• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

ग्रीष्मकालीन राजधानी में विधायकों ठंड भी लगती है!

20/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
14
SHARES
18
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में गैरसैंण (चमोली) स्थित भराड़ीसैंण में आगामी 9 मार्च से 13 मार्च तक बजट सत्र आहूत किया गया है. 11 मार्च को बजट पेश किया जाएगा. वहीं, बजट सत्र से पहले विधानसभा भवन के चयन को लेकर विवाद गहरा गया है. दरअसल, बीजेपी विधायक ने भवन को गलत स्थान पर बनाने से ऑक्सीजन की कमी, अत्यधिक ठंड और व्यवस्थाओं की दिक्कतों का मुद्दा उठाया है. उधर, सचिवालय संघ से लेकर कांग्रेस भी सत्र को लेकर बहस में जुड़ गई है. उत्तराखंड में बजट सत्र से पहले गैरसैंण स्थित विधानसभा के अस्तित्व पर सवाल उठने लगे हैं. हालात ये है कि गैरसैंण विधानसभा स्थल के चयन पर बहस शुरू हो गई है. इसकी शुरुआत बीजेपी विधायक ने की है. उनका कहना है कि गैरसैंण में बनाया गया विधानसभा भवन सही जगह पर नहीं बनाया गया है और यहां सत्र के दौरान रहना बेहद मुश्किल है. बता दें कि, उत्तराखंड में गैरसैंण विधानसभा सत्र के दौरान सरकारों पर सत्र को छोटा रखने के आरोप लगते रहे हैं. माना जाता है कि न तो सरकार और न ही विपक्षी दल के नेता गैरसैंण में ज्यादा दिन रुकने की इच्छा रखते हैं. इसलिए सभी को सत्र के जल्द से जल्द खत्म होने का इंतजार रहता है.इस बार गैरसैंण में बजट सत्र से पहले कुछ इसी तरह की बहस शुरू हो गई है, जिसने गैरसैंण के भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन निर्माण को लेकर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. गैरसैंण स्थित भराड़ीसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान व्यवस्थाओं पर हमेशा सवाल खड़े होते हैं और विपक्ष के साथ ही सत्ता पक्ष के भी विधायक कई बार इस बात को कहते हुए नजर आए हैं, लेकिन इस बार बीजेपी विधायक ने तो विधानसभा के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं. बात केवल विधायकों की ही नहीं है, इस मामले में उत्तराखंडसचिवालय संघ ने भी सत्र से पहले एक ज्ञापन मुख्य सचिव को सौंपा है, जिसमें स्पष्ट तौर पर गैरसैंण में सत्र के लिए नोडल अधिकारियों की संख्या कम करने की गुजारिश की गई है. इस दौरान ये स्पष्ट किया गया है कि क्योंकि विधानसभा में व्यवस्थाएं कम होती हैं, ऐसे में जरूरी लोगों को ही गैरसैंण बुलाया जाए. ताकि, कर्मचारियों को होने वाली विभिन्न दिक्कतें न हो.  इस बार बहस इस बात को लेकर है कि क्या वाकई विधानसभा भवन का निर्माण बिना सही चयन के हुआ है या फिर सत्र में शामिल होने वाले राजनेता और कर्मचारी पहाड़ चढ़ना ही नहीं चाहते? साल 2014 में पहली बार गैरसैंण में टेंट में विधानसभा सत्र चला था और उसके बाद यहां पर विधानसभा भवन का शिलान्यास हुआ. पशुपालन विभाग की लगभग 47 एकड़ भूमि पर विधानसभा को तैयार किया जाना था. लगभग 11 साल पहले जो शुरुआत की गई थी वह धरातल पर अब काम ही नजर आ रही है राजधानी के तौर पर गैरसैंण का नाम सबसे पहले साठ के दशक में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने आगे किया था। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के साथ ही गैरसैण को प्रस्तावित राजधानी माना गया। उत्तराखंड क्रांति दल ने 1992 में गैरसैंण को उत्तराखंड की औपचारिक राजधानी तक घोषित कर दिया था। यही नहीं, यूकेडी ने पेशावर कांड के महानायक वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर गैरसैंण में एक पत्थर रख इसका नाम चंद्रनगर रख दिया था। 1994 में गैरसैंण राजधानी को लेकर लेकर क्रमिक अनशन भी किया गया और फिर इसी साल तत्कालीन सरकार की रमाशंकर कौशिक की अगुआई वाली एक समीति ने उत्तराखंड राज्य के साथ-साथ गैरसैंण राजधानी की भी अनुशंसा की थी। एक ओर कांग्रेस और उत्तराखंड क्रांति दल गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग करते रहे, तो भाजपा इसे ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के पक्ष में रही। वहीं, भाजपा सरकार ने गैरसैंण राजधानी की दिशा में पहल की नरेंद्र सिंह नेगी के इस हालिया चर्चित गीत का मतलब यह है कि उत्तराखंड की राजधानी न गढ़वाल में बनेगी और न कुमायूं में, बल्कि देहरादून में ही रहेगी. नेगी ने यह गीत उत्तराखंड की स्थायी राजधानी के चयन के लिए गठित दीक्षित आयोग की रिपोर्ट आने के बाद लिखा और गाया था.1994 में गठित कौशिक समिति की रिपोर्ट के अनुसार तब 69.21 फीसदी लोग गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्षधर थेसंयोग देखिए कि इस गीत का वीडियो संस्करण पिछले दिनों तभी बाजार में आया है जब उत्तराखंड की राजधानी का मुद्दा एक बार फिर गरमा रहा है. दरअसल, हाल ही में केंद्र सरकार के योजना व संसदीय कार्य राज्य मंत्री वी नारायण सामी ने गढ़वाल के सांसद को उनके द्वारा संसद में पूछे गए प्रश्न के जवाब में बताया कि केंद्र सरकार के 13वें वित्त आयोग ने उत्तराखंड राज्य को विधानसभा के निर्माण के लिए 88 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है.महाराज ने केंद्र से उत्तराखंड में विधानसभा निर्माण के लिए धन की मांग की थी. अभी विधानसभा अस्थायी राजधानी देहरादून में कामचलाऊ भवन पर चलाई जा रही है. केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा था कि स्थायी विधानसभा का निर्माण गैरसैंण में हो या देहरादून में यह राज्य सरकार को तय करना है. 88 करोड़ रुपए स्वीकृत होने और महाराज द्वारा देहरादून के साथ ‘गैरसैंण में भी’ विधानसभा बनाए जाने की मांग ने एक बार फिर से गैरसैंण मुद्दे को हवा दे दी. विडंबना देखिए कि राज्य आंदोलन के दिनों में और उसके बाद के कुछ सालों तक भी हर उत्तराखंडी चमोली जिले के कस्बे गैरसैंण को अपनी राजधानी मान चुका था. लेकिन लंबे समय से इस मुद्दे की अनदेखी के चलते खुद गैरसैंण क्षेत्र के लोगों ने भी इसे राज्य की स्थायी राजधानी के रूप में देखने के सपने पालना छोड़ दिया है.गैरसैंण के सफर में हमें एक बुजुर्ग मिलते हैं जो एक स्थानीय कहावत कहते हुए यहां के लोगों की मनोदशा बताते हैं जिसका अर्थ यह है कि ‘लोग रो-रोकर, थक-हारकर सो गए हैं.’ उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय रहे स्थानीय पत्रकार पुरुषोत्तम असनोड़ा पूछते हैं, ‘वर्ष 1990 से आंदोलनरत गैरसैंणवासियों को राजनीतिक दलों से छल के अलावा और क्या मिला?’ उनका कहना गलत नहीं है. राज्य बनने के बाद भाजपा हो या कांग्रेस या फिर उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद), सभी पार्टियों ने गैरसैंण के मुद्दे पर उदासीनता दिखाई है. इस अनदेखी की एक झलक आदिबदरी से गैरसैंण तक बांज-बुरांस के खूबसूरत जंगलों के बीच से गुजरती हुई सड़क की खस्ता हालत भी देती है.आंदोलनकारियों को राजधानी के रूप में गैरसैंण क्यों पसंद था, पूछने पर असनोड़ा एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं. उनके मुताबिक उक्रांद के जन्म के बाद 1989 में एक बार पूर्व विधायक गैरसैंण से गुजर रहे थे. बातों-बातों में उनके मुंह से निकल गया कि गैरसैंण ही उत्तराखंड की राजधानी होगी. उसी यात्रा में त्रिपाठी के साथी और उक्रांद के संस्थापक अध्यक्ष डीडी पंत ने तत्काल त्रिपाठी की इस अनायास वाणी को समर्थन दे दिया. इसके साथ ही गढ़वाल व कुमायूं की इस हृदयस्थली का नाम प्रस्तावित राज्य उत्तराखंड की राजधानी के लिए चल पड़ा. 1990 से तो गैरसैंण राज्य निर्माण आंदोलन की जनअभिव्यक्तियों का केंद्र ही बन गया. 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उत्तराखंड की 19 में से 17 विधानसभा सीटें जीतने वाली भाजपा को उत्तराखंड में ऐसे किसी स्थायी भावनात्मक मुद्दे की तलाश थी जिसके द्वारा भविष्य के चुनावों में भी इसी तरह की सफलता को दोहराया जा सके. अलग राज्य के लिए प्रबल उत्कंठा और राजधानी के रूप में गैरसैंण से पहाड़वासियों के भावनात्मक लगाव को भांपते हुए भाजपा ने 19 नवंबर 1991 को गैरसैंण में तीन मंत्रियों और कई विधायकों की मौजूदगी में भारी जनसभा की और उसी दिन शिक्षा विभाग के संयुक्त निदेशक (पर्वतीय), डाइट सहित अन्य कार्यालयों का उद्घाटन करके गैरसैंणवासियों के सपनों को पंख लगा दिए. लेकिन सपने सपने ही रहे. क्षेत्र प्रमुख जानकी रावत बताती हैं, ‘उस दिन की गई तीन घोषणाओं में से केवल एक पूरी की गई है. गैरसैंण में कन्या हाईस्कूल खोलने की. यह काम भी घोषणा के दस साल बाद हुआ है.’भाजपा की अप्रत्याशित पहल के बाद अलग राज्य का झंडाबरदार, क्षेत्रीय दल उक्रांद भला कैसे पीछे रहता. उसने भी 25 जुलाई 1992 को गैरसैंण में एक महाअधिवेशन किया. इसमें कस्बे के आसपास के 50 किमी लंबे व 30 किमी चौड़े क्षेत्र का नाम, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के नाम पर ‘चंद्रनगर’ रखकर इसे प्रस्तावित उत्तराखंड की राजधानी घोषित किया गया. 15 मार्च 1994 से गैरसैंण में इस मुद्दे पर 167 दिन लंबा क्रमिक अनशन चला. इसमें हजारों लोगों ने हिस्सा लिया. उत्तराखंड लोक वाहिनी के बताते हैं, ‘संभवतया विश्व में पहली बार हुआ होगा कि राज्य बनने से पहले ही वहां के जनमानस ने किसी स्थान को राजधानी स्वीकार कर लिया हो.’ उसके बाद तो गैरसैंण राज्य निर्माण आंदोलन की धुरी बन गया. मुजफ्फरनगर कांड के बाद 1994 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने राजधानी के चयन के लिए कौशिक समिति बनाई. इसकी रिपोर्ट के अनुसार उस समय 69.21 प्रतिशत लोग गैरसैंण को राजधानी बनाने के पक्षधर थे. 1995 में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल मोती लाल बोरा ने पूर्व में घोषित देहरादून और श्रीनगर में मिनी सचिवालयों की स्थापना का विरोध होने पर गैरसैंण में मिनी सचिवालय के सर्वे के लिए सात लाख रुपए दिए थे. इसके बाद गैरसैंण में 8 फरवरी 1996 से शुरू हुए 45 दिन लंबे आमरण अनशन को पुलिस ने पांच किस्तों में तोड़कर अनशनकारियों को उठाया. राज्य बनने से ठीक पहले 23 सितंबर 2000 को उत्तराखंड महिला मंच ने गैरसैंण में जोरदार रैली की थी जिसमें हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी थी. प्रसिद्ध आंदोलनकारी बाबा मोहन ‘उत्तराखंडी’ ने राज्य निर्माण तथा गैरसैंण को राजधानी बनाने के मुद्दे पर 13 बार अनशन किया. अलग राज्य के बाद गैरसैंण में राजधानी बनाने की मांग के लिए आमरण अनशन करते बाबा को अनशन के 38वें दिन, 8 अगस्त 2004 को गैरसैंण के पास बेनीताल से जबरन उठाया गया. 9 अगस्त 2004 को ‘बाबा उत्तराखंडी’ पुलिस हिरासत में मृत पाए गए. एक बार फिर पहाड़ आंदोलन की आग में जलने लगे. अक्टूबर 2004 से स्थायी राजधानी के निर्माण के लिए ‘उत्तराखंड महिला मंच’ने गैरसैंण में 67 दिन लंबा आमरण अनशन किया. उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. कुछ दिनों पहले बाबा की शहादत के बाद उपजे जनाक्रोश से घबराए प्रशासन ने 8-9 अक्टूबर को अनशनकारियों पर जमकर लाठी चार्ज किया. इस दौरान गिरफ्तार हुई स्थानीय निवासी धूमा देवी बताती हैं, ‘राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण में उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन ने भी इतना अत्याचार नहीं किया था.’ इसके बाद भी विभिन्न संगठनों ने यहां राजधानी बनाने को लेकर 2004 व 2005 में देहरादून से गैरसैंण तथा देहरादून से बागेश्वर तक पदयात्राएं कीं.लेकिन फिर आग ठंडी पड़ने लगी और राजधानी बनाने को लेकर शुरू हुआ यह जनांदोलन छिटपुट प्रदर्शनों तक सीमित रह गया. अब चमोली में हर जिला पंचायत व गैरसैंण में क्षेत्र समिति की बैठकों में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाए जाने का रस्मी प्रस्ताव हर बार पास हो जाता है. उधर, गैरसैंण के आम ग्रामीणों को डर है कि राजधानी बनने के बाद उनकी खेती की जमीनें राजधानी निर्माण के लिए छिन जाएंगी. इस बारे में बात करने पर स्थानीय भाजपा नेता बताते हैं, ‘यह देहरादून में अरबों रुपए लगा चुकी प्रॉपर्टी डीलर लाबी द्वारा फैलाया भ्रम है.’ वैसे भी आंदोलन से लेकर राज्य निर्माण तक राजधानी बनने की आस में गैरसैंण में भी सड़क किनारे की सारी जमीन बिक चुकी थी.विधानसभा बनाने और स्थायी राजधानी जैसे मुद्दों पर भविष्य में जमकर राजनीति होने की संभावना है. नए परिसीमन के बाद मैदानी क्षेत्रों की विधानसभा सीटों की बढ़ी संख्या को देखते हुए इस मुद्दे पर राष्ट्रीय दलों में असमंजस है. पर्वतीय क्षेत्र की वकालत करते हुए वे कहते हैं, ‘गैरसैंण को तो उत्तराखंडवासियों ने पहले ही राजधानी मान लिया था. अब इसे राजधानी स्वीकार करने में देर नहीं की जानी चाहिए.’ टम्टा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं, ‘राज्य औद्योगिक पैकेज तथा अन्य सुविधाएं तो पर्वतीय क्षेत्र के नाम पर लेता है परंतु इस पर्वतीय प्रदेश की राजधानी पर्वतीय कस्बे गैरसैंण में घोषित करने पर हीला-हवाली की जा रही है.’ टम्टा के दावे की पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस साल मुख्यमंत्री ने वार्षिक योजना की बैठक में योजना आयोग के सामने राज्य के 77 प्रतिशत भूभाग को पर्वतीय बताया था और विकास के लिए अतिरिक्त धन की मांग की थी. विधानसभा गैरसैंण में बनाने पर प्रदेश हैं.राज्य के लिए आंदोलनरत रही ताकतों में अब जबर्दस्त वैचारिक बिखराव है. उक्रांद के अलावा अन्य नेता अब खुलकर उन मुद्दों पर खुद बोलते नहीं दिखते जिनपर वे कभी राज्य भर में बवाल करते रहते थे. उक्रांद के बाद अब पीसी तिवारी की अध्यक्षता में वर्ष 2008 में गैरसैंण में ‘उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी’ के प्रथम अधिवेशन के साथ नए क्षेत्रीय दल का जन्म हुआ है. पार्टी के महासचिव बताते कि उनका दल भी गैरसैंण को राजधानी के रूप में मान्यता देता है.राज्य के मुख्यमंत्री कर्णप्रयाग से 3 बार विधायक रहे हैं. गैरसैंण कर्णप्रयाग विधानसभा का ही हिस्सा है. राज्य भर में जमकर दौरे करने वाले ‘निशंक’ मुख्यमंत्री बनने के बाद अभी तक गैरसैंण नहीं पहुंचे हैं. यह भी गौरतलब है कि पिछले 20 सालों से कर्णप्रयाग विधानसभा से लगातार भाजपा के विधायक जीतते आए हैं.जिस गीत का जिक्र शुरु में आया है उसकी निर्णायक पंक्ति में नेगी कहते हैं- ‘या भी लडै़ लगीं राली’, यानी गैरसैंण को राजधानी बनाने की लड़ाई जारी रहेगी. वे सही लगते हैं. पर्वतीय राज्य और राजधानी का सपना देखने वाली जनता के मन में अब सब कुछ उल्टा होते देख असंतोष पनप रहा है. इसे समय रहते न पहचाना गया तो हो सकता है कि उत्तराखंड में एक और जनांदोलन छिड़ जाए. राज्य आंदोलन के दौरान और उसके बाद के कुछ सालों तक भी हर उत्तराखंडी गैरसैंण को अपनी राजधानी मान चुका था. लेकिन राज्य बनने के बाद निहित स्वार्थों के चलते यह एक बार जो उपेक्षित हुआ तो फिर होता ही चला गया. अब एक बार फिर गैरसैंण का मुद्दा सुर्खियों में है.
उत्तराखंडे राजधानी तुम भी सूणा, मिन सूणयाली
गढ़वालै ना कुमौ जाली
उत्तराखंडे राजधानी
बल देरादूणे मा राली

बल देरादूणे मा राली
गैरसैंण के प्रति अनिच्छा का आरोप लगाया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि व्यवस्थाएं जुटाना सरकार की जिम्मेदारी है और यदि इच्छाशक्ति हो तो हर समस्या का समाधान संभव है।इस बार भाजपा विधायक के बयान से एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि क्या भराड़ीसैंण में व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ किया जाए या सत्रों के आयोजन को लेकर नई नीति बनाई जाए। आगामी बजट सत्र में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गरमाने की संभावना है। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन की भावनाओं का केंद्र रहे गैरसैंण को भाजपा ने ही ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया। यद्यपि, यह भी सही है कि गैरसैंण वर्ष में केवल एक सत्र आहूत करने तक ही सीमित होकर रह गया है। उत्तराखंड को बनाने में आमजन की सीधी सहभागिता रही, इसमें हर वर्ग का संघर्ष रहा, लेकिन जब राज्य के बारे में सोचने व सरकारों के कार्यो के आकलन का मौका आया तो सभी सरकार से अपनी-अपनी मांगों को मनवाने में लग गए। ऐसा लग रहा है कि उत्तराखंड राज्य का गठन ही कम काम बेहतर पगार, अधिक पदोन्नति और ज्यादा सरकारी छुट्टियों, भर्तियों में अनियमितता व विभिन्न निर्माण कार्यो की गुणवत्ता में समझौता करने के लिए हुआ है।मानो विकास का मतलब विद्यालय व महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, अस्पतालों व मेडिकल कालेजों के ज्यादा से ज्यादा भवन बनाना भर है, न कि उनके बेहतर संचालन की व्यवस्था करना। हर साल सड़कें बनाना मकसद है, पर हर साल ये क्यों उखड़ रही हैं, इसकी चिंता न तो सरकारें करती हैं और न ही विपक्ष इस पर सवाल उठाता है। जाहिर है कि करोड़ों रुपये के निर्माण में लाभार्थी पक्ष-विपक्ष दोनों के अपने हैं। जब उत्तर प्रदेश का विभाजन हुआ तो यह माना जाता रहा कि अब नवोदित उत्तराखंड राज्य की राजनीतिक संस्कृति भी अलग होगी, लेकिन यह हुआ नहीं। आज भी उत्तराखंड उत्तर प्रदेश की ही राजनीतिक विरासत ढो रहा है। बस बाहुबल की राजनीतिक संस्कृति से काफी हद तक निजात मिली है, बाकी सारी तिकड़म की राजनीति वहां भी है और यहां भी।मतदाताओं के सामने खड़ी समस्याओं के समाधान से अधिक उनकी भावनाओं के दोहन की फिक्र रही है। कर्मचारी-शिक्षक सबसे बड़ा वोट बैंक बन कर उभरा है। स्थिति यह है कि आर्थिक स्थिति कैसी भी हो कर्मचारी-शिक्षक यूनियनों के सामने सरकारें नतमस्तक होती रही हैं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

Share6SendTweet4
Previous Post

देवाल विकास खंड कार्यालय पर कमीशनखोरी का मामला खाशा सुर्खियों में रहा

Next Post

वित्तीय वर्ष की लक्ष्य प्राप्ति हेतु डाक विभाग ने आयोजित किया महा मेला

Related Posts

उत्तराखंड

युवाओं की सक्रिय भागीदारी से संगठन को नई ऊर्जा व दिशा मिलेगी: जिलाध्यक्ष

April 8, 2026
10
उत्तराखंड

डोईवाला: बेमौसम बारिश से गेहूं की फसल पर संकट के आसार

April 8, 2026
12
उत्तराखंड

देहरादून की गंदगी से बढ़ा सुसवा नदी का प्रदूषण

April 8, 2026
12
उत्तराखंड

डोईवाला: फ्लाईओवर के पास जलभराव से वाहनों को परेशानी

April 8, 2026
9
उत्तराखंड

डोईवाला में आईटीआई पुनः संचालन की मांग

April 8, 2026
9
उत्तराखंड

छात्र-छात्राओं को उत्तराखंड पुलिस ऐप व गौरा शक्ति ऐप की विस्तृत जानकारी दी

April 8, 2026
10

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67667 shares
    Share 27067 Tweet 16917
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45774 shares
    Share 18310 Tweet 11444
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38050 shares
    Share 15220 Tweet 9513
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37438 shares
    Share 14975 Tweet 9360
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37326 shares
    Share 14930 Tweet 9332

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

युवाओं की सक्रिय भागीदारी से संगठन को नई ऊर्जा व दिशा मिलेगी: जिलाध्यक्ष

April 8, 2026

डोईवाला: बेमौसम बारिश से गेहूं की फसल पर संकट के आसार

April 8, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.