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क्या इतिहास बन जाएगा पर्वतीय समाज में लोक संस्कृति के साथ ही खानपान की परंपरा

20/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
वक्त के बदलाव ने पहाड़ की संस्कृति के साथ ही यहां के रहन-सहन और खान-पान पर विपरीत असर डाला है। चूल्हे व बड़ी रसोई में भोजन बनाने के लिए प्रयुक्त होने वाले बर्तन तो अब नजर ही नहीं आते। लोहा, तांबा, पीतल और कांसे के बर्तनों की जगह अब स्टील के बर्तनों ने ले ली है। खाद्यान की मात्रा मापने के लिए प्रयुक्त होने वाली नाली और माणे का जमाना अब बीत चुका है।पर्वतीय समाज में लोक संस्कृति के साथ ही खानपान की परंपरा पूरी तरह बदल गई है। कभी भोजन तैयार करने से लेकर परोसने में शुद्धता और साफ सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता था। भोजन में लोहे, तांबे और कांसे का मिश्रण बना रहे इसके लिए संबंधित धातुओं के बने बर्तनों में भोजन बनाया जाता था। अब यह परंपरा स्टील तथा नॉनस्टिक बर्तनों के आने से पूरी तरह हाशिये पर चली गई है।पहले पीतल व कांसे की तौली का इस्तेमाल विशेषकर रोजमर्रा के खानपान में दाल भात बनाने के लिए किया जाता था। दाल तैयार करने के लिए खासकर कांसे से बने भड्डू का इस्तेमाल होता था। लोहे की कढ़ाइयों में सूखी सब्जी बनती थी। पानी हमेशा तांबे से बने घड़े में रखा जाता था ताकि उसकी पौष्टिकता व शुद्धता बनी रही। आटा गूंथने के लिए तांबे व पीतल की परातें इस्तेमाल में आती थीं। लकड़ी से बनीं ठेकी दूध रखने, दही जमाने और मटठा बनाने के काम आती थी। दही को गजेठी से मथकर छांछ तैयार होती थी।वर्तमान में मक्खन और छांछ भी स्टील के पतीले में मोटर के सहारे मथकर तैयार की जा रही है। खाना बनाने से पूर्व खाद्यान्न की माप करने के लिए लकड़ी से बनी नाली और माणे का उपयोग होता था। खाद्यान्न की माप के आधार पर रसोइया खाना तैयार करता था। इन बर्तनों में खाने वाले लोगों की संख्या के आधार पर खाद्यान्न की मात्रा डाली जाती थी जिससे भोजन के बर्बाद होने की संभावना नहीं रहती थी। अब 90 प्रतिशत घरों में इसके लिए स्टील से बने बर्तनों का प्रयोग हो रहा है।अधिकांश घरों से पुराने बर्तन गायब हो गए हैं। नाली, माणा, भड्डू, ठेकी, गजेेठी अब पुरानी यादों को सहजने के लिए ही कुछ घरों में रखे गए हैं। वर्तमान में प्रेशर कुकर, माइक्रोवेव ओवन नॉनस्टिक कढ़ाइयां, फ्राईपान आदि बर्तनों का उपयोग हो रहा है। इस बदलाव से रसोई में चमक भले ही दिखे, लेकिन खानपान का स्वाद व पौष्टिक तत्वों की मात्रा गायब हो गई है।शादी ब्याह, जनेऊ, गृह प्रवेश आदि बड़े कार्यक्रमों में पहले चूल्हे में रसोई तैयार की जाती थी। बुजुर्ग लोग धोती पहनकर भोजन करते थे और उनके भोजन करने के बाद अन्य लोगों को पंक्ति में बैठाकर भोजन परोसा जाता था जिसे लौर कहते थे। लेकिन अब भोजन टैंटों में बनने लगा है। लोग खड़े-खड़े भोजन कर रहे हैं। बड़े कार्यक्रमों में बड़े बुजुर्ग अभी भी धोती पहनकर रसोई का भोजन करते हैं लेकिन इनकी संख्या गिनी चुनी रह गई है। यह बात काफी सुखद है कि अब लोग टैंटों में बने भोजन के बजाए रसोई में बने भोजन को पसंद करने लगे हैं।खान-पान के लिहाज से भारतीय संस्कृति बहुत ही धनवान या यूं कहें कि बहुत ही ‘रिच'(समृद्ध) रही है।जब भी हम खान-पान करते हैं तो किसी न किसी बरतन में करते हैं।लोहे के बर्तनों में खाना पकाने से शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ती है, जैसा कि लोहे के बर्तन में फोलिक एसिड पाया जाता है,जिससे शरीर में आयरन की कमी दूर होती है।लोहे के बर्तन प्राकृतिक रूप से नॉन-स्टिक होते हैं, जिससे खाना चिपकता नहीं है। लोहे के बर्तनों का खाना स्वादिष्ट और स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहतर होता है। दरअसल, बर्तनों और खान-पान के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध पाया जाता है। हम चाहे घर में हों, यात्रा में हों या कहीं भी बाहर, विभिन्न धातुओं और सामग्रियों से बने बर्तनों का प्रयोग खाना खाने-पीने के लिए करते हैं। समय के साथ जैसे जैसे हम विकास की ऊंचाइयों को छूते चले जा रहे हैं, वैसे-वैसे ही हम नये युग में प्रवेश करते हुए अपने खान-पान के बर्तनों को भी बदलते चले जा रहे हैं। प्राचीन काल में मिट्टी, तांबे,कांसे, लोहे, पीतल से बने बर्तनों का प्रयोग किया जाता था, यहां तक जानकारी मिलती है कि प्राचीन काल में लोग लकड़ी तक से बने बर्तनों, जैसे कि कटोरे और प्लेटों का उपयोग भी करते थे,लेकिन आज हम प्लास्टिक, एल्युमिनियम, चीनी मिट्टी (बोन चाइना क्रॉकरी), डिस्पोजेबल आदि का प्रयोग करने लगे हैं। प्राचीन काल में भोजन परोसने और खाने के लिए बड़े पत्तों का प्रयोग किया जाता था। आज भी केले के पत्तों का प्रयोग भोजन परोसने में किया जाता है, लेकिन यह समय के साथ बहुत ही सीमित हो चुका है।सच तो यह है कि जैसे-जैसे सभ्यताएं विकसित हुईं, लोगों ने अनेक प्रकार की धातुओं से बने बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जो भोजन परोसने और खाने के लिए अधिक सुविधाजनक, सुंदर और अच्छे थे। दरअसल, प्राचीन समय में भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तन और तरीकों में बहुत ही विभिन्नता थी, जो उनकी संस्कृति, जलवायु, और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती थी, आज विकास के पथ पर अग्रसर होते हुए आधुनिक जरूर हो गए हैं, लेकिन आज बहुत सी धातुएं ऐसी आ चुकीं हैं जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहीं हैं। मसलन, आज कुकवेयर पर नॉन-स्टिक कोटिंग, एल्युमिनियम के बर्तन, डिस्पोजेबल के बढ़ते उपयोगों से और अन्य रासायनिक उपचारों के स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं और हमें अनेक प्रकार की बीमारियों का शिकार बना रहीं हैं। बढ़ते प्रदूषण, बढ़ती जनसंख्या, औधोगिकीकरण के बीच आज हमारे खान-पान की संस्कृति, हमारे बर्तन बदल चुके हैं, और हम प्रकृति के सानिध्य से दूर केवल अपनी सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इन बर्तनों का प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन हमें इन बर्तनों के प्रयोग,इनके फायदे और नुकसान आदि के बारे में जानकारी होनी चाहिए, ताकि हम एक सुखी, संतुलित और बेहतर जीवन जी सकेंलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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