डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
वन हमारी माँ के घर की तरह हैं, चाहे जो भी हो जाये हम इसकी रक्षा करेंगे, वन से हमें जड़ी.बूटी, सब्जी.फल और लकड़ी मिलती है। जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी, हमारा सब कुछ बह जायेगा। यह नारा देकर गांधीजी के सत्याग्रह के बाद, चमोली के इस गृहिणी ने राज्य के द्वारा किये जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई में जो अगला हथियार, दिया उसका नाम था। चिपको आंदोलन पहाडो पर रहने वाली महिलाएं अच्छी तरह से जानती हैं कि कृषि प्रधान अर्थ व्यवस्था में इन जंगलो का क्या महत्त्व है? और उसको बचाना उनका धर्म है। पेड़ों को कटने से बचाने के लिये शुरु हुआ चिपको उत्तराखण्ड को जन आन्दोलनों की धरती भी कहा जा सकता है।
उत्तराखण्ड के लोग हमेशा से ही अपने जल.जंगल, जमीन और बुनियादी हक.हकूकों के लिय और उनकी रक्षा के लिये हमेशा से ही जागरुक रहे हैं। चाहे 1921 का कुली बेगार आन्दोलन, 1930 का तिलाड़ी आन्दोलन हो या 1974 का चिपको आन्दोलन या 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन या 1994 का उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति आन्दोलन। अपने हक.हकूकों के लिये उत्तराखण्ड की जनता और खास तौर पर मातृ शक्ति ने आन्दोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 1973 में देश में हुए चिपको आंदोलन को आज यानी 26 मार्च को 45 वर्ष पूरे हो गए हैं। पेड़ों को कटने से बचाने के लिए 1970 के दशक में इस आंदोलन की शुरुआत हुई और धीरे.धीरे इसने व्यापक रूप ले लिया। इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन इसलिए पड़ा क्योंकि लोग पेड़ों को कटने से बचाने के लिए इनसे चिपक जाते थे। इस आंदोलन की प्रणेता गौरा देवी को माना जाता है। गौरा देवी का जन्म 1925 में उत्तराखंड के लाता गांव के मरछिया परिवार में श्री नारायण सिंह के घर में हुआ था। इनकी शादी मात्र 12 वर्ष की उम्र में मेहरबान सिंह के साथ कर दी गई थी, जो कि नजदीकी गांव रैंणी के निवासी थे। हालांकि शादी के 10 साल के बाद मेहरबान सिंह की मौत हो गई और गौरा देवी को अपने बच्चों के लालन.पालन में काफी दिक्कतें आईं। फिर भी उन्होंने उनका अच्छे से पालन.पोषण किया और अपने बेटे चंद्र सिंह को स्वालंबी बनाया। उन दिनों भारत.तिब्बत व्यापार हुआ करता था, जिसके जरिये गौरा देवी अपनी आजीविका चलाती थीं।1962 के भारत.चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बंद हो गया तो चंद्र सिंह ठेकेदारी, ऊनी कारोबार और मजदूरी के जरिये परिवार का खर्च चलाने लगे। इसके बाद गौरा देवी गांव के लोगों के सुख.दुख में सहभागी होने लगीं। इस बीच अलकनंदा नदी में 1970 में प्रलयंकारी बाढ़ आई। इस बाढ़ के बाद यहां के लोगों में बाढ़ के कारण और इसके उपाय के प्रति जागरूकता बढ़ी।
भारत.चीन युद्ध के बाद भारत सरकार को चमोली की सुध आई और यहां पर सैनिकों के लिए सुगम मार्ग बनाने की योजना बनाई गई। इस योजना के तहत मार्ग में आने वाले पेड़ों की कटाई शुरू हो गई। इससे वहां के स्थानीय लोगों में इसे लेकर विरोध पनपने लगा। उन्होंने हर गांव में महिला मंगल दलों की स्थापना की। 1972 में गौरा देवी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया। इस दौरान ही वे चंडी प्रसाद भट्ट, गोविंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह के संपर्क में आईं। जनवरी 1974 में रैंणी गांव के 2451 पेड़ों को कटाई के लिए चिह्नित किया गया। 23 मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों के काटे जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन किया गया। जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया। स्थानीय प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तारीख 26 मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिए सभी को चमोली आना था। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिए ठेकेदारों को निर्देश जारी किया कि 26 मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और सामाजिक कायकर्ताओं को बातचीत के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जाएगा। इसलिए आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो।
जब उत्तराखंड के रैंणी गांव के जंगल के लगभग ढाई हज़ार पेड़ों को काटने की नीलामी हुई, तो गौरा देवी के नेतृत्व मे रैंणी गांव की महिला मंगल दल की 21 अन्य महिलाओं ने इस नीलामी का विरोध किया। इसके बावजूद सरकार और ठेकेदार के निर्णय में बदलाव नहीं आया। जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने पहुंचे, तो गौरा देवी और उनकी 21 साथियों ने उन लोगों को समझाने की कोशिश की। जब उन्होंने पेड़ काटने की जिद की तो महिलाओं ने पेड़ों से चिपक कर उन्हें ललकारा कि पहले हमें काटो फिर इन पेड़ों को भी काट लेना। अंततः ठेकेदार को जाना पड़ा। बाद में स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों के सामने इन महिलाओं ने अपनी बात रखी। फलस्वरूप रैंणी गांव का जंगल नहीं काटा गया। इस प्रकार यहीं से चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई।
दस साल बाद गौरा देवी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भाइयों ये जंगल हमारा मायका मां का घर जैसा है। यहां से हमें फल.फूल सब्जियां मिलती हैं। यदि यहां के पेड़.पौधे काटोगे तो निश्चित ही बाढ़ आएगी। गौरा देवी अपने जीवन काल में कभी स्कूल नहीं जा सकी थीं, लेकिन इन्हें प्राचीन वेद, पुराण, रामायण, भगवतगीता, महाभारत तथा ऋषि.मुनियों की सारी जानकारी थी। कभी देश दुनिया को पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ाने वाला गांव आज खुद प्राकृतिक आपदा का दंश झेल रहा है। आपदा के बाद से लोगों को लगता है कि कभी भी ग्लेशियर टूटकर उनके गांव की तरफ आ जाएगा। उन्होंने कहा कि यह सब प्रकृति से छेड़छाड़ और अंधाधुंध पेड़ कटाई का नतीजा है। पुरानी बातों को याद करते हुए दरबान ने कहा कि वह लगभग 15 साल के थे, जब चिपको आंदोलन का नेतृत्व कर रही गौरा देवी बीमार हो गई थी और उन्होंने ही कुर्सी के सहारे उन्हें अस्पताल पहुंचाया था। अगर वह आज जिंदा होतीं तो शायद पर्यावरण को संजोकर रखती और आज जो पहाड़ों को काटने का काम हो रहा है। उसे रोकने का काम करतीं। लिहाजा सरकार को भारत.चीन सीमा पर बसे रैणी गांव को हमेशा आबाद रखने के लिए जरूरी और जल्द से जल्द कोई ठोस कदम उठाना होगाण् 1986 में प्रथम वृक्ष मित्र पुरस्कार प्रदान किया गया। जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी द्वारा प्रदानकियागयाथा।गौरा देवी ने ही अपने अदम्य साहस और दूरदर्शिता से चिपको आन्दोलन का सूत्रपात किया था। हालांकि उन्हें परे कर अनेक लोगों ने इस आन्दोलन को हाईजैक कर अनेकों पुरस्कार बटोरे। लेकिन हमारी नजर में चिपको आन्दोलन की जननी गौरा देवी ही हैं। महान व्यक्तित्व यद्यपि आज गौरा देवी इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उत्तराखण्ड ही हर महिला में वह अपने विचारों से विद्यमान हैं। हिमपुत्री की वनों की रक्षा की ललकार ने यह साबित कर दिया कि संगठित होकर महिलायें किसी भी कार्य को करने में सक्षम हो सकती है। जिसका ज्वलंत उदाहरण है चिपको आन्दोलन को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त होना है। पर्यावरण के प्रति अतुलनीय प्रेम का प्रदर्शन करने के लिए गौरा देवी ने ऐतिहासिक काम किया था। पर्यावरण की रक्षा के लिये अपनी जान को भी उन्होंने ताक पर रख दिया था। गौरा देवी ने के इस काम ने उन्हें रैंणी गांव की गौरा देवी से श्चिपको वूमेन फ्राम इण्डियाश् बना दिया। ये साबित हो गया कि पहाड़ की महिलाएं संगठित होकर किसी भी कार्य को सफल बना सकती हैंण्पर्यावरण संरक्षण के लिए चिपको आंदोलन चलाने वाली गौरा देवी की ही प्रेरणा से आज हमारा पर्यावरण और वन संरक्षित है। हम प्रत्येक नागरिक एक पौधा लगाकर उसका संरक्षण करें तो यह चिपको आंदोलन के प्रणेता गौरा देवी को वास्तविक श्रद्धांजलि होगी। कोरोना काल में लॉकडाउन की अवधि एक बड़ा सबक देने वाली रही है। इस दौरान जलए वायु सभी तरह का प्रदूषण समाप्त हो गया था। इतने असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई को हिमालय झेल नहीं पाया और इन सबके परिणाम स्वरूप सन 1970 में ऐसी प्रलयंकारी बाढ आयी थी जैसी पिछले वर्ष 2013, 2021 में आयी ! यह महाविनाश प्राकृतिक नहीं था ! यह महाविनाश मानव निर्मित था ! समस्त असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई ने भूस्खलन व बाढ़ों का मार्ग प्रशस्त किया ! यहाँ के निवासियों आजीविका तो दूर जीना मुश्किल हो गया था उदाहरण है











