• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

लगातार सिकुड़ता जा रहा है ऋषि गंगा ग्लेशियर

17/02/21 - Updated on 18/02/21
in उत्तराखंड, चमोली
Reading Time: 1min read
228
SHARES
285
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरा ऋषिगंगा क्षेत्र, नंदादेवी बायोस्फियर रिज़र्व के अंतर्गत आता है। रैणी गाँव और बैराज बफर ज़ोन में आते हैं। इस रिज़र्व का कोर ज़ोन, हिमाच्छादित चोटियों से घिरा ऐसा अद्भुत क्षेत्र है, जिसमें एकमात्र प्रवेश मार्ग ऋषिगंगा घाटी से ही है और जो अत्यंत दुष्कर है। अनोखी भौगोलिक स्थिति की विशिष्ट जैव.विविधता के दृष्टिगत ही इस क्षेत्र को नंदादेवी पार्क और बाद में बायोस्फियर रिज़र्व बनाया गया। लाता, दूनागिरी, चंगबंग, कालंका, ऋषिपहाड़, नंदादेवी पूर्वी, नंदाखाट मृगत्यूड़ी, त्रिशूल और नंदाघुंटी शिखर बेसिननुमा इस कोर ज़ोन की सीमा बनाते हैं। रिजर्व आज से 32 साल पहले अस्तित्व में आया था, यूनेस्को के मैन एण्ड बायोस्फियर प्रोग्राम के तहत। तत्समय ये भारत में दूसरा बायोस्फियर था जो चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ तीन जिलों में स्थित है।

लगभग वृत्ताकार, उच्च हिमालय शिखरों से घिरे इस महत्वपूर्ण कोर ज़ोन से जलप्रवाह का एक ही मार्ग है, और वो है ऋषिगंगा। इसी ऋषिगंगा के अंतिम छोर के वाम पार्श्व में स्थित है, पर्यावरण.ऋषि गौरादेवी की कर्मस्थली, उनका गाँव रैणी। वैश्विक विरासत घोषित ये कोर ज़ोन, उत्तराखण्ड के पास एक महत्वपूर्ण धरोहर है। छिटपुट विरोध के बाद स्थानीय निवासी कोर ज़ोन में, मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध का पूरी तरह पालन करते रहे हैं। हालांकि स्थानीय निवासियों की जीविकोपार्जन गतिविधियाँ कभी भी खतरनाक नहीं होती हैं। कई बार तो इनके जरिए ही वो महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं जो आधुनिक यंत्र.तकनीकी भी नोटिस नहीं कर पाते हैं और न ही वन विभाग के कार्मिक.अधिकारी। इन्हीं लोगों के सहयोग से ब्रिटिश काल में उच्च हिमालयी क्षेत्रों का सफल सर्वेक्षण किया जा सका और इन्हीं से प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से ही कई आपदाओं के प्रभाव को सीमित भी किया जा सका।

गौरा देवी के जग.प्रसिद्ध चिपको आंदोलन, गोविंद सिंह रावत की स्थानीय मुद्दों को लेकर बुलंद आवाज़ और हक़.हक़ूक को लेकर धन सिंह राणा का छीनो.झपटो आंदोलन को भी कैसे विस्मृत किया जा सकता है। इन्हीं का असर था कि जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बाँध की जगह रन आफ द रीवर तकनीकी को अपनाया जाने लगा। नंदादेवी कोर ज़ोन के मुहाने पर ऐसी किसी भी परियोजना को तो बिल्कुल भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि ऐसी परियोजनाओं के डीपीआर में जिन आपात्कालीन सुरक्षा मानकों का उल्लेख होता है, वो आपात्काल में कहीं नज़र ही नहीं आते। ऐसा भी देखा गया है कि इस तरह की कम्पनियों के बीमा.अनुबंध कार्मिक हित की जगह कम्पनी हित को सुनिश्चित करने की ओर अधिक झुके होते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग और संवेदनशील क्षेत्रों में असुरक्षित छेड़छाड़ उच्च हिमालयी क्षेत्रों की आपदाओं का प्रमुख कारण है। ग्लोबल वार्मिंग के संभावित खतरों के प्रति स्थानीय निवासियों की जागरूकता बढ़ायी जानी चाहिए और विकास कार्यों में असुरक्षित छेड़छाड़ को रोका जाना चाहिए। परियोजनारंभ से पहले पर्यावरणीय अनापत्ति की संस्तुतियों को पब्लिक डोमेन में भी रखा जाना चाहिए और उन्हें ईमानदारी से अमल में भी लाया जाना चाहिए।हमें याद रखना चाहिए कि हिमालय नवीनतम पर्वत.श्रृंखला है। परिवर्तन उसका स्वाभाविक स्वभाव है। इन परिवर्तनों के प्रति सोच और नीतियों को आपदा.प्रबंधन के बजाय प्रो.एक्टिव.मैनेजमेंट की ओर अधिक फोकस करना होगा।

उत्तराखण्ड में नंदादेवी के प्रति अगाध श्रद्धा है। राजा और प्रजा दोनों ही इसे सदियों से शक्ति, विश्वास और प्रेरणा का स्रोत मानते आए हैं। यहाँ तक कि जनमानस उसे धियाण ब्याहता बहन.बेटी मानता है। ऋषिगंगा, नंदा.श्रृंखला में रहने वाली उसी मिथकीय धियाण द्वारा प्रवाहित पवित्र सरिता है। ऐसा भी कह सकते हैं कि यूनेस्को का ध्यान जिस भौगोलिक विशिष्टता की ओर 1988 में गया, उसे उत्तराखण्डवासी सदियों पहले से पहचानते थे। खुद ही सोचिए, ऋषिगंगा के रूप में निःसृत, इसी नंदादेवी का पवित्र चरणामृत, टनलों से गुजार कर टरबाइन घुमाने के लिए है या कलशों में रख कर आचमन करने योग्य।

उत्तराखंड के चमोली जिले में नंदा देवी ग्लेशियर टूटने से धौलीगंगा नदी में अचानक बाढ़ आने से प्रदेश के उत्तरी हिस्से में काफी तबाही हुई है और कई लोगों की जानें गई हैं। दोनों नंदा देवी ग्लेशियर पूरे साल पूरी तरह से बर्फ से ढंकी रहती है, जिसके एक हिस्से में हुई टूट के चलते रविवार वाली तबाही होने की बात सामने आ रही है। नंदा देवी के पश्चिम में ऋषिगंगा घाटी और पूरब में गौरीगंगा घाटी है। यह ग्लेशियर नंदा देवी सैंचुरी अभयारण्य का हिस्सा है, जिसका जल पश्चिम की ओर ऋषिगंगा में प्रवाहित होता है। नंदा देवी ग्लेशियर के पिघलने वाले जल से कई धाराएं और नदिया बनती हैं। ऋषिगंगा में सबसे पहले इसका जल प्रवाहित होने के बाद वह धौलीगंगा नदी में मिलता है। बता दें कि धौलीगंगा गंगा की सहायक नदियों में एक है। आगे चलकर धौलीगंगा विष्णुप्रयाग में अलकनंदा नदी में मिल जाती है।

विश्व धरोहर के रूप में प्रसिद्ध नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट एरिया में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1980 से 2017 के बीच ग्लेशियर में तकरीबन 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 1980 में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट का कुल 243 वर्ग किमी एरिया बर्फ से ढका था, लेकिन 2017 में यह एरिया 217 वर्ग किमी ही रह गया। सेटेलाइट डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। साथ ही पूरे क्षेत्र में लगभग चार दशक में 26 फीसदी तक बर्फ कम हो चुकी है और स्नो लाइन भी तेजी से कम होती जा रही है, जो प्रकृति और पर्यावरण के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2003 से 2018 में उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों और अन्य भू.विशेषेज्ञों की मदद से नंदोदेवी बायोस्फीयर रिजर्व और कोर जोन नंदादेवी नेशनल पार्क क्षेत्र में प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति पर शोध किया गया था। हम सबको प्रकृति के प्रति, जीव.जगत के प्रति सचेष्ट होना होगा। चिपको आंदोलन ने पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था। पर्यावरण संरक्षण का जिस भूमि से पूरी दुनिया को संदेश मिला, आज वह गांव एकबार फिर चर्चा में है, लेकिन आज इस गांव के चर्चा में आने की वजह ग्लेशियर फटने की प्राकृतिक आपदा है।

Share91SendTweet57
Previous Post

बांक गांव में मकान जला, घर में रह रहे अकेले वृद्ध की जलकर मौत

Next Post

मित्र पुलिस ने निर्दोषों को फंसाया, पुलिस अधीक्षक से लगाई गुहार!

Related Posts

उत्तराखंड

राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के अंतर्गत ब्लॉक स्तरीय विज्ञान क्विज प्रतियोगिता का आयोजन

January 16, 2026
37
उत्तराखंड

किसान आत्महत्या मामले में कांग्रेस का पुलिस मुख्यालय कूच, डोईवाला से बड़ी संख्या में कांग्रेसी शामिल

January 16, 2026
16
उत्तराखंड

डोईवाला: केंद्र सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन

January 16, 2026
22
उत्तराखंड

नुक्कड़ सभा में अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग

January 16, 2026
11
उत्तराखंड

पूर्व सैनिक नायक कलम सिंह बिष्ट को सम्मानित किया गया

January 16, 2026
11
उत्तराखंड

वीबी जी राम जी योजना से गांवों में रोजगार की मजबूत नींव रख रही है भाजपा: दीप्ति रावत

January 16, 2026
29

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67583 shares
    Share 27033 Tweet 16896
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45769 shares
    Share 18308 Tweet 11442
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38040 shares
    Share 15216 Tweet 9510
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37430 shares
    Share 14972 Tweet 9358
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37312 shares
    Share 14925 Tweet 9328

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

राष्ट्रीय आविष्कार अभियान के अंतर्गत ब्लॉक स्तरीय विज्ञान क्विज प्रतियोगिता का आयोजन

January 16, 2026

किसान आत्महत्या मामले में कांग्रेस का पुलिस मुख्यालय कूच, डोईवाला से बड़ी संख्या में कांग्रेसी शामिल

January 16, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.