डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
द्वितीय केदार के नाम से विश्व विख्यात मदमहेश्वर धाम से लगभग 20 किमी दूरी पर सुरम्य मखमली बुग्यालों के मध्य स्थित पाण्डव सेरा क्षेत्र धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत तथा अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह स्थल न केवल श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र है, बल्कि इतिहास प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। मान्यता है कि केदारनाथ में भगवान शिव के दर्शन के बाद भू-बैकुंठ बदरीनाथ धाम गमन के समय पाण्डवों ने इस क्षेत्र में लम्बे अन्तराल तक निवास किया था तथा यहां के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर अपने समय को सुगम बनाने हेतु धान की रौपाई के लिए सिंचाई गुल का निर्माण किया
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार पाण्डव सेरा क्षेत्र को पवित्र तपोभूमि माना जाता है। कहा जाता है कि पाण्डवों ने यहां तप-साधना कर भगवान शिव की आराधना की थी। क्षेत्र में स्थित प्राचीन शिला-स्थल, जलस्रोत तथा देवस्थल आज भी श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के केन्द्र हैं। विशेष पर्वों एवं धार्मिक अवसरों पर दूर-दराज से श्रद्धालु यहाँ दर्शन हेतु पहुँचते हैं। शांत वातावरण, देवदार व बांज के घने वन तथा कल-कल बहते जलस्रोत इस स्थान को आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण बनाते हैं।
प्राचीन जल प्रबंधन का अद्भुत उदाहरण पाण्डव सेरा की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर यहाँ स्थित पाण्डवकालीन सिंचाई गूल है। यह गूल पर्वतीय ढलानों से निकलने वाले जल को खेतों तक पहुँचाने हेतु निर्मित की गई थी। पत्थरों व मिट्टी से निर्मित यह जलधारा प्राचीन भारतीय जल प्रबंधन प्रणाली की उत्कृष्ट मिसाल के साथ पाण्डवो के हिमालय आगमन की साक्षी है।
पाण्डव सेरा क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है। चारों ओर फैले हरे-भरे जंगल, हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएँ, स्वच्छ जलधाराएँ तथा विविध वनस्पतियाँ इस क्षेत्र को पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं। प्रातःकाल यहाँ उठती धुंध, पक्षियों का कलरव तथा शांत वातावरण मन को अद्भुत शांति प्रदान करता है। यह स्थल पर्यावरण पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत संभावनाशील है।
पाण्डव सेरा तक पहुँचने हेतु पैदल यात्रा का मार्ग अत्यंत रमणीय एवं रोमांचकारी है। मदमहेश्वर धाम से लगभग 20 किलोमीटर लंबा यह ट्रैक घने जंगलों, पर्वतीय पगडंडियों एवं प्राकृतिक जलस्रोतों से होकर गुजरता है। यात्रा के दौरान यात्रियों को बाँज, बुरांश व देवदार के वृक्षों की छाया मिलती है। मार्ग में छोटे-छोटे झरने, पक्षियों की चहचहाहट तथा पर्वतीय दृश्य यात्रा को अविस्मरणीय बना देते हैं। हल्की चढ़ाई वाला यह ट्रैक श्रद्धालुओं, पर्यटकों तथा शोधकर्ताओं के लिए समान रूप से आकर्षक है।
संरक्षण एवं पर्यटन की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि पाण्डव सेरा क्षेत्र को धार्मिक पर्यटन एवं पर्यावरण पर्यटन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। साथ ही, पाण्डवकालीन सिंचाई गूल जैसी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण हेतु सरकारी स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। गौण्डार के पूर्व प्रधान भगत सिंह पंवार बताते हैं कि पाण्डव सेरा न केवल अतीत की गौरवशाली विरासत का प्रतीक है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रकृति और संस्कृति के संरक्षण का संदेश भी देता है ।
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं











