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भागीरथी क्षेत्र में अवैज्ञानिक विकास से आपदा का खतरा

04/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भागीरथी इको सेंसिटिव जोन उत्तरकाशी जिले के उस हिस्से में फैला हुआ है जहां से भागीरथी नदी का उद्गम क्षेत्र और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र जुड़ा हुआ है. यह क्षेत्र गंगोत्री धाम और गंगोत्री ग्लेशियर के आसपास के पर्वतीय इलाकों को भी समेटे हुए है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.इस पूरे इको सेंसिटिव जोन का क्षेत्रफल लगभग 4000 वर्ग किलोमीटर बताया जाता है. इस विशाल क्षेत्र में करीब 60 से 62 हजार लोगों की आबादी रहती है. खास बात यह है कि इस क्षेत्र का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा या तो रिजर्व फॉरेस्ट है या फिर संरक्षित क्षेत्र, जिसमें गंगोत्री बायोस्फियर रिजर्व जैसे संरक्षित इलाके शामिल हैं. यानी कुल मिलाकर यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है. यही कारण है कि इस क्षेत्र में विकास गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए इसे इको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया था. हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्य, सड़क परियोजनाएं और पर्यटन गतिविधियां लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं. पर्यावरणविद् का मानना रहा है कि यदि इन गतिविधियों को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है. भागीरथी नदी का उद्गम क्षेत्र होने के कारण यह इलाका गंगा नदी प्रणाली के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है. इसलिए यहां की पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार ने इसे इको सेंसिटिव जोन घोषित किया था. इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि यहां विकास गतिविधियां पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप ही हों. हिमालयी क्षेत्रों में हाल के वर्षों में भूस्खलन, बादल फटना और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी देखी गई है. अध्ययन में यह समझने की कोशिश की जाएगी कि इन आपदाओं के पीछे कौन-कौन से प्राकृतिक और मानवजनित कारण जिम्मेदार हैं.  इको सेंसिटिव जोन के नियमों के कारण स्थानीय लोगों को कई प्रकार की व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कई बार छोटे-छोटे निर्माण कार्यों या विकास योजनाओं के लिए भी लंबी अनुमति प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. अध्ययन में खासतौर पर नदी के किनारे बसे इलाकों और उन क्षेत्रों का ब्यौरा तैयार किया जाएगा जहां इको सेंसिटिव जोन की पाबंदियों के कारण लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा उन मामलों की भी जानकारी जुटाई जाएगी जिनमें किसी कार्य की अनुमति लेने में काफी समय लग रहा है.यही नहीं ऐसे मामलों का भी विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा जो, हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे हैं. इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किन कारणों से विवाद या कानूनी चुनौतियां सामने आती हैं.  इस पूरे अध्ययन और उससे जुड़े निर्देशों को लेकर सरकार ने एक समय सीमा भी तय की है. जानकारी के अनुसार जून महीने में एक बार फिर बैठक आयोजित की जाएगी जिसमें यह समीक्षा की जाएगी कि अब तक दिए गए निर्देशों पर कितना काम हुआ है और आगे की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी. इस बैठक में अध्ययन की प्रगति, स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए डाटा और विभिन्न विभागों की रिपोर्ट पर भी चर्चा होने की संभावना है. भागीरथी इको सेंसिटिव जोन हिमालयी पारिस्थितिकी का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह क्षेत्र गंगा नदी के उद्गम से जुड़ा होने के कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्व रखता है. यदि यहां की पर्यावरणीय स्थिति प्रभावित होती है तो इसका असर दूर तक पड़ सकता है. इसी कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह का व्यापक अध्ययन न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. हिमालय में ऐसे कई स्थान मौजूद हैं, इसलिए इनकी सिस्टमेटिक पहचान, सैटेलाइट आधारित निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों का हिस्सा बनाना आवश्यक है। इस प्रकार, धराली फ्लैश फ्लड की घटना यह दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण हिमालय में नए प्रकार के प्राकृतिक खतरे उभर रहे हैं। इन खतरों से निपटने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, सतत निगरानी और प्रभावी आपदा प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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