• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

ग्लेशियरों की निगरानी के लिए प्रभावी तंत्र है कहां?

10/02/21
in उत्तराखंड, चमोली
Reading Time: 1min read
134
SHARES
167
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter
https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड चमोली जिले की नीति घाटी में नंदा देवी ग्लेशियर टूटने से बाढ़ का सामना कर रहा है। वैसे तो भारत में ग्लेशियर की वजह से नुकसान आम बात नहीं है, लेकिन फिर भी भारत सरकार हिमालय के ग्लेशियरों पर खास तौर पर निगरानी का काम देश की कई अनुसंधान संस्थाओं के जरिए करती है, लेकिन प्रमुख कार्य बेंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान के दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज ने किया है। कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक के भारतीय इलाकों में कुल 267 ग्लेशियर हैं, जिन पर निगरानी रखने के साथ संबंधित शोध हुए हैं। दुनिया के तीसरे ध्रुव के नाम से पहचाने जाने वाले हिमालय को लेकर जितनी जानकारी है उससे यह संकट खत्म होने से रहा, क्योंकि न तो ज्यादा डेटा है और न ही रिसर्च।

आर्कटिक और अंटार्टिका के बाद दुनिया का तीसरा ध्रुव इसी हिमालय क्षेत्र को हिन्दू कुश भी कहते हैं। जो हिमालय क्षेत्र अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, किर्गिजस्तान, मंगोलिया, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान तक यानी लगभग 5 मिलियन वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है। विशेषताओं की बात करें तो इस पूरे क्षेत्र में सांस्कृतिक रूप से संपन्न एक बड़ी आबादी रहती है। हां, यही वो अकेला क्षेत्र है जो ध्रुवीय क्षेत्रों से अलग बाहर की दुनिया में सबसे ज्यादा बर्फ इकट्ठा करता है, इसीलिए इसको द थर्ड पोल भी कहते हैं। ऐसे में घूम फिरकर वही सच्चाई सामने आ जाती है कि हिमालय के ग्लेशियरों में जो चल रहा है, उसकी क्या वजह है और उसे कैसे रोका जा सकता है। इस पर न तो कोई प्रमाणित शोध ही है और न ही पूरी गंभीरता से कुछ किया गया दिखता है। हालांकि इस बार सर्दियों में यह हादसा हुआ है जिस पर कई लोगों को आश्चर्य होना स्वाभाविक है। यह भी सच है कि पिछले काफी दिनों से वहाँ पर मौसम बिगड़ा हुआ था और जबरदस्त बर्फबारी हो रही थी। हो सकता है कि इससे उस पूरे इलाके में फिसलन भी बढ़ गई हो जिसके चलते कोई बर्फ की चट्टान खिसक गई हो। लेकिन यह सब कयास ही हैं। चमोली का सच वैज्ञानिक शोध का विषय है। लेकिन सवाल वही कि कि हम हादसों से कब सीख लेंगे?

यूं तो ग्लेशियरों पर ग्लोबल वॉर्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन के असर को लेकर लंबे समय से और बेहद विस्तार से अध्ययन किया जा रहा है। जिससे ही पता चला कि हिमालय के हिंदुकुश क्षेत्र में पारा बढ़ रहा है। जिससे वैश्विक तापमान की वृध्दि का असर ज्यादा ऊंचाई पर होने से हिमालय पर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। फिर भी सब कुछ जानकर अनजान रहना और धीरे से बड़ी.बड़ी विपदाओं को भुला देना और फिर किसी नए हादसे की ओर चल पड़ना जहां भावी पीढ़ी के साथ.साथ पूरी मानव सभ्यता व उसी प्रकृति के साथ अन्याय है। जिसने हमें यह जीवन दिया। काश इस हादसे के बाद प्रकृति का स्वाभाव, जलवायु परिवर्तन और धरती की तपन की सच्चाई समझ आ पाती! लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि पठारी इलाकों में तापमान बढ़ने से हवा ज्यादा आर्द्र यानी नम होती है। सर्दियों में बर्फ ज्यादा गिरती है, जिससे बढ़ता वजन हिमस्खलन का कारण बनता है। वहीं गर्मियों में बारिश का पानी दरारों में लॉक हो जाता है जिससे मिट्टी और बर्फ में फिसलन पैदा होती है और हिमस्खलन होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह बड़े कारण हो सकते हैं। लेकिन उससे भी ज्यादा यह कि ऐसी परिस्थितियां एकाएक क्यों निर्मित होने लगीं? जहां भू.गर्भीय, धरातल में होने वाली गतिविधियों की निगरानी और जानकारी के लिए जिस तरह से कई उपकरण और तंत्र हैं, काश ग्लेशियरों में होने वाली गतिविधियों को दर्ज करने के लिए भी ऐसे ही आर्टिफीसियल इण्टेलीजेन्स विकसित कर लिए जाते जो असंभव नहीं है। दुख इस बात का है कि देश में ही नामी गिरामी तकनीकी संस्थाओं के बावजूद इस पर किसी का ध्यान हीं गया।

वहीं पेरिस क्लाइमेट समझौता भी जल्द अमल में लाया जाता जिससे ग्लोबल वार्मिंग के बीच तापमान को 2 डिग्री तक कम किया जा सकता और डेढ़ डिग्री से ज्यादा न बढ़े यह व्यवस्था हो पाती। लेकिन ज्यादातर देशों ने संयुक्त राष्ट्र को इस पर अपनी कोई योजना ही नहीं दी है न ही अमल में लायाण् काश इन सबसे भी ग्लेशियर क्षेत्रों में होने वाली बड़ी जन और धन हानियों को रोका सकता। हालिया शोध में यह बात सामने आई है कि गंगोत्री ग्लेशियर पर्यावरण में आए बदलाव के चलते हर साल 22 मीटर पीछे खिसक रहा है। जहां तक सब दूसरे सबसे बड़े ग्लेशियर का सवाल है, तो पिंडारी ग्लेशियर 30 किमीमीटर लंबा और 400 चौड़ा है। यह ग्लेशियर त्रिशूल, नंदा देवी और नंदाकोट पर्वतों के बीच स्थित है, पर्यावरणीय बदलाव की वजह से फिलहाल हर साल ये ग्लेशियर कई मीटर तक पीछे खिसक रहे हैं। अतिसंवेदनशील ग्लेशियरों के टूटने, एकाएक पिघलने से उत्तर भारत में भयावह बाढ़ और तबाही की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड में ऐसी करीब 50 ग्लेशियर झीलें खतरनाक स्थिति में हैं और इनका फटना तबाही का सबब बन सकता है।

हिमालय के ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए वर्ष 2009 में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। इस प्रोजेक्ट को अब अचानक बंद कर दिया गया है। केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने निर्णय कर लिया है कि इस सेंटर को अब कोई बजट जारी नहीं किया जाएगा। विभाग के इस निर्णय से वाडिया संस्थान को बड़ा झटका लगा है और कहीं न कहीं इससे ग्लेशियरों पर किया जा रहा अध्ययन भी प्रभावित होगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी के लिए वर्ष 2009 में 23 करोड़ रुपये दिए थे। तब यह प्रोजेक्ट पांच साल का था। जलवायु परिवर्तन के दौर में ग्लेशियरों की स्थिति पर अध्ययन की महत्ता को देखते हुए वर्ष 2014 में तय किया गया कि इसे हर साल एक्सटेंशन दिया जाएगा। तब से केंद्र सरकार से सेंटर में काम कर रहे विज्ञानियों व विभिन्न तकनीकी कायरें के लिए हर साल एक से डेढ़ करोड़ रुपये प्राप्त हो रहे थे। अब ग्लेशियरों पर अध्ययन के लिए विज्ञानियों को संस्थान के अल्प बजट पर निर्भर रहना है सेंटर फॉर ग्लेशियोलॉजी की शुरुआत में अहम भूमिका निभाने वाले हिमनद विशेषज्ञ उनका कहना है कि नॉर्थ व साउथ पोल के बाद जिस हिमालय को थर्ड पोल माना जाता है, उसके ग्लेशियरों के अध्ययन का प्रोजेक्ट बंद नहीं किया जाना चाहिए। ग्लेशियर उत्तर भारत की प्रमुख नदियों के एक तरह के रिजर्व बैंक हैं और जलवायु के प्रति बहुत संवेदनशील है। जलवायु परिवर्तन का उन पर व्यापक असर होता है। दुनिया के अन्य ग्लेशियरों की तुलना में हिमालय के ग्लेशियरों के बारे में बहुत कम जानकारी और आंकड़े हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ये ग्लेशियर बहुत ही दुर्गम स्थानों पर हैं। इस अल्प अवधि में संस्थान ने दर्जनों ग्लेशियरों पर अध्ययन किया और ऐसे आंकड़े एकत्रित किए, जो किसी संस्थान के पास नहीं हैं।

Share54SendTweet34
Previous Post

टनल में फंसे लोगों के परिजनों का सब्र का बांध टूटा, सरकार, एनटीपीसी के खिलाफ प्रदर्शन

Next Post

मनोहर पंवार बने राजकीय प्राथमिक शिक्षक संगठन के अध्यक्ष

Related Posts

उत्तराखंड

रेत, बजरी और पत्थरों की अंधाधुंध लूट ने इन नदियों को भीतर से खोखला कर दिया है

January 20, 2026
8
उत्तराखंड

महाशिवरात्रि के पर्व पर आयोजित होने वाले तीन दिवसीय सांस्कृतिक एवं पर्यटन मेला देवाल कौथिग की तैयारियां जारी

January 20, 2026
115
उत्तराखंड

किसानों की डिजिटल आईडी फार्मर रजिस्ट्री तैयार करने के लिए राजस्व एवं कृषि विभागों ने शिविर का आयोजन किया

January 20, 2026
75
उत्तराखंड

कलम सिंह बिष्ट के नाम एक खिताब और, उन्हें भारतीय सेना प्रमुख विशेष सम्मान से नवाजेंगे

January 20, 2026
55
उत्तराखंड

एशिया की सबसे कठिन यात्रा नंदा राजजात

January 20, 2026
11
उत्तराखंड

लच्छीवाला टोल प्लाजा पर शुरू नहीं हो सकी ई-डिटेक्शन प्रणाली

January 20, 2026
9

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67589 shares
    Share 27036 Tweet 16897
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45769 shares
    Share 18308 Tweet 11442
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38040 shares
    Share 15216 Tweet 9510
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37430 shares
    Share 14972 Tweet 9358
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37312 shares
    Share 14925 Tweet 9328

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

रेत, बजरी और पत्थरों की अंधाधुंध लूट ने इन नदियों को भीतर से खोखला कर दिया है

January 20, 2026

महाशिवरात्रि के पर्व पर आयोजित होने वाले तीन दिवसीय सांस्कृतिक एवं पर्यटन मेला देवाल कौथिग की तैयारियां जारी

January 20, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.