंसर रोग के पीछे सुसवा नदी के गंदे पानी को ही वजह बता रहे हैं. इस क्षेत्र में अधिकतर लोग जो पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं, वह खेती पर ही निर्भर हैं. यह क्षेत्र कभी बासमती चावल के लिए जाना जाता था, लेकिन समय के साथ बासमती की सुगंध यहां से खत्म होती चली गई. दावा ये भी है कि सिंचाई के लिए खेतों में सुसवा नदी का पानी उपयोग करने के चलते कई फसलें ठीक से पैदा ही नहीं हो पातीं. उधर दूसरी तरफ खेतों में जाने वाले किसानों को त्वचा रोग हो रहा है. उमेद सिंह अपने पैरों को दिखाते हुए बताते हैं कि वह खेतों में उसी पानी में खेती करते हैं इसलिए उनके पांव पर भी दाग धब्बे हो गए हैं. ऐसे ही क्षेत्र के कई लोगों को त्वचा कैंसर जैसी समस्या से भी गुजरना पड़ रहा है. देहरादून शहर से बहने वाली दो नदियों से मिलकर बिंदाल और रिस्पना का निर्माण करती हैं. दोनों नदियों में पूरे शहर की गंदगी मिलती है जो सुसवा में जाकर उसके पानी को जहरीला बना देती है. जधानी दून की सुसवा नदी का सच यह है कि इसका पानी पूरी तरह जहर बन चुका है। खुद सरकार भी मानती है कि सुसवा नदी का पानी पीने, नहाने, पशुओं यहां तक कि खेती के योग्य भी नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता कि सुसवा नदी पूरी तरह पॉल्यूटेड हो चुकी है। इसका पानी इतना जहरीला हो चुका है कि यह किसी यूज में नहीं लाया जा सकता। लेकिन सुसवा नदी के किनारे बसे लोगों के सामने कोई विकल्प नहीं है। वह लगातार इस पानी का यूज कर रहे हैं, जिससे वह कैंसर और स्किन समेत कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। पिछले दो साल में दुधली क्षेत्र में 10 से ज्यादा लोगों की कैंसर से मौत होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, इस मामले की जांच की जरूरत है। सुसवा के पानी से दुधली क्षेत्र ही नहीं, बल्कि इस नदी के आखिरी तक सभी लोग प्रभावित हैं। सुसवा नदी डोईवाला से होते हुए छिद्रवाला, रायवाला होते हुए हरिद्वार में गंगा में मिल रही है। इस बीच सुसवा में वन विभाग की तीन वन रेंज आती है। चीला रामगढ़, कांसरो व मोती चूर। वाइल्ड लाइफ एरिया होने के कारण यहां पर जानवर इसी पानी पीते हैं। आशंका है कि जंगली जानवर भी इस पानी से बीमार हो सकते हंै। क्योंकि यूकेईपीपीसीबी ने पानी को जानवरों के लिए भी खतरा बताया है। देहरादून की सुसवा नदी का जहरीला पानी किसानों के लिए मुसीबत बन गया है। नदी के आसपास के इलाकों में इस पानी की वजह से लोगों ने बासमती की खेती बंद कर दी है। किसानों का कहना है कि सुसवा नदी के पानी से सिंचाई करने की वजह से कई को गंभीर चर्म रोग हो गए। देहरादून को हिमालय का प्रवेश द्वार और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील शहर के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन सुसवा की हालत सरकार और सिस्टम दोनों पर सवाल खड़े करती है. क्या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सही तरीके से काम कर रहे हैं? औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले गंदे पानी की प्रभावी निगरानी क्यों नहीं हो पा रही?नदी पुनर्जीवन की योजनाएं फाइलों से बाहर जमीन पर क्यों नहीं दिखतीं? नदियां केवल पानी की धाराएं नहीं होतीं, वे खेती, पर्यावरण और जीवन का आधार होती हैं. अगर देहरादून जैसे हिमालयी शहर अपनी नदी नहीं बचा पा रहे हैं तो इसका असर अंततः गंगा और उससे जुड़े करोड़ों लोगों तक पहुंचेगा. सुस्वा नदी शिवालिक घाटी से निकलती है और देहरादून शहर की दो प्रमुख नदियों, रिस्पना और बिंदल का जल इसमें मिल जाता है। यह नदी आसारोडी क्षेत्र से होते हुए दुधली क्षेत्र में बहती है और लच्छीवाला के पास सोंग नदी में मिल जाती है। सोंग नदी फिर डोईवाला से बहती हुई रायवाला पहुँचती है, जहाँ यह गंगा में मिल जाती है। कुछ साल पहले तक स्वच्छ और अपने निर्मल जल के लिए मशहूर सुसवा नदी से पानी को ग्रामवासी पीने के रूप में प्रयोग करते थे. इस नदी में मछलियों का वास था और औषधीय सुसवा साग भी इस नदी में उगता था. यह साग आर्युवेद औषधियों से भरा होता है और इसी सुसवा साग की वजह से इस नदी का नाम सुसवा नदी पड़ गया. एक दशक पहले तक इस सुसुवा नदी का पानी स्वच्छ और निर्मल था और इस पानी को सभी लोग पीने और अन्य कामों में प्रयोग में लाते थे लेकिन अब इस नदी में देहरादून के सारे गंदे नाले छोड़ दिए गए हैं जिससे अब पूरी नदी सीवर में तब्दील हो गई है और इस गंदगी के चलते जैविक खेती का सपना देख रहे हैं किसान चिंतित है
किसान उम्मेद सिंह बोरा ने बताया कि देहरादून की बासमती जोकि कोहिनूर बासमती के नाम से जानी जाती थी और यह बासमती विदेशों तक मैं भेजी जाती थी और इस बासमती से किसानों को भारी मुनाफा मिलता था लेकिन नदी में गंदे नाले छोड़ने की वजह से इस नदी का पानी विषैला हो गया है और यह पानी खेती हो बर्बाद कर रहा है वही बासमती की खेती को भी इस पानी ने खत्म कर दिया है जिससे किसानों ने बासमती की खेती करना छोड़ दिया है और इस बासमती की खुशबू जो विदेशों तक में मशहूर थी वह खत्म हो गई है लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











