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उत्तराखंड का अनोखा स्कूल यहां ‘हेड हार्ट और हैंड’ पर फोकस

09/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के विकासनगर के कटापत्थर में नौनिहाल यूनिक तरीके से आखर ज्ञान ले रहे हैं. यहां किताबी शिक्षा के साथ बच्चों को प्रकृति से जोड़कर पिछले एक साल से अनूठी शिक्षा दी जा रही है. जिससे छात्र आसानी से समझ को विकसित कर शिक्षा पा रहे हैं. इस पहल की वजह से स्कूल को ‘उल्टा-पुल्टा’ स्कूल भी कहा जाता है. दरअसल, विकासनगर निवासी श्रेय रावत और उनकी पत्नी ज्योति रावत ने साल 2023 में कटापत्थर में एक वैकल्पिक स्कूल की पहल शुरू की. जिसके तहत उन्होंने ‘सुराह’ पहल की शुरुआत की है. जिसके तहत पहाड़ों में वैकल्पिक और प्रगतिशील शिक्षा का मॉडल विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है. जहां पहाड़ी और आदिवासी समुदायों के बच्चों को शिक्षा दी जा रही है. ‘सुराह’ की शुरुआत के पीछे एक गहरी पारिवारिक और सामाजिक कहानी भी जुड़ी हुई है. बचपन से हम लोग अपने दादा-दादी की कहानियों को सुनते हुए बडे़ हुए हैं. कैसे उनके दादा-दादी को पढ़ाई के लिए कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था. उस समय पहाड़ों में शिक्षा की पहुंच बहुत सीमित थी. शिक्षा के उस संघर्ष की कहानी ने मेरे मन में यह सवाल जगाया कि पहाड़ों के बच्चों को उनके गांव में ही बेहतर शिक्षा कैसे मिल सकती है?श्रेय रावत पिछले 12 सालों से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं. इस दौरान उन्होंने टीच फॉर इंडिया जैसी संस्था के साथ काम किया. साल 2023 में उन्होंने अपने गृह क्षेत्र उत्तराखंड लौटने का निर्णय लिया. ताकि, अपने पहाड़ और अपने लोगों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में काम कर सकें. जिसके तहत उन्होंने वैकल्पिक स्कूल सुराग की स्थापना की. वर्तमान में ‘सुराह’ के तहत कटापत्थर में चल रहे स्कूल में नर्सरी से कक्षा 5वीं तक 75 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. अब स्कूल को आगे बढ़ाते हुए कक्षा 8वीं तक विस्तारित किया जाएगा. इस स्कूल में शिक्षा का तरीका पारंपरिक स्कूलों से अलग है. यहां प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण के माध्यम से पढ़ाई होती है. जहां स्थानीय संदर्भ को ही पाठ्यक्रम का आधार बनाया जाता है. बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को चार आयमों के माध्यम से विकसित किया जाता है. जगतज्ञान, स्वज्ञान, खोज और मौज. इस स्कूल का दृष्टिकोण अलग है. यहां शिक्षा की पारंपरिक संरचनाओं और तरीकों पर लगातार सवाल भी उठाए जाते हैं. इसलिए समुदाय में लोग इसे ‘उल्टा-पुल्टा’ स्कूल भी कहने लगे हैं. यह नाम इस बात को दर्शाता है कि यहां बच्चों को अलग तरीके से सीखने, सोचने और समझने के अवसर दिए जाते हैं. इस पहल का उद्देश्य ऐसे बच्चों को तैयार करना है, जो आलोचनात्मक सोच रखने वाले हों और भावनात्मक रूप से संवेदनशील एवं सक्षम नेता बनें, जो अपने समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें. एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ये भी है कि पहाड़ों के परिवारों को बेहतर शिक्षा के लिए अपने गांव छोड़कर पलायन न करना पडे़, बल्कि उन्हें अपने गांव में उत्कृष्ट शिक्षा मिल सके. सुराह का लक्ष्य आने वाले पांच सालों में 5 वैकल्पिक स्कूल उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थापित करना है. इसके माध्यम से एक नया और प्रगतिशील शैक्षिक मॉडल विकसित किया जाएगा, जिसे आगे चलकर उत्तराखंड के अन्य क्षेत्र में भी लागू किया जा सके. इस प्रयास के माध्यम से उम्मीद है कि शिक्षा के जरिए उत्तराखंड में स्थायी और संतुलित विकास को बल मिलेगा. हिमालय क्षेत्र में जागरूक, सक्षम और सशक्त समाज का निर्माण होगा. रावत बताते हैं कि मैंने अपने आसपास के स्कूलों को देखा तो जाना कि सिर्फ वही लोग जिनके पास पैसा है, अच्छे और बड़े स्कूल में अपने बच्चे भेज सकते हैं. दूसरी तरफ पहाड़ से बच्चे शिक्षा के लिए पलायन करके नीचे आ रहे हैं, जिससे सरकारी स्कूल या प्राइवेट स्कूल पहाड़ों में बंद हो रहे हैं. ऐसे में सोचा कि क्या कुछ ऐसा किया जा सकता है? जिसकी वजह से लोगों को अपने ही गांव में एक अच्छा खासा स्कूल मिले सके. ताकि उनको सिर्फ शहर में अच्छे स्कूल की तलाश ना करनी पड़े. जिसके तहत एक स्टेट लेवल में 10 लाख बच्चों को पढ़ा रहा था, लेकिन मुझे 10 बच्चों के नाम तक नहीं पता थे. साल 2023 में मैं वाइफ वापस उत्तराखंड आए और यह एक छोटा अल्टरनेटिव स्कूल जिसे ‘उल्टा-पुल्टा’ स्कूल कहते हैं, इसकी शुरुआत की. इसके तहत यूनिक तरीके से बच्चों को शिक्षा देने का काम शुरू किया. हमारे स्कूल में हेड (Head), हार्ट (Heart) और हैंड (Hands) पर फोकस करते हैं. जिसके तहत हेड का मतलब दिमागी शिक्षा है. जबकि, हार्ट का मतलब तो बच्चा खुद को जान सके और दूसरे से रिलेशन कैसे फॉर्म करना है, उसे जान सके. वहीं, हैंड का मतलब है कि प्रैक्टिकल स्किल्स. यानी बच्चे अपने हाथों से वो चीज कर पाएं, जो उनके रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं.श्रेय रावत आगे बताते हैं कि ट्रेडिशनल स्कूल में देखा जाता है कि वहां की शिक्षा सिर्फ हेड से संबंधित होती है. यानी पढ़ाई या किताबों से संबंधित हो जाती है, लेकिन हमारे स्कूल में हम सिर्फ किताबों को रटने के लिए नहीं बोलते हैं. हम बच्चों के आसपास क्या-क्या ऐसी चीज हैं, जिसके बारे में जान सके और गहन चिंतन कर सकें. उसके बारे में बताते हैं. प्रैक्टिकली हम बच्चों को जोड़ते हैं. उससे रूबरू करवाते हैं.उन्होंने बताया कि हम लोग बच्चों को अशोक के शिलालेख के भ्रमण पर ले गए थे. जहां बताया कि यह 2 हजार साल पुराना है. जिसे बच्चों ने वहां जाकर करीब से देखा और जाना कि सम्राट अशोक का साम्राज्य कहां-कहां तक फैला था. किस लिपि में लेख लिखे गए हैं.बच्चे जब वापस आए तो उन्होंने हाथ से खुद आर्ट इफेक्ट अशोक रॉक जैसा बनाया. इससे पता चला कि बच्चे अपने आसपास की अच्छी चीजें हैं, जिस पर वो गहन चिंतन कर करते हैं, उसको लेकर स्कूल में आते हैं. उसे ध्यान में रखकर पहल को आगे बढ़ाया गया.श्रेय बताते हैं कि उत्तराखंड में लैंडस्लाइड होता है. बच्चे उसको समझ सकें और जान सकें, उसके बारे में बच्चों को बताने के लिए हम वो न्यूज रिपोर्ट्स, वीडियो और क्लिपिंग लेकर क्लासरूम में आते हैं. उसे दिखाते हैं, उस पर चर्चा करते हैं. उसमें ये सोच विकसित करके बताते हैं कि अगर लैंडस्लाइड आए तो किस तरह से वो अपना बचाव कर सकते हैं? कैसे लोगों की मदद कर सकते हैं? इस तरह से बच्चे खुद से और अपने आसपास के एनवायरमेंट से जान पाते हैं. जब हम बच्चों को नियमों से न बांधें और उनको खुद से सीखने का मौका दें तो वो काफी ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं. वो काफी सोच पाते हैं और उनको मजा भी आता है. वो खुद ही सीखने और पढ़ने लग जाते हैं.उन्होंने बताया कि हम कोशिश करते हैं कि बच्चों के साथ क्या-क्या अलग चीज कर सकते हैं. हम चाहते हैं कि वो नए-नए प्रोजेक्ट करें. वो रचनात्मक तरीके से सोच पाएं और अपने उत्तराखंड के लिए ऐसी-ऐसी कल्पना कर पाएं, जिससे यहां के लोगों के साथ ही यहां की संस्कृति और समाज के विकास मदद मिल सके.देश तथा राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार युवाओं को बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए लगातार काम कर रही है ताकि राज्य के प्रतिभाशाली युवा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर सकें।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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