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सवाल उठ रहा है कि क्या ये योजनाएं इस अवधि में पूरी हो पाएंगी?

23/10/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के गठन के बाद भी की पांच प्रमुख विकास योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। अबl विधानसभाचुनाव में केवल 16 lमहीने शेष रह गए हैं, ऐसे में उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद यहां विकास योजनाएं जल्द साकार रूप लेंगी। उनका लाभ आम लोगों को मिलेगा लेकिन योजनाओं का हश्र अभी भी अविभाजित उत्तर प्रदेश जैसा ही है। छोटे राज्य में सत्ता और सीएम बदलते रहे। विकास के दावे होते रहे लेकिन कुमाऊं के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी की प्रमुख योजनाएं फाइलों से बाहर नहीं निकली।
अब विधानसभा चुनाव को महज 16 माह शेष हैं। सवाल है कि जो कार्य कई वर्षों में शुरू नहीं हुए वह क्या इस अवधि में पूरे हो पाएंगे या फिर राज्य में नई सरकार इन नए कार्यों की इबारत लिखेगी। यह हैं शहर की प्रमुख वह पांच बड़ी योजनाएं जिन्हें अंजाम तक पहुंचाना है।
अप्रैल 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्ने शहर के बाहर रिंग रोड बनाने की घोषणा की थी। तब इसकी प्रारंभिक लागत 600 करोड़ रुपये थी। रिंग रोड को भाखड़ा से कमलुवागांजा होते हुए बेलबाला मंदिर के पास रामपुर रोड हाईवे से जोड़ना था। इसके लिए लोनिवि ने पांच रूट तय किए जिनकी लंबाई 12 से 18 किलोमीटर तक थी।
प्रस्तावित विकल्पों में से कुछ नेताओं को रास नहीं आए तो कुछ काश्तकारों को। रिंग रोड पर राजनीति होने लगी। अभी तक इसके लिए भूमि का चयन भी नहीं हुआ है और मामला फाइलों में ही उलझा हुआ है। रिंग रोड बनने से शहर को जाम से निजात मिलने की उम्मीद थी।
रानीबाग-नैनीताल रोपवे: नैनीताल में वाहनों के बढ़ते भार कम करने के लिए वर्ष 2018 में पर्यटन विकास परिषद और कुमाऊं मंडल विकास निगम ने संयुक्त सर्वे के बाद रानीबाग से नैनीताल तक रोपवे निर्माण की योजना तैयार की। इसके लिए इस कार्य का अनुभव रखने वाली कंपनियों से आवेदन भी मांगे गए। लगभग 15 किलोमीटर लंबे इस रोपवे की लागत तब लगभग 500 करोड़ रुपये आंकी गई थी।
रोपवे रूट के स्टेशनों में होटल, रिजॉर्ट, बहुमंजिली कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों समेत अन्य आधारभूत सुविधाएं जुटाई जानी थी। रानीबाग, डोलमार, ज्योलीकोट व हनुमानगढ़ी में इसके स्टेशन बनाए जाने थे।
पिछले छह साल में इसके लिए कई बार विशेषज्ञों ने दौरा किया। हाईकोर्ट ने भी इस संबंध में जिला प्रशासन को आवश्यक दिशा निर्देश दिए लेकिन अभी तक यह योजना भी धरातल पर नहीं उतरी है।
चिड़ियाघर: गौलापार में चिड़ियाघर की स्थापना को 2015 के आसपास सैद्धांतिक मंजूरी मिली थी। इसके लिए स्टेडियम के पास वन विभाग को 412 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई। परियोजना को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से सशर्त अनुमति भी मिल गई थी।
यहां वन्यजीव अस्पताल, बाड़े और ब्रीडिंग सेंटर खोलने की योजना थी। वन विभाग को इसके लिए डीपीआर बनानी थी लेकिन अभी तक डीपीआर ही नहीं बनाई गई है। इसके चलते मामला अटका हुआ है।
आईएसबीटी: वर्ष 2014 में गौलापार में अंतरराज्यीय बस टर्मिनल (आईएसबीटी) को स्वीकृति मिली थी। 2016 में इसकी आधारशिला रखी गई लेकिन अगले ही साल वर्ष 2017 में निर्माण स्थल पर मानव कंकाल मिलने के बाद इस पर रोक लगा दी गई। बाद में भाजपा के सत्ता में आने पर सरकार ने आईएसबीटी को गौलापार से शिफ्ट कर ओपन यूनिवर्सिटी के समीप बनाने की योजना बनाई।
इसके लिए भूमि भी देखी गई लेकिन आज तक आईएसबीटी का निर्माण नहीं हुआ है। इसके चलते आज भी बस अड्डा शहर के बीचों बीच है और यहां अलग अलग राज्यों की बसों के आवागमन के चलते जाम की स्थिति पैदा होते रहती है।
नमो भवन: तहसील के पुराने भवन के अलावा उसके आसपास के सरकारी भवनों को ध्वस्त कर वहां नमो भवन का निर्माण होना है। इसके लिए 350 करोड़ से अधिक की धनराशि स्वीकृत है। नमो भवन में मल्टी स्टोरी पार्किंग के अलावा सिटी मजिस्ट्रेट, एसडीएम, तहसीलदार, कोषागार, जिला विकास प्राधिकरण समेत कई दफ्तर स्थापित होने हैं।
पिछले कई साल से नमो भवन का निर्माण प्रस्तावित है। कार्यदायी संस्था ने इसके लिए टेंडर तो करा दिए लेकिन धरातल पर नमो भवन के निर्माण को लेकर कहीं कोई कवायद नजर नहीं आ रही है।
जनहित से जुड़ी जो भी विकास योजनाएं शासन से स्वीकृत हैं, उन्हें लेकर संबंधित विभागों और कार्यदायी संस्थाओं के साथ जल्द ही एक बैठक प्रस्तावित की गई है। बैठक में रिंग रोड, रोपवे, चिड़ियाघर,
आईएसबीटी और नमो भवन के निर्माण को लेकर भी अधिकारियों से अपटेड लिया जाएगा।जिला आदिकारी के अनुसार योजनाओं को धरातल पर उतारने में कहीं कोई दिक्कत आ रही होगी तो उसे दूर कराया जाएगा। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*
डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के गठन के बाद भी कुमाऊं के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी की पांच प्रमुख विकास योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। अबl विधानसभाचुनाव में केवल 16 lमहीने शेष रह गए हैं, ऐसे में
उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद यहां विकास योजनाएं जल्द साकार रूप लेंगी। उनका लाभ आम लोगों को मिलेगा लेकिन योजनाओं का हश्र अभी भी अविभाजित उत्तर प्रदेश जैसा ही है। छोटे राज्य में सत्ता और सीएम बदलते रहे। विकास के दावे होते रहे लेकिन कुमाऊं के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी की प्रमुख योजनाएं फाइलों से बाहर नहीं निकली।
अब विधानसभा चुनाव को महज 16 माह शेष हैं। सवाल है कि जो कार्य कई वर्षों में शुरू नहीं हुए वह क्या इस अवधि में पूरे हो पाएंगे या फिर राज्य में नई सरकार इन नए कार्यों की इबारत लिखेगी। यह हैं शहर की प्रमुख वह पांच बड़ी योजनाएं जिन्हें अंजाम तक पहुंचाना है।
अप्रैल 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्ने शहर के बाहर रिंग रोड बनाने की घोषणा की थी। तब इसकी प्रारंभिक लागत 600 करोड़ रुपये थी। रिंग रोड को भाखड़ा से कमलुवागांजा होते हुए बेलबाला मंदिर के पास रामपुर रोड हाईवे से जोड़ना था। इसके लिए लोनिवि ने पांच रूट तय किए जिनकी लंबाई 12 से 18 किलोमीटर तक थी।
प्रस्तावित विकल्पों में से कुछ नेताओं को रास नहीं आए तो कुछ काश्तकारों को। रिंग रोड पर राजनीति होने लगी। अभी तक इसके लिए भूमि का चयन भी नहीं हुआ है और मामला फाइलों में ही उलझा हुआ है। रिंग रोड बनने से शहर को जाम से निजात मिलने की उम्मीद थी।
रानीबाग-नैनीताल रोपवे: नैनीताल में वाहनों के बढ़ते भार कम करने के लिए वर्ष 2018 में पर्यटन विकास परिषद और कुमाऊं मंडल विकास निगम ने संयुक्त सर्वे के बाद रानीबाग से नैनीताल तक रोपवे निर्माण की योजना तैयार की। इसके लिए इस कार्य का अनुभव रखने वाली कंपनियों से आवेदन भी मांगे गए। लगभग 15 किलोमीटर लंबे इस रोपवे की लागत तब लगभग 500 करोड़ रुपये आंकी गई थी।
रोपवे रूट के स्टेशनों में होटल, रिजॉर्ट, बहुमंजिली कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों समेत अन्य आधारभूत सुविधाएं जुटाई जानी थी। रानीबाग, डोलमार, ज्योलीकोट व हनुमानगढ़ी में इसके स्टेशन बनाए जाने थे।
पिछले छह साल में इसके लिए कई बार विशेषज्ञों ने दौरा किया। हाईकोर्ट ने भी इस संबंध में जिला प्रशासन को आवश्यक दिशा निर्देश दिए लेकिन अभी तक यह योजना भी धरातल पर नहीं उतरी है।
चिड़ियाघर: गौलापार में चिड़ियाघर की स्थापना को 2015 के आसपास सैद्धांतिक मंजूरी मिली थी। इसके लिए स्टेडियम के पास वन विभाग को 412 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई। परियोजना को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण से सशर्त अनुमति भी मिल गई थी।
यहां वन्यजीव अस्पताल, बाड़े और ब्रीडिंग सेंटर खोलने की योजना थी। वन विभाग को इसके लिए डीपीआर बनानी थी लेकिन अभी तक डीपीआर ही नहीं बनाई गई है। इसके चलते मामला अटका हुआ है।
आईएसबीटी: वर्ष 2014 में गौलापार में अंतरराज्यीय बस टर्मिनल (आईएसबीटी) को स्वीकृति मिली थी। 2016 में इसकी आधारशिला रखी गई लेकिन अगले ही साल वर्ष 2017 में निर्माण स्थल पर मानव कंकाल मिलने के बाद इस पर रोक लगा दी गई। बाद में भाजपा के सत्ता में आने पर सरकार ने आईएसबीटी को गौलापार से शिफ्ट कर ओपन यूनिवर्सिटी के समीप बनाने की योजना बनाई।
इसके लिए भूमि भी देखी गई लेकिन आज तक आईएसबीटी का निर्माण नहीं हुआ है। इसके चलते आज भी बस अड्डा शहर के बीचों बीच है और यहां अलग अलग राज्यों की बसों के आवागमन के चलते जाम की स्थिति पैदा होते रहती है।
नमो भवन: तहसील के पुराने भवन के अलावा उसके आसपास के सरकारी भवनों को ध्वस्त कर वहां नमो भवन का निर्माण होना है। इसके लिए 350 करोड़ से अधिक की धनराशि स्वीकृत है। नमो भवन में मल्टी स्टोरी पार्किंग के अलावा सिटी मजिस्ट्रेट, एसडीएम, तहसीलदार, कोषागार, जिला विकास प्राधिकरण समेत कई दफ्तर स्थापित होने हैं।
पिछले कई साल से नमो भवन का निर्माण प्रस्तावित है। कार्यदायी संस्था ने इसके लिए टेंडर तो करा दिए लेकिन धरातल पर नमो भवन के निर्माण को लेकर कहीं कोई कवायद नजर नहीं आ रही है।
जनहित से जुड़ी जो भी विकास योजनाएं शासन से स्वीकृत हैं, उन्हें लेकर संबंधित विभागों और कार्यदायी संस्थाओं के साथ जल्द ही एक बैठक प्रस्तावित की गई है। बैठक में रिंग रोड, रोपवे, चिड़ियाघर,
आईएसबीटी और नमो भवन के निर्माण को लेकर भी अधिकारियों से अपटेड लिया जाएगा।जिला आदिकारी के अनुसार योजनाओं को धरातल पर उतारने में कहीं कोई दिक्कत आ रही होगी तो उसे दूर कराया जाएगा। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं*

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