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राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी गैरसैंण मुख्यालय नहीं

10/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भौगोलिक दृष्टि से गैरसैंण जहां उत्तराखंड का मध्य स्थल है वहीं उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान भी गैरसैंण आंदोलनों की धूरी बना हुआ था. ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने के बाद से अब बदली हुई परिस्थितियों में ‘गैरसैंण गैर किल्लै’ की भावनाओं से आगे निकलकर अब परिदृश्य ‘संभावनाओं का गैरसैंण’ में बदलता दिखाई दे रहा है.ग्रीष्मकालीन राजधानी में अब तक किए गए 8 हजार करोड़ रुपए के ढांचागत निर्माण के विकास के साथ आगे की संभावनाओं को लेकर गैरसैंणवासियों के साथ ही उत्तराखंड के आम जनमानस की उम्मीदें भी लगातार मजबूत हुई हैं. बात करें वर्ष 2013 की तो तब कांग्रेस की सरकार के दौरान उत्तराखंड के कद्दावर नेता की जिद पर भराडीसैंण में विधानसभा के भूमि पूजन ने तब शुरुआती खूंटा गाड़ने का काम किया था. जिसके बाद वर्ष 2015 में तब की सरकार ने भराड़ीसैंण की कुल 47 एकड़ भूमि पर विधानसभा परिसर का निर्माण शुरू करवाया था. जिसने पहाड़ी क्षेत्रों के साथ ही उत्तराखंड के आंदोलनकारियों की भावनाओं को संजीवनी देने का काम किया था.सबि धाणी देरादून, होणी खाणी देरादून प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी के गीत के यह बोल उत्तराखंड के सरकारी विभागों के मुख्यालयों को लेकर सही साबित हो रहे हैं। देहरादून में जहां 204 सरकारी विभागों के मुख्यालय हैं, वहीं, ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण भराणीसैंण में राज्य गठन के 25 साल बाद भी सरकारी मुख्यालय की स्थापना नहीं हुई।उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2020 में गैरसैंण राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित की थी। उस समय यह भी घोषणा की गई थी कि राज्य के विभिन्न ठिकानों और इकाइयों के मुख्यालयों को धीरे-धीरे यहां स्थापित किया जाएगा, ताकि पर्वतीय क्षेत्रों का विकास हो सके और संतुलन बनाया जा सके।इसी क्रम में उस समय की सरकार ने गैरसैंण भाषा संस्थान का मुख्यालय स्थापित करने की भी घोषणा की थी। आशा की गई थी कि इसके बाद सबसे पहले अन्य संस्थान और सरकारी कार्यालय भी धीरे-धीरे गैरसैंण में स्थापित किए जाएंगे।प्रदेश में स्थानीय बोलियों और समुद्र तटों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उत्तराखंड भाषा संस्थान की स्थापना की गई थी। लेकिन स्थापना के कई वर्षों बाद भी इस संस्थान को स्थायी मुख्यालय नहीं मिल सका।दिलचस्प बात यह है कि गैरसैंण में मुख्यालय स्थापित करने की घोषणा के बाद भी अब इसके लिए कार्यालय में ही जमीन तलाशने की प्रक्रिया चल रही है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में सरकारी आवेदकों को गैरसैंण या अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरण करने की योजना पर नामांकन से काम किया जा रहा है या नहीं। राज्य में सरकारी मुख्यालयों की अत्यधिक केंद्रीकरण हो गया है। रुद्रप्रयाग, , बागेश्वर और चंपावत जैसे कई पर्वतीय आचलों में आज तक किसी भी विभाग का मुख्यालय स्थापित नहीं किया गया है।उनका कहना है कि कुल 265 बिजली मुख्यालयों में से लगभग 77 प्रतिशत मुख्यालय ही स्थित हैं। इस सब्सक्रिप्शन व्यवस्था का संतुलन और पहाड़ी क्षेत्रों का विकास भी प्रभावित होता है।गैरसैंण को राजधानी बनाने का विचार उत्तराखंड राज्य स्थापना आंदोलन के समय से ही चला आ रहा है। उत्तर प्रदेश से अलग होने के अभियान का नेतृत्व करने वाले कार्यकर्ताओं ने कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों के बीच स्थित गैरसैंण कस्बे को आदर्श राजधानी के रूप में देखा था, जो पहाड़ी लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता था।हालांकि, नवंबर 2000 में उत्तराखंड के गठन के समय, गैरसैंण में बुनियादी ढांचे की कमी के कारण राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व ने अस्थायी रूप से देहरादून को राजधानी बना दिया। तब से, स्थायी राजधानी का मुद्दा राज्य और राष्ट्रीय चुनावों के दौरान फिर से उठता है, लेकिन उसके बाद जल्दी ही शांत हो जाता है।यहां तक ​​कि उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी), जो राज्य गठन आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली क्षेत्रीय पार्टी थी, भी इस गति को बनाए रखने में विफल रही। वर्षों से दोनों के साथ गठबंधन करने के बावजूद, यूकेडी ने अपने मूलभूत वादों के बजाय मंत्री पद के विशेषाधिकारों को प्राथमिकता देकर अपनी विश्वसनीयता खो दी।बढ़ती मांग को शांत करने के लिए, त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली सरकार ने गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया। लेकिन प्रतीकात्मक कदम पर्याप्त नहीं रहे हैं। दरअसल, एक शीतकालीन सत्र के दौरान, कई विधायकों ने खराब मौसम का हवाला देते हुए विधानसभा सत्र को गैरसैंण से कहीं और स्थानांतरित करने का अनुरोध अध्यक्ष से किया था—यह एक हास्यास्पद बहाना है, क्योंकि राज्य का गठन पहाड़ी क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व के लिए किया गया था।अब, 2027 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं,एक बार फिर गैरसैंण मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है—वे स्पष्ट रूप से पहाड़ी निवासियों के बीच इसके भावनात्मक महत्व से अवगत हैं। हालांकि, उनकी विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है। अतीत में कार्रवाई करने की शक्ति होने के बावजूद, उनमें गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव रहा है।गैरसैंण को राजधानी के रूप में विकसित करने से न केवल प्रशासनिक शक्ति का अधिक समान वितरण होगा, बल्कि बुनियादी ढांचे का विकास भी होगा, कल्याणकारी सुविधाओं तक पहुंच बढ़ेगी और पहाड़ी क्षेत्रों में सरकारी पहुंच में सुधार होगा। अंततः, इससे मजबूत सामाजिक और आर्थिक संकेतक, बेहतर सेवा वितरण और विकास प्रयासों में समुदाय की अधिक भागीदारी देखने को मिलेगी। उत्तर प्रदेश से अलग राज्य की मांग को लेकर 1994 में जनसैलाब सड़कों पर उतरा। पुलिस ने खटीमा, मसूरी, आश्रम और आतंकियों पर गोलियां चलाईं और कई जगहों पर लाठीचार्ज किया। उस दौरान गांधी जयंती पर दिल्ली की राजधानी पुलिस हैवानियत की नई इबारत लिखी गई। तब न सिर्फ गोली चलाईं बल्कि औरों ने रेप तक झेला।42 मृत्‍यु मृत्‍यु राज्य आंदोलन में। जिसके बाद 9 मार्च 2000 को हिंदुस्थान के तटबंध पर एक नए राज्य के बारे में शोक व्यक्त किया गया। इस दौरान बीजेपी और कांग्रेस के 10 लोग मुख्यमंत्री बने। इस कड़ी में सेंचुरी के बागडोर संभाले हुए हैं। जहां नेतृत्व में राज्य में पहली बार सरकार रिपीटहुई। बाकी चुनाव दर चुनाव में सरकार का रुख जारी है।कांग्रेस के दिवंगत मुख्यमंत्री का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने में सफलता मिली। मित्र है कि राज्य गठन के समय देर से की अंतरिम सरकार की बागडोर वाले इतिहास पुरुष बने। उन्हें 4 महीने बाद सत्या पराजय वाले को जनता ने पहले आम चुनाव में मंजूरी दे दी और कांग्रेस को बहुमत मिला। पहली सरकार के मुखिया बने ने उत्तराखंड में स्मारक और औद्योगिक विकास की बुनियाद राखे।दूसरी विधानसभा में भाजपा के ने उस मठ को आगे बढ़ाया। लेकिन उन्हें कड़क मिज़ाकी से उभरे बेंचमार्क के असंतोष और 2009 के इंजेक्शन में हार का बड़ा स्मारक बनाया गया। जिसका उत्तर ने दिया। उन्हें सिटर्जिया भूमि पर कब्जा होने और विद्युत परियोजना में शामिल होने का मामला दर्ज किया गया है, आरोप लगाया गया है कि सीएसपीए पर आम चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद की नियुक्ति की गई थी। ‘अन्ना आंदोलन’ की हवा के बीच बीजेपी हिकमान नेदुरी खंड पर वोट डाले।तीसरी विधानसभा में कांग्रेस की गठबंधन सरकार की जीत हुई। फॉथ गैरसैंण में ‘ट्रांजिट एसेंबली’ का समापन करके एक नया इतिहास बनाने की अधूरी कोशिश की। लेकिन ‘केदारनाथ आपदा’ के असफल होने का कारण उनका विनाश है। उनके बाद मुख्यमंत्री बने ने इच्छा शक्ति दिखाते हुए आपदा के संकट से उबारने में बड़ी भूमिका निभाई। मुख्यमंत्री ने गैरसैंण में टेंट तंबूओं में विधानसभा सत्र आयोजित कर उत्तराखंड में एक नई इरात की सूची बनाई। लेकिन कथित ‘एकला चलो’ ने भाजपा की नीति के खिलाफ बहुगुणा खेमे के अपमान में सरकार गिराई और राष्ट्रपति शासन लगाया। रावत सरकार सुप्रीम कोर्ट की पास से तो बहाल हुई लेकिन आम आदमी पार्टी में बेदख़ल हो गया।बीजेपी को चौथी विधानसभा के चुनाव में प्रचंडम बहुमत मिला। बैजनाथं रावत को सेंचुरी के बागडोर में चिह्नित किया गया था। उनके अधिदेश में गैरसैंण को ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ का दर्जा दिया गया। निःसंदेह अधिनिर्णय में अलॉटमेंट और अस्वीकृत के विरुद्ध अपॉइंटमेंट। लेकिन भाजपा हाईकमैन ने कथित संवाद की निरंतरता के साथ जुड़े असंतोष और कटिपय के असंतुष्टों की छाया की वजह से उन्हें अलग से हटा दिया।इस कड़ी में अणुपाल को मुख्यमंत्री बनाया गया और 4 महीने बाद कर दिया गया। उन्होंने शायद इस पहेली का उत्तर ढूंढते हुए कहा होगा कि अलाकमान ने उनके साथ मजाक या उपकार किया था। उनके बाद सॉसेज़ राज्य में पांचवे आम चुनाव से ठीक पहले युवा नेता पुष्कर सिंह धामी के सिर पर ताज डाला गया। भाजपा को लगातार दूसरी बार बहुमत मिला। उत्तराखंड के अंतिम विधानसभा चुनाव में पुकर खुद चुनाव हार गए, लेकिन मोदी के सबसे भरोसेमंद समर्थक बने हुए हैं।धामी सरकार ने समान आचार संहिता कानून (यूसीसी), कथित आरोपित धर्म परिवर्तन और लव जेहाद के खिलाफ कानून बनाए हैं। कथित अवैध मजारों के विध्वंसवाद से साफा एक धार्मिक या फिर कहावत है ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ धामी सरकार की परंपरा में है। हालाँकि, उनके पद में सरकारी शेयरिंग के खिलाफ महिलाओं के लिए 30 फीसदी के आंकड़े और राज्य आंदोलन के आतंकवादियों के लिए 10 फीसदी के आंकड़े, पेपर लाइक और नकल के कानून भी बने हैं। हालाँकि इसके बावजूद पिछले दिनों एक राज्य वैज्ञानिक परीक्षा पेपर में लाइक हुआ। छात्र आंदोलन के दबाव में उसे कैंसिल स्कोर पूछताछ की संस्तुति की गई।उत्तराखंड के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 378 हजार करोड़ रुपये होने का अनुमान है। राज्य का आर्थिक विकास दर करीब 7.83 फीसदी है। उत्तर प्रदेश से अलग पर सेंचुरी की प्रति व्यक्ति आय होने के करीब 15,285 रु. था। जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में 2 लाख 74 हजार रु. तक शुरू है। जोक का राष्ट्रीय औसत दो लाख रुपये से अधिक है। इस कड़ी में राज्य गठन के वक्त रहते हुए सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4505.75 करोड़ से बढ़ते हुए स्थिर वित्तीय वर्ष में 101,17533 करोड़ तक पहुंच गया।कोई दो राय नहीं कि यूनिवर्सल इंफ्रास्ट्रक्चर में भी दरार आ गई। स्कूल-विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालयों की संख्या में वृद्धि हुई और एम्स और आईआईएम सहित अन्य संस्थान स्थापित हुए। बेशक चारधाम ऑल वेदर रोड और ऋषिकेष-कर्नाटक रेल परियोजना से जुड़ी नई उम्मीदें हैं। लेकिन बेरोजगारी की समस्या का समाधान नजर नहीं आ रहा है। ऐसी कोई भी सरकार नहीं जिस पर कंबल का ग्रहण न लगाया हो।राज्य गठन के 25 साल बाद भी प्राकृतिक संसाधनों की कमी के कारण पहाड़ से पलायन का रास्ता नहीं खुला। आकर्षण और पौडी के आभूषण तो डरने वाले हैं। जहां, उत्तर प्रदेश के दौर में पहाड़ से लोग महानगरों को रुख करते थे। वहीं, उत्तराखंड में भीम, हरिद्वार, उधमसिंहनगर और आश्रम के मैदानी इलाकों में बसने को तरजीह दे रहे हैं। जिससे पहाड़ वीरान हो रहे हैं और तराई-मैदान के भाग पर बेताशा दबाव बढ़ रहा है। साल दर साल कृषि भूमि का फिल्मांकन घटता जा रहा है।यूपी के पर्वतीय क्षेत्र में जियोग्राफिकल रिज्यूमे, विकास और अन्वेषकों से प्राप्त जानकारी को ही एक अलग पर्वतीय राज्य की मांग के रूप में देखा गया। लेकिन पहाड़ी नेता चुनावी मैदान में उतरने के लिए संभावनाओं की तलाश में हैं। अगर अपवाद छोड़ दें तो कमोबेश हर सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड में मठ शाही नज़र आई।असली, पर्वतीय राज्य की मांग थी लेकिन इसमें भविष्य के व्यवहारिक विलासी के मैदानी भू-भाग को भी शामिल किया गया था। पहाड़ बनाम मैदान के वोट गणित में ‘स्थानीय राजधानी’ का मुद्दा उठाया गया। विधानसभा के दौरान ‘विशेष सत्र’ के लिए क्षेत्रीय हितों के लिए मैसाचुसेट्स ने अपनी फिर से पुष्टि कर दी। बेशक, उत्तराखंड को एक नए राज्य के अनोखे फायदे मिले हैं। लेकिन समग्र और दीर्घकालिक विकास का ऐसा मॉडल विकसित नहीं हो पाया,। अलबत्ता सिद्धांत में आम जनमानस की उम्मीदें भारी पड़ी हैं।  एफिशिएंसी 2020 को अटल समग्र सिंह रावत सरकार ने गैरसैंण भाषा संस्थान का मुख्यालय स्थापित करने की भी घोषणा की थी। उस समय कहा गया था कि ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने के बाद गैरसैंण में अन्य ईसाइयों की स्थापना की प्रक्रिया भी शुरू होगी। लेकिन कई साल बीत जाने के बाद भी संस्थान के मुख्यालय गैरसैंण में भाषा नहीं बन पाई और अब इसके भवन में जमीन तलाशने की बात भी सामने आ रही है।सोशल एक्टिविस्ट का कहना है कि प्रदेश के लगभग सभी यूनिटों के मुख्यालयों में ही स्थापना हो चुकी है और नए मुख्यालयों पर भी काम चल रहा है। उनका कहना है कि मुख्यालयों के बेहतर संतुलन के लिए मुख्यालयों का विकेंद्रीकरण भी अधिक से अधिक किया जाना चाहिए और अधिक से अधिक मुख्यालयों को पर्वतीय क्षेत्रों में स्थापित किया जाना चाहिए। साथ ही ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में भी कुछ इकाइयों के मुख्यालय बनने चाहिए थे, जो अब तक नहीं मिल पाए हैं। इसके साथ ही, अब तक गैरसैंण विधानसभा के मुख्य भवन के साथ मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के आवास भी तैयार कर लिए गए हैं. हेलीपैड निर्माण के साथ ही डबल लेन सड़क निर्माण, पेयजल, विद्युत और पार्किंग की बेहतर व्यवस्थाएं भी कर ली गई हैं. वर्तमान में महिला कर्मचारी हॉस्टल और मीडिया आवास का कार्य प्रगति पर है. इन ढांचागत निर्माणों के बीच भी ‘गैरसैंण गैर किल्लै’ के तंज का जबाब देते हुए भाजपा के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने 2020 में विपक्षियों समेत अपनी ही पार्टी को चौंकाते हुए गैरसैंण भराड़ीसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया.त्रिवेंद्र रावत की इस घोषणा ने गैरसैंण के लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलने का काम किया. वर्तमान में पुष्कर सिंह धामी सरकार की बात करें तो विधानसभा परिसर के अंतर्गत चल रहे कुछ आवश्यक कार्यों को आगे बढ़ाने के साथ ही नजदीकी गांवों के विकास पर तो काम करते दिखाई दिए, लेकिन बीते 5 सालों में उम्मीदों के अनुरूप कोई बड़ा फैसला न लिए जाने से स्थाई राजधानी को लेकर मायूसी ही हाथ लगी है.नगर पंचायत अध्यक्ष का कहना है कि अब तक भराड़ीसैंण में सचिवालय निर्माण की स्वीकृति न मिलने से भी आमजन इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी की उपेक्षा के रूप में देखता आया है. राज्य आंदोलनकारी का कहना है कि कुल 13 में से 10 पहाड़ी जिलों वाले राज्यवासी पिछले 5 साल से सरकार में गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित किए जाने का इंतजार कर रहे हैं. जिसको लेकर अब चुनावी वर्ष में 9 मार्च से 13 मार्च तक भराडीसैंण में आयोजित होने जा रहे बजट सत्र में एक बार फिर आमजन को सत्र के मंथन से कोई निर्णायक फैसला आने की उम्मीद है. उन्होंने सभी से आह्वान किया कि जिस प्रकार राज्य आंदोलन की लड़ाई लड़ी गई थी, उसी प्रकार आज एक लड़ाई अपने हक के लिए लड़ने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि ये नेता बजट सत्र के नाम पर सिर्फ ठंडी हवा और पिकनिक मनाने गैरसैंण आ रहे हैं, कोई विकास करने नहीं आ रहे हैं.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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