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कागजों पर रह गया अर्ली वॉर्निंग

31/08/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड मौजूदा समय एक गंभीर पारिस्थितिक संकट से जूझ रहा है. बीते दो दशकों में यहां विकास परियोजनाओं की अंधाधुंध दौड़ और अनियंत्रित पर्यटन वृद्धि ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की जड़ों को हिला दिया है.जहां कभी घने जंगल वर्षा जल को संजोकर पहाड़ों को जीवन देते थे, आज वहां 1.85 लाख हेक्टेयर (यानी 1,850 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्रफल में फैले वनों की कटाई ने जलधारण क्षमता और जैव विविधता को गहराई से प्रभावित किया है. नदियां सिकुड़ने लगी हैं, झरने सूख रहे हैं, और मिट्टी का कटाव दिनों दिन बढ़ता जा रहा है. इसी दौरान, पर्यटन में भी जबरदस्त उछाल आया है. जहां दो दशक पहले पर्यटकों की संख्या सीमित थी, वहीं अब यह आंकड़ा तीन गुना बढ़कर 5 करोड़ से भी अधिक हो गया है. दुनिया के कई देशों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम बहुत ही अच्छे तरीके से काम कर रहा है वहीं अगर हम भारत की बात करें तो भारत में भी कई तरह के अर्ली वॉर्निंग सिस्टम काम कर रहे हैं. इसमें से IMD – जो हमें चक्रवात और हीटवेव और मौसम संबंधी जानकारियों को लेकर अलर्ट जारी करते हैं. INCOIS – ये वॉर्निंग सिस्टम हमें सुनामी आने से पहले अलर्ट करता है. इसके अलावा NDMA – जो समन्वय संस्था का अलर्ट जारी करती हैं और SAFAR- जो हमें वायु गुणवत्ता को लेकर अलर्ट जारी करता है. उत्तराखंड के चमोली जिले में ज्योतिर्मठ-मलारी राजमार्ग पर शनिवार देर रात भारी बारिश के कारण तमक बरसाती नाले में आयी बाढ़ से वहां बना एक पुल बह गया जिससे नीति घाटी के सीमांत क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक गांवों तथा सीमा पर तैनात सैनिक एवं अर्धसैनिक बलों का मोटर संपर्क टूट गया ।चमोली जिला प्रशासन ने बताया कि सुराहीथोटा और जुम्मा के बीच तमक नाले के ऊपरी क्षेत्र में भारी बारिश के कारण देर रात दो बजे बाढ़ आ गयी जिससे वहां बना सीमेंट और कंक्रीट का पुल बह गया।अलकनंदा नदी की सहायक जलधारा धौलीगंगा के किनारे स्थित इस क्षेत्र में हुई घटना में किसी प्रकार की जनहानि की सूचना नहीं है ।पुल बहने से तमक से आगे नीति घाटी के सीमांत क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक जनजातीय गांवों और सीमा पर तैनात सैनिक एवं अर्धसैनिक बलों का मोटर संपर्क ठप हो गया है। करीब तीन साल पूर्व यहां से लगभग पांच किलोमीटर आगे जुम्मा मोटर पुल भी इसी तरह बह गया था।इस बीच, बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग, चमोली और ज्योतिर्मठ के बीच दो स्थानों-भनीरपानी और पागलनाला पर मलबा आने से बंद है। जिला प्रशासन ने बताया कि मार्ग पर यातायात बहाल करने के लिए मशीनों से मलबा हटाया जा रहा है ।केदारनाथ को चमोली से जोड़ने वाला कुंड-चमोली राष्ट्रीय राजमार्ग भी बैरागना के समीप भूस्खलन से अवरुद्ध है जिसे खोलने के प्रयास जारी हैं । बारिश के कारण ज्योतिर्मठ क्षेत्र में बिजली प्रभावित है। उत्तराखंड में भूस्खलन की बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण जल्द ही चार जिलों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी कर रहा है। वर्तमान में इस सिस्टम का परीक्षण चल रहा है और सफलता मिलने के बाद इसे उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग और टिहरी जिलों में स्थापित किया जाएगा। इससे समय रहते चेतावनी जारी की जा सकेगी और जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा। इस प्रणाली के जरिए जो अनुमान लगाए जाते हैं, उससे आपदा आने से पहले उसके लिए तैयारी का वक्त मिल जाता है। यानी समय रहते लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया जाता है, जिससे जानमाल का नुकसान कम से कम होता है। यह डिजास्टर मैनेजमेंट का एक तरीका है। दुनियाभर में अर्ली वार्निंग सिस्टम का इस्तेमाल होता है। इसकी तैयारी को लेकर अमेरिका में खूब काम हुआ। वहां भूकंप, ज्वालामुखी और अन्य भूवैज्ञानिक खतरों की निगरानी यूएस जियोलॉजिकल सर्वे करता है। रहेगा। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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