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संपूर्ण संस्कृत वाङ्मय लोक जीवन से जुड़ा है – लीलाधर जगूड़ी

_दून पुस्तकालय में नवोदित प्रवाह लोक संस्कृति विशेषांक का लोकार्पण

09/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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*संपूर्ण संस्कृत वाङ्मय लोक जीवन से जुड़ा है – लीलाधर जगूड़ी*
_दून पुस्तकालय में नवोदित प्रवाह लोक संस्कृति विशेषांक का लोकार्पण_

देहरादून,9 मार्च2026. दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, देहरादून के तत्वावधान में केंद्र के सभागार में आयोजित समारोह मेंरजनीश त्रिवेदी द्वारा संपादित साहित्यिक पत्र नवोदित प्रवाह के लोक संस्कृति विशेषांक का भव्य लोकार्पण साहित्यकारों द्वारा किया गया। लोकार्पण के पश्चात लोक संस्कृति पर विमर्श भी किया गए।

समारोह के मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित देश के वरिष्ठ कवि और साहित्यकार पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी थे जबकि अध्यक्षता राज्य की मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमती राधा रतूड़ी ने की।लोकार्पण के उपरांत लोक संस्कृति विमर्श में वरिष्ठ लेखक श्री अनिल रतूड़ी, पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल,गीतकार डॉ रामविनय सिंह,श्री नौटियाल ने भाग लिया।

मुख्य अतिथि श्री लीलाधर जगूड़ी ने अपने संबोधन में कहा कि लोकार्पित विशेषांक अत्यधिक वैदुष्यपूर्ण और संग्रहणीय है। उन्होंने विशेषांक में प्रकाशित कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के समय में कविताएं लिखने वाले ऐसे कवि दुर्लभ हो गये हैं जो भाषा में शब्दों को लेकर अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति नये ढंग से कर सकें।उन्होंने कहा कि सबसे पहले प्राकृत कविताओं का स्मरण इस अंक को देखते ही हो जाता है।पता चल जाता है कि कविता ने अपने कितने बौद्धिक घराने बदले हैं।विशेषांक में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तथा गुजरात से पूर्वोत्तर असम,अरुणाचल,नागा लोक संस्कृति की प्रस्तुति अत्यंत रोचकता के साथ प्रस्तुत की गई है उत्तराखण्ड के कुमाऊनी, गढ़वाली,तथा जौनसारी जीवन पद्धति का स्मरण कराने वाले विवेचन प्रस्तुत किये गये हैं।प्रसिद्ध कुमाऊनी झोड़ा का संस्कृत भावानुवाद प्रस्तुत किया गया है।

श्री लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि आजकल ऐसी विद्वतापूर्ण पत्रिका का प्रकाशन में एक अद्भुत संयोग ही नहीं बल्कि विलक्षण घटना मानता हूँ इसमें डॉ गिरिजा शंकर त्रिवेदी जी की कविता ‘ कोई घर आने वाला है ‘ देखकर तो मुझे पूरा अतीत याद आ गया। उन्होंने कहा कि लोक संस्कृति विशेषांक में पाली साहित्य में लोक संस्कृति से लेकर भारत की लगभग सभी भाषाओं के साहित्य की प्रवृत्तियों और रचनाकारों के माध्यम से भारतीय लोक संस्कृति की विवेचना प्रस्तुत की गई है। उन्होंने डॉ सुधा पाण्डे के पाली साहित्य पर लेख को बहुत ही महत्वपूर्ण बताया जो हमें बौद्ध साहित्य के अंतर्गत त्रिपिटक और थेर गाथाओं में आध्यात्म के साथ साथ भिक्षु नाग सेन और मिलिंद के संवादों की भी स्मृति दिलाता है ।

समारोह के मुख्य वक्ता पूर्व पुलिस महानिदेशक व साहित्यकार श्री अनिल रतूड़ी ने लोक संस्कृति विशेषांक का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया औरकहा साहित्यिक पत्रिका “नवोदित प्रवाह,” 2026, वार्षिक अंक में लोक संस्कृति से जुड़े लगभग 107 साहित्यिक लेख संग्रहित हैं।

अपने संपादकीय में, संपादक ने लोक संस्कृति, उसके साहित्य, संगीत, चित्रकला और शिल्प के महत्व को रेखांकित किया है, .जो सदैव उस नींव का कार्य करती हैं जिससे उच्च सभ्यता का विकास होता है।

​यह अंक भारत जैसे विशाल देश की अनंत रंगीन लोक संस्कृति को समाहित करता है। जहाँ एक ओर इसमें अरुणाचल, मिजोरम आदि की सुदूर आदिवासी संस्कृति पर लेख हैं, वहीं दूसरी ओर इसमें भारत के लगभग सभी मुख्य राज्यों की लोक संस्कृति के दिलचस्प पहलुओं को दर्शाने वाले लेख भी शामिल हैं।

संपादक ने इस खंड में अवध, भोजपुरी, कन्नौज, मैथिली विदर्भ, मालवा, गढ़वाल, कुमाऊं, जौनसार, रवांई आदि जैसे आंचलिक लोक संस्कृति को भी पाठकों तक पहुँचाने के लिए स्थान दिया है।
भारत की अनंत संस्कृतिक विविधता के दृष्टिगत,​यह कहा जाता है कि समस्त विश्व की विविधता में,भारत द्वारा प्रदर्शित अनंत विविधता, को व्यक्त करने के लिए कुछ और जोड़ने की आवश्यकता होगी..​इसे पढ़ना किसी भी पाठक के लिए एक समृद्ध अनुभव होगा! मैं इस उत्कृष्ट संस्करण को श्रमपूर्वक प्रकाशित करने के लिए हार्दिक बधाई देता हूं।

सुप्रसिद्ध कवि और पत्रकार श्री सोमवारी लाल उनियाल प्रदीप ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि लोक की भावभूमि पर ही भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला और संगीत का उद्भव होता है। लोक से अनुप्राणित होकर ही मानवीय चेतना प्रतिभानुकूल जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अग्रसर होती है। वास्तव में लोक के बिना हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। वर्तमान में हमने जो लोकतंत्र स्वीकार किया, लोक के बिना वह सार्थक ही नहीं हो सकता।

इस अवसर पर लोक संस्कृति के विषय में बोलते हुए संस्कृत के विद्वान और कवि प्रो. राम विनय सिंह ने कहा कि ‘वेद’ मानव जाति के ज्ञानोत्कर्ष से समाविष्ट शास्त्रीयता और पाण्डित्य का प्रशस्त मानक रूप है और ‘लोक’ इससे भिन्न आम जनमानस के उच्चावच भावों की अक्रम अभिव्यक्ति का स्वीकृत संसार है। यही कारण है कि कहीं वेद लोक में स्वीकृत है तो कहीं लोक ही प्रधानतः मान्य है; किंतु मानव समाज की चेतना ने इसे दो पृथक् परिपाटी के रूप में ग्रहण किया है।

लोक के संस्कार, प्रथाएँ, खान-पान, पारिवारिक संबंध, वेशभूषा, आभूषण व प्रसाधन के साधन, कलाएँ, उत्सव, व्रत, औषधि ज्ञान, आर्थिक उपक्रम, धार्मिक जीवन परस्पर मानवीय भावनाएँ इत्यादि- सब मिलकर लोक और लोक संस्कृति का स्वरूप गढते हैं। निस्संदेह ये सभी तत्त्व मानवीय स्वरूप और संचेतना के साथ सर्वदा विद्यमान रहते ही रहते हैं। प्रो.सिंह ने संस्कृत की लोक दृष्टि से लेकर अधुनातन लोकभाषा और बोलियों तक की लोकयात्रा को अत्यंत प्रभावशाली रूप में दृष्टान्त पूर्वक अभिव्यक्ति दी।

प्रारंभ में अपने वक्तव्य मे पूर्व कुलपति और विदुषी लेखिका डॉ. सुधा पांडेय ने कहा कि”नवोदित प्रवाह का लोक संस्कृति विशेषांक ” लोक संस्कृति के जीवन्त संदेश के संवाद वाहक रूप में पाठको के लिए अद्भुत लोक के वैभव के साथ परिचय देने वाला अंक है , जिसमें उत्तर से दक्षिण की लोक यात्रा का साहित्य ही नहीं लोक के रसरंग भरा जीवन चैतन्य जागृत हो उठा है । लोक भाषाओ से समृद्ध इस विशेषांक मे भारतीय सांस्कृतिक विरासत और लोक जीवन के अन्यान्य चित्र साकार हुए हैं,। लोक का यह रूप मनुष्य मात्र की आत्मा का सगुण साकार रूप बन जाता हैं ,जब गीत , नृत्य , जीवन के अंग बन कर लोक के अद्भुत रूप ही नहीं अपितु मनुष्य मात्र की चेतना को आनंद के रसार्णव में मग्न कर देते हैं ।वाचिक परंपरा के वैदिक मंत्रों से आहूत लोक की यह धारा चिर काल से प्राणि मात्र की रसानंद वर्षण करने वाली अमृत निस्यंदिनी धारा रही है । लोक के साहचर्य में, मनुष्य ही नहीं सारी जड़ चेतन प्रकृति आनंद करती हैं । संस्कृति वह सूत्र है जो लोक को बांध कर रखता है और साहित्य या शास्त्र उस महीन सूत्र का भास्वर रूप है । लोक का यही रूप मानव मन में बसी उस अवचेतन प्रवृत्ति का साक्षी है , जो मिथक के रूप में विभिन्न विधाओं में हर युग की साक्षी बनती है ,यही मिथकीय शक्ति सामूहिक मन की मान्यताओं के रूप में हर प्रदेश के जीवन में छिपी, मिलती है , कवि और कलाकार की चेतना उसे शब्दायित करके सुर ,ताल के साथ पाठकों दर्शकों के मन में ऊर्जा और आनंद का संचार करती हैं ,इस भावभूमि में पंहुच कर अतीन्द्रिय आनंद की समान अनुभूति सभी भावकों को होती है , इसी अनुभूति की पृष्ठभूमि शास्त्र की जननी बन पाती है । ” नवोदित प्रवाह ” का यह सुधी लेखकों के सहयोग सें भारतीय भाषाओ और लोक जीवन के महत्वपूर्ण तत्वों के साथ पाठकों कें लिए लोकार्पित हुआ है, उन्होंने संपादक मंडल को साधुवाद और बधाई दी।

पद्मश्री माधुरी बड़थ्वाल ने लोक संस्कृति में लोक संगीत के महत्व का प्रतिपादन किया और कहा कि जो संग रहे वही संगीत है।जो गीत आत्मा से निकलता है वही सच्चा लोकगीत है। हमें अपने लोक और अपनी मिट्टी से जुड़ना चाहिए।

मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमती राधा रतूड़ी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में लोक संस्कृति और लोक जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि नवोदित प्रवाह का यह संकलन लोक संस्कृति पर केन्द्रित है। यह अंक उत्तराखण्ड के अलावा देश के विविध क्षेत्र समाज की आत्मा को गहराई से प्रदर्शित करने में पूरी तरह से सक्षम है। भारत देश के अलग – अलग प्रान्तों की सांस्कृतिक विविधताओं को बहुत ही कुशलता से त्रिवेदी जी ने इस अंक में प्रस्तुत कर संजोया है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में नवोदित प्रवाह के संपादक रजनीश त्रिवेदी ‘आलोक ‘ ने स्वागत संबोधन दिया। कार्यक्रम का कुशल संचालन कवयित्री भारती मिश्रा ने किया.कार्यक्रम के समापन से पूर्व उपस्थित अतिथियों व लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने दिया।

इस अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड नृप सिंह नपलच्याल, सोमवारी लाल उनियाल प्रदीप, कृपा राम नौटियाल, डॉ. पंकज नैथानी, डॉ. दाता राम पुरोहित, डी. के. कांडपाल, तापस चक्रवर्ती, जयप्रकाश खंकरियाल, सत्यानंद बडोनी, मंजू काला,श्री सोमेश्वर पाण्डेय, हरि चंद निमेष, श्री सचिन चौहान, श्रीमती श्रद्धा मिश्रा, डॉ क्षमा कौशिक, कविता बिष्ट , डॉ लालिमा वर्मा, डाॅ. आर.पी. भारद्वाज भगवान प्रसाद घिल्डियाल, डॉ. सुदेश ब्याला, डॉ बैजनाथ , मधुलिका श्रीवास्तव, सुनील त्रिवेदी, श्री सतीश बंसल,दर्द गढ़वाली केंद्र के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी.के. पांडे, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, डॉ. लालता प्रसाद, राकेश कुमार सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध लोग, पाठक व रचनाकार उपस्थित रहे।

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