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बच्चों के खिलाफ अपराध सबसे ज्यादा?

08/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

हिमालयी राज्य उत्तराखंड में लापता बच्चों की एक बेहद चिंताजनक प्रवृत्ति जारी है, जो एक शांतिपूर्ण राज्य के रूप में इसकी छवि पर काला साया डाल रही है।पुलिस की कड़ी निगरानी, ​​जागरूकता अभियानों और लगातार चौकियों के बावजूद, आधिकारिक आंकड़ों से लापता होने की चौंकाने वाली और बेहद चिंताजनक दर का पता चलता है।उत्तराखंड में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के मामलों में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में राज्य में बच्चों के खिलाफ 1706 मामले दर्ज हुए थे। वर्ष 2023 में यह संख्या मामूली बढ़कर 1710 पहुंची, लेकिन 2024 में अचानक बढ़कर 2068 हो गई। अपराधों में आई इस तेज बढ़ोतरी ने कानून व्यवस्था और बाल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।पुलिस अधिकारियों का मानना है कि मामलों में वृद्धि के पीछे दो बड़े कारण हो सकते हैं। पहला, बच्चों के खिलाफ अपराधों में वास्तविक बढ़ोतरी और दूसरा, लोगों में बढ़ती जागरूकता जिसके कारण अब अधिक मामले दर्ज हो रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ जागरूकता ही नहीं, बल्कि अपराधों की गंभीरता भी लगातार बढ़ रही है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।राज्य में बच्चों के खिलाफ दर्ज मामलों में यौन शोषण, अपहरण, बाल श्रम और मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न प्रमुख हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में बच्चों के खिलाफ अपराध दर 54.4 दर्ज की गई, जो प्रति एक लाख बच्चों की आबादी पर आधारित है।रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के अपहरण के मामलों में भी चिंताजनक वृद्धि हुई है। वर्ष 2024 में भारतीय दंड संहिता के तहत 217 और भारतीय न्याय संहिता के तहत 270 मुकदमे दर्ज किए गए।इनमें बड़ी संख्या उन मामलों की है, जहां गुमशुदा बच्चों को अपहरण मानते हुए केस दर्ज किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार मानव तस्करी, बाल श्रम, बाल विवाह और किशोरों के घर छोड़कर भागने जैसी घटनाएं इन आंकड़ों को बढ़ा रही हैं।राज्य में चार्जशीट दाखिल करने की दर 56.1 प्रतिशत दर्ज की गई है। हालांकि पुलिस कार्रवाई कर रही है, लेकिन केवल चार्जशीट दाखिल करना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। मामलों में त्वरित सुनवाई और पीड़ित बच्चों को न्याय दिलाना भी उतना ही जरूरी है।उत्तराखंड में बच्चों के खिलाफ अपराधों में बढ़ोतरी समाज और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त कानून लागू करने के साथ-साथ जागरूकता और निगरानी तंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है। देहरादून में हाल ही में बच्चों के गुम होने की घटनाओं ने शहर की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सिर्फ पिछले 45 दिनों में 61 बच्चे लापता हो चुके हैं. लापता होने की घटनाएं पुलिस और परिजनों दोनों के लिए लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं. इन मामलों में सोशल मीडिया सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरा है. कई नाबालिग गलत तरीके से गुमराह हो रहे हैं और अपरिचित लोगों के प्रभाव में आ रहे हैं. कुछ बच्चों को पुलिस ने सुरक्षित ढूंढ निकाला, लेकिन घटनाओं की बढ़ती श्रृंखला सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है.जनपद के अलग-अलग थानों में दर्ज गुमशुदगी रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चे 10 से 17 साल की उम्र के बीच हैं. खास बात यह है कि इनमें अधिकतर लड़कियां शामिल हैं. घर से नाराज़गी, घूमने-फिरने की इच्छा और सोशल मीडिया के जरिये बहलावे में आना, इनके गुमशुदा होने के प्रमुख कारणपाएगएहैं. पुलिस का मानना है कि सोशल साइट्स ने बच्चों पर गहरा असर डाला है. फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म पर अजनबियों से कॉन्टैक्ट बनाकर बच्चे उनके जाल में फंस जाते हैं. दूसरी ओर, स्कूल घंटी बजते ही बाहर सड़कों पर मनचलों का जमावड़ा लग जाता है. कई बार बाइक पर सवार युवक स्कूल की सीमा से ठीक बाहर घूमते रहते हैं, जिससे छात्राओं में डर और असुरक्षा की भावना बढ़ती है. पुलिस गश्त की कमी का फायदा उठाकर यह तत्व खुलेआम कानून की अनदेखी करते हैं. लगातार दर्ज हो रहे मामलों से साफ है कि यह सिर्फ सामान्य गुमशुदगी का मामला नहीं, बल्कि गहरी सामाजिक और संरचनात्मक समस्या है. स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है, गश्त की कमी साफ झलकती है और सोशल मीडिया पर बच्चों की संलिप्तता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है. इन मामलों से सीख लेते हुए पुलिस, स्कूल प्रशासन और अभिभावकों को साझा ज़िम्मेदारी उठानी होगी. बच्चों के भावनात्मक बदलावों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. अभिभावकों को संवाद की डोर मज़बूत करनी होगी जबकि पुलिस को सख्त गश्त और साइबर मॉनिटरिंग बढ़ानी होगी. तभी बच्चों को इस अदृश्य खतरे से सुरक्षित रखा जा सकेगा. जहां बच्चों की गोपनीयता और सुरक्षा का सम्मान करने के बीच संतुलन जरूरी है, वहीं आखिरकार ज्यादातर बच्चे यह नहीं समझते हैं कि जो भी इंटरनेट इस्तेमाल के समय डिजिटल फुटप्रिंट ऑनलाइन बचा रह गया है, वह हमेशा ऑनलाइन रह सकता है। ऑनलाइन पोस्ट, फोटोग्राफ और चैट में फिर से दिखने की आशंका रहती है इससे बाद में बच्चों को समस्या का सामना करना पड़ सकता है। बच्चों को यह समझना कठिन है कि किशोर के तौर पर किस तरह से कोई फन या मजेदार कार्य उन्हें उस वक्त चुनौतियां खड़ी कर सकता है जब वे नौकरियों के लिए इंटरव्यू आदि के लिए पेश होंगे।विडम्बना यह है कि तकनीक में अपने स्वयं के द्वारा उत्पन्न चुनौतियों के लिए कई समाधान मौजूद हैं। दिन के आखिर में, चाहे फिजीकल हो या डिजिटल वर्ल्ड, माता-पिता के लिए अपने बच्चों को सुरक्षित बनाए रखने का अच्छा तरीका अपने बच्चों के साथ भरोसा और पारदर्शिता के मजबूत संबंधों की तकनीक को परखने पर समय बिताना है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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