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*पहाड़ की नियति आज भी कंधों पर ‘जिंदगी’

11/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
आज इंसान अपने आविष्कार से धरती से लेकर अंतरिक्ष तक का सफर तय कर चुका है, लेकिन उत्तराखंड में आज भी मरीज और घायल कंधे पर अस्पताल पहुंच रहे हैं. उत्तराखंड राज्य को बने 26 साल होने जा रहे हैं. अगले साल राज्य अपना सिल्वर जुबली मनाएगा, लेकिन अभी भी पहाड़ के हालात ज्यादा कुछ नहीं बदले हैं. आज भी रहवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं. आए दिन कहीं न कहीं से ऐसी तस्वीरें सामने आ जाती है, जो सरकार और सिस्टम की पोल खोल जाती हैं.खासकर पहाड़ों में आज भी हालात ज्यादा नहीं बदले हैं. पहले भी मरीजों और घायलों के लिए डंडी कंडी का सहारा था, आज भी वही हालात हैं. सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं की कमी के चलते कई लोग असमय ही जान गंवा चुके हैं, लेकिन सरकार और उनके नुमाइंदे दावा करते हैं कि कोने-कोने तक तमाम मूलभूत सुविधाएं पहुंचा दी गई है, लेकिन उन दावों की पोल कंधों और पीठ लदे मरीजों की तस्वीरें खोल देती है. सूबे में सबसे ज्यादा कमी स्वास्थ्य और सड़क सुविधा की खलती है. पहाड़ों में अगर कोई बीमार या घायल हो जाए या फिर कोई गर्भवती महिला हो तो उसे अस्पताल पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है. पहले तो डंडी कंडी, डोली, कुर्सी का इंतजाम करना पड़ता है, फिर उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए युवाओं को इकट्ठा करना पड़ता है. कई गांवों में तो युवाओं के रोजगार या नौकरी की तलाश में बाहर जाने की वजह से मरीजों और घायलों को अस्पताल पहुंचाने में परेशानी होती है. उधर, सरकार दावा करती है कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में नए-नए मुकाम हासिल कर रही है. अस्पतालों में डॉक्टरों की और अन्य स्टाफ की कमी को समय-समय पर भरा जा रहा है. एयर एंबुलेंस से लोगों को अस्पताल पहुंचाने की बात भी कही जाती है, लेकिन सरकार और सिस्टम के इन दावों की पोल खोलती ही तस्वीरें आए दिन सामने आ जाती है. ऐसी ही कुछ तस्वीरें हाल ही के दिनों में देखने को मिले हैं. जो बताती हैं कि पहाड़ के लोगों का जीवन कितना मुश्किलों भरा है. ऐसा नहीं है कि सरकार और अधिकारियों को इन घटनाओं की जानकारी नहीं है. सरकार में बैठे अधिकारी भी इन तस्वीरों से वाकिफ हैं, लेकिन कहीं कुदरत की मार तो कहीं सरकारी विभागों की लापरवाही की वजह से उत्तराखंड के स्वास्थ्य महकमा सवालों के घेरे में आ जाता है.स्वास्थ्य सचिव कहते हैं उत्तराखंड के कई जगहों पर भूस्खलन की वजह से मरीजों को अस्पताल तक ले जाने के लिए ग्रामीण इस तरह के इंतजाम करते हैं, लेकिन सरकार ने इसके लिए भी कई तरह की व्यवस्थाएं की है. सरकार, स्वास्थ्य विभाग, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ की तरफ से ऐसी टीम बनाई हैं, जो बीमार और गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाते हैं. जब बारिश की वजह से सड़कें बंद हो जाती हैं, तब थोड़े हालात मुश्किल हो जाते हैं. जनपद में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं. भूस्खलन और मलबा आने से मोरी विकासखंड समेत कई इलाकों के संपर्क मार्ग बंद हो गए हैं. सड़कें बाधित होने से सबसे अधिक परेशानी बीमार, बुजुर्ग और गर्भवती महिलाओं को उठानी पड़ रही है. कई गांवों में मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डंडी-कंडी के सहारे कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है, जबकि कुछ स्थानों पर लोग जान जोखिम में डालकर उफनाते नालों और अस्थायी रास्तों से आवाजाही करने को मजबूर हैं.मोरी विकासखंड के रेक्चा गांव में बीते दिन सड़क बंद होने के कारण एक बीमार महिला को उपचार के लिए करीब पांच किलोमीटर तक डंडी-कंडी के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया. जानकारी के अनुसार गांव निवासी आनंद सिंह की अचानक तबीयत बिगड़ गई और वह बेहोश होकर गिर पड़ीं. परिजनों ने वाहन की व्यवस्था करने का प्रयास किया, लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह से सड़क बंद होने के कारण कोई वाहन गांव तक नहीं पहुंच सका. ऐसे में ग्रामीणों ने महिला को डंडी-कंडी पर बैठाकर करीब पांच किलोमीटर दूर बेंचा पुल तक पहुंचाया, जहां से हंस फाउंडेशन की एंबुलेंस के जरिए उन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मोरी ले जाया गया.  आपदा के बाद गांव के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है. कई मकानों के नीचे की जमीन धंस रही है, जबकि ऊपर से लगातार मलबा और पत्थर गिर रहे हैं. पेयजल लाइन, पानी की टंकी और कई भवन भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. बृहस्पतिवार को गांव की शुभनी देवी का पैर फ्रैक्चर होने पर उन्हें चार किलोमीटर तक क्षतिग्रस्त पगडंडी और उफनाते नालों के बीच से पैदल सड़क तक लाया गया. उन्होंने बताया कि लगातार हो रहे भू-धंसाव के कारण ग्रामीण पिछले पांच दिनों से रातभर सो नहीं पा रहे हैं.वहीं, सांकरी-ओसला मोटर मार्ग पर गियांगाड का जलस्तर बढ़ने से ग्रामीणों द्वारा बनाई गई अस्थायी पुलिया बह गई. इस दौरान ओसला निवासी खजान सिंह पुलिया के साथ बह गए. करीब 20 से 30 मीटर तक बहने के बाद उन्होंने पेड़ की टहनी पकड़कर किसी तरह अपनी जान बचाई, हालांकि वह गंभीर रूप से घायल हो गए. उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद पुरोला रेफर किया गया. स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिया बहने के बाद ओसला, गंगाड़, ढाटमीर और पवाणी समेत कई गांवों का संपर्क विकासखंड मुख्यालय से कट गया है. मजबूरी में लोग तेज बहाव वाले नाले पर गिरे पेड़ के सहारे आवाजाही कर रहे हैं. ग्रामीणों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई तो किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता हैउत्तराखंड ने भले ही इन सालों में 10 मुख्यमंत्रियों के चेहरे देख लिए हों, लेकिन आज भी पहाड़ों की तस्वीर नहीं बदल पाई है. आज भी ग्रामीण अंचलों में लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे हैं. आए दिन कहीं न कहीं से ऐसी तस्वीरें सामने आ जाती है, जो दावों की पोल खोलने के साथ ही कई सवालिया निशान छोड़ जाती है. जिनमें सबसे बेबसी और दर्द भरी तस्वीरें कंधों पर लदे मरीजों या घायलों की होती है. उत्तराखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं है. समय-समय पर खराब स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण मरीजों के साथ कोई न कोई अनहोनी की खबर सामने आती रहती है जो लोगों की नियति बन गया है.।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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