डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जगल हमारे मायके जैसे हैं, इन्हें हम कटने नहीं देंगे। चमोली के रैंणी गांव से 52 वर्ष पहले उठी यह आवाज आज भी पहाड़ की वादियों में गूंजती है। 26 मार्च 1974 को जब ठेकेदारों के लोग जंगलों पर कुल्हाड़ी चलाने पहुंचे, तब गांव की एक साधारण महिला गौरा देवी असाधारण साहस की प्रतिमूर्ति बनकर सामने आईं। उन्होंने महिलाओं को साथ लेकर पेड़ों से लिपटकर जंगल बचाने की जो लड़ाई लड़ी, वही आगे चलकर दुनिया भर में ‘चिपको आंदोलन’ के नाम से पहचान बनी।
उस दिन गांव के अधिकांश पुरुष बाहर गए हुए थे। इसी बीच जंगल काटने पहुंचे ठेकेदारों की सूचना जैसे ही गांव पहुंची, गौरा देवी ने बिना देर किए महिलाओं को एकजुट किया और सीधे जंगल की ओर बढ़ गईं। जंगल में पहुंचकर उन्होंने ठेकेदारों का डटकर सामना किया। जब बात नहीं बनी, तो महिलाएं पेड़ों से लिपट गईं और साफ शब्दों में कह दिया – पहले हमें काटो, फिर पेड़ों को हाथ लगाना।
यह सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि पहाड़ की उस जीवनदृष्टि का प्रतिरोध था, जिसमें जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं, बल्कि पानी, मिट्टी, चारा, ईंधन और पूरे जीवन का आधार होते हैं। गौरा देवी और उनके साथ खड़ी महिलाओं ने यह समझ लिया था कि यदि जंगल कटे, तो पहाड़ का भविष्य भी उजड़ जाएगा।
रैंणी की महिलाओं ने बदल दी पर्यावरण आंदोलन की दिशा
गौरा देवी का जन्म 25 अक्टूबर 1925 को लाता गांव में हुआ था। सीमित संसाधनों और कठिन पहाड़ी जीवन के बीच पली-बढ़ीं गौरा देवी ने समाज को यह सिखाया कि बड़े बदलाव के लिए बड़े पद नहीं, बल्कि बड़ा साहस चाहिए। महिला मंगल दल के माध्यम से उन्होंने स्थानीय महिलाओं को संगठित किया और जंगल बचाने की लड़ाई को जनांदोलन का रूप दिया।
रैंणी गांव की इस घटना ने केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया। चिपको आंदोलन ने पहली बार विकास के नाम पर हो रही अंधाधुंध जंगल कटाई पर बड़ा सवाल खड़ा किया। इस आंदोलन ने दुनिया को यह सोचने पर मजबूर किया कि प्रकृति के बिना विकास संभव नहीं, बल्कि विनाश निश्चित है।
आज जब उत्तराखंड के पहाड़ भूस्खलन, बादल फटने, जंगलों में आग, जलस्रोतों के सूखने और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब गौरा देवी का संदेश पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उनका संघर्ष हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझा चेतना है।
गौरा देवी के इस ऐतिहासिक योगदान को देश ने भी सम्मान दिया। उन्हें 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा ‘वृक्ष मित्र पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। लेकिन उनका सबसे बड़ा सम्मान आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित वह तस्वीर है, जिसमें एक पहाड़ी महिला पेड़ों से लिपटकर पूरी प्रकृति की ढाल बन जाती है।
आज 26 मार्च सिर्फ इतिहास को याद करने का दिन नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का अवसर भी है कि जंगल बचेंगे, तभी पहाड़ बचेंगे और पहाड़ बचेंगे, तभी जीवन सुरक्षित रहेगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












