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लगातार सिकुड़ता जा रहा है ऋषि गंगा ग्लेशियर

17/02/21 - Updated on 18/02/21
in उत्तराखंड, चमोली
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पूरा ऋषिगंगा क्षेत्र, नंदादेवी बायोस्फियर रिज़र्व के अंतर्गत आता है। रैणी गाँव और बैराज बफर ज़ोन में आते हैं। इस रिज़र्व का कोर ज़ोन, हिमाच्छादित चोटियों से घिरा ऐसा अद्भुत क्षेत्र है, जिसमें एकमात्र प्रवेश मार्ग ऋषिगंगा घाटी से ही है और जो अत्यंत दुष्कर है। अनोखी भौगोलिक स्थिति की विशिष्ट जैव.विविधता के दृष्टिगत ही इस क्षेत्र को नंदादेवी पार्क और बाद में बायोस्फियर रिज़र्व बनाया गया। लाता, दूनागिरी, चंगबंग, कालंका, ऋषिपहाड़, नंदादेवी पूर्वी, नंदाखाट मृगत्यूड़ी, त्रिशूल और नंदाघुंटी शिखर बेसिननुमा इस कोर ज़ोन की सीमा बनाते हैं। रिजर्व आज से 32 साल पहले अस्तित्व में आया था, यूनेस्को के मैन एण्ड बायोस्फियर प्रोग्राम के तहत। तत्समय ये भारत में दूसरा बायोस्फियर था जो चमोली, बागेश्वर और पिथौरागढ़ तीन जिलों में स्थित है।

लगभग वृत्ताकार, उच्च हिमालय शिखरों से घिरे इस महत्वपूर्ण कोर ज़ोन से जलप्रवाह का एक ही मार्ग है, और वो है ऋषिगंगा। इसी ऋषिगंगा के अंतिम छोर के वाम पार्श्व में स्थित है, पर्यावरण.ऋषि गौरादेवी की कर्मस्थली, उनका गाँव रैणी। वैश्विक विरासत घोषित ये कोर ज़ोन, उत्तराखण्ड के पास एक महत्वपूर्ण धरोहर है। छिटपुट विरोध के बाद स्थानीय निवासी कोर ज़ोन में, मानवीय गतिविधियों पर प्रतिबंध का पूरी तरह पालन करते रहे हैं। हालांकि स्थानीय निवासियों की जीविकोपार्जन गतिविधियाँ कभी भी खतरनाक नहीं होती हैं। कई बार तो इनके जरिए ही वो महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं जो आधुनिक यंत्र.तकनीकी भी नोटिस नहीं कर पाते हैं और न ही वन विभाग के कार्मिक.अधिकारी। इन्हीं लोगों के सहयोग से ब्रिटिश काल में उच्च हिमालयी क्षेत्रों का सफल सर्वेक्षण किया जा सका और इन्हीं से प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से ही कई आपदाओं के प्रभाव को सीमित भी किया जा सका।

गौरा देवी के जग.प्रसिद्ध चिपको आंदोलन, गोविंद सिंह रावत की स्थानीय मुद्दों को लेकर बुलंद आवाज़ और हक़.हक़ूक को लेकर धन सिंह राणा का छीनो.झपटो आंदोलन को भी कैसे विस्मृत किया जा सकता है। इन्हीं का असर था कि जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बाँध की जगह रन आफ द रीवर तकनीकी को अपनाया जाने लगा। नंदादेवी कोर ज़ोन के मुहाने पर ऐसी किसी भी परियोजना को तो बिल्कुल भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि ऐसी परियोजनाओं के डीपीआर में जिन आपात्कालीन सुरक्षा मानकों का उल्लेख होता है, वो आपात्काल में कहीं नज़र ही नहीं आते। ऐसा भी देखा गया है कि इस तरह की कम्पनियों के बीमा.अनुबंध कार्मिक हित की जगह कम्पनी हित को सुनिश्चित करने की ओर अधिक झुके होते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग और संवेदनशील क्षेत्रों में असुरक्षित छेड़छाड़ उच्च हिमालयी क्षेत्रों की आपदाओं का प्रमुख कारण है। ग्लोबल वार्मिंग के संभावित खतरों के प्रति स्थानीय निवासियों की जागरूकता बढ़ायी जानी चाहिए और विकास कार्यों में असुरक्षित छेड़छाड़ को रोका जाना चाहिए। परियोजनारंभ से पहले पर्यावरणीय अनापत्ति की संस्तुतियों को पब्लिक डोमेन में भी रखा जाना चाहिए और उन्हें ईमानदारी से अमल में भी लाया जाना चाहिए।हमें याद रखना चाहिए कि हिमालय नवीनतम पर्वत.श्रृंखला है। परिवर्तन उसका स्वाभाविक स्वभाव है। इन परिवर्तनों के प्रति सोच और नीतियों को आपदा.प्रबंधन के बजाय प्रो.एक्टिव.मैनेजमेंट की ओर अधिक फोकस करना होगा।

उत्तराखण्ड में नंदादेवी के प्रति अगाध श्रद्धा है। राजा और प्रजा दोनों ही इसे सदियों से शक्ति, विश्वास और प्रेरणा का स्रोत मानते आए हैं। यहाँ तक कि जनमानस उसे धियाण ब्याहता बहन.बेटी मानता है। ऋषिगंगा, नंदा.श्रृंखला में रहने वाली उसी मिथकीय धियाण द्वारा प्रवाहित पवित्र सरिता है। ऐसा भी कह सकते हैं कि यूनेस्को का ध्यान जिस भौगोलिक विशिष्टता की ओर 1988 में गया, उसे उत्तराखण्डवासी सदियों पहले से पहचानते थे। खुद ही सोचिए, ऋषिगंगा के रूप में निःसृत, इसी नंदादेवी का पवित्र चरणामृत, टनलों से गुजार कर टरबाइन घुमाने के लिए है या कलशों में रख कर आचमन करने योग्य।

उत्तराखंड के चमोली जिले में नंदा देवी ग्लेशियर टूटने से धौलीगंगा नदी में अचानक बाढ़ आने से प्रदेश के उत्तरी हिस्से में काफी तबाही हुई है और कई लोगों की जानें गई हैं। दोनों नंदा देवी ग्लेशियर पूरे साल पूरी तरह से बर्फ से ढंकी रहती है, जिसके एक हिस्से में हुई टूट के चलते रविवार वाली तबाही होने की बात सामने आ रही है। नंदा देवी के पश्चिम में ऋषिगंगा घाटी और पूरब में गौरीगंगा घाटी है। यह ग्लेशियर नंदा देवी सैंचुरी अभयारण्य का हिस्सा है, जिसका जल पश्चिम की ओर ऋषिगंगा में प्रवाहित होता है। नंदा देवी ग्लेशियर के पिघलने वाले जल से कई धाराएं और नदिया बनती हैं। ऋषिगंगा में सबसे पहले इसका जल प्रवाहित होने के बाद वह धौलीगंगा नदी में मिलता है। बता दें कि धौलीगंगा गंगा की सहायक नदियों में एक है। आगे चलकर धौलीगंगा विष्णुप्रयाग में अलकनंदा नदी में मिल जाती है।

विश्व धरोहर के रूप में प्रसिद्ध नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट एरिया में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से कराए गए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1980 से 2017 के बीच ग्लेशियर में तकरीबन 10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 1980 में नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व के ऋषिगंगा कैचमेंट का कुल 243 वर्ग किमी एरिया बर्फ से ढका था, लेकिन 2017 में यह एरिया 217 वर्ग किमी ही रह गया। सेटेलाइट डेटा के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया है कि 37 सालों में हिमाच्छादित क्षेत्रफल में 26 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है। साथ ही पूरे क्षेत्र में लगभग चार दशक में 26 फीसदी तक बर्फ कम हो चुकी है और स्नो लाइन भी तेजी से कम होती जा रही है, जो प्रकृति और पर्यावरण के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2003 से 2018 में उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र, वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों और अन्य भू.विशेषेज्ञों की मदद से नंदोदेवी बायोस्फीयर रिजर्व और कोर जोन नंदादेवी नेशनल पार्क क्षेत्र में प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति पर शोध किया गया था। हम सबको प्रकृति के प्रति, जीव.जगत के प्रति सचेष्ट होना होगा। चिपको आंदोलन ने पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया था। पर्यावरण संरक्षण का जिस भूमि से पूरी दुनिया को संदेश मिला, आज वह गांव एकबार फिर चर्चा में है, लेकिन आज इस गांव के चर्चा में आने की वजह ग्लेशियर फटने की प्राकृतिक आपदा है।

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