डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
होली भारत का एक विशिष्ट सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक त्यौहार है। अध्यात्म का अर्थ है मनुष्य का ईश्वर से संबंधित होना या स्वयं का स्वयं के साथ संबंधित होना है। इसलिए होली मानव का परमात्मा से एवं स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का पर्व है। होली रंगों का त्यौहार है। रंग सिर्फ प्रकृति और चित्रों में ही नहीं हमारी आंतरिक ऊर्जा में भी छिपे होते हैं, जिसे हम आभामंडल कहते हंै। एक तरह से यही आभामंडल विभिन्न रंगों का समवाय है, संगठन है। हमारे जीवन पर रंगों का गहरा प्रभाव होता है, हमारा चिन्तन भी रंगों के सहयोग से ही होता है। हमारी गति भी रंगों के सहयोग से ही होती है। हमारा आभामंडल, जो सर्वाधिक शक्तिशाली होता है, वह भी रंगों की ही अनुकृति है। पहले आदमी की पचहान चमड़ी और रंग-रूप से होती थी। आज वैज्ञानिक दृष्टि इतनी विकसित हो गई कि अब पहचान त्वचा से नहीं, आभामंडल से होती है। होली का अवसर अध्यात्म के लोगों के लिये ज्यादा उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसलिये अध्यात्म एवं योग केे विशेषज्ञ विभिन्न रंगों के ध्यान एवं साधना के प्रयोगों से आभामंडल को सशक्त बनाते हैं। इस तरह होली कोरा आमोद-प्रमोद का ही नहीं, अध्यात्म का भी अनूठा पर्व है।होली का त्यौहार एवं उससेे जुड़ी बसंत ऋतु दोनों ही पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। इस अवसर पर प्र्रकृति सारी खुशियां स्वयं में समेटकर दुलहन की तरह सजी-सवरी होती है। पुराने की विदाई होती है और नया आता है। पेड-पौधे भी इस ऋतु में नया परिधान धारण कर लेते हैं। बसंत का मतलब ही है नया। नया जोश, नई आशा, नया उल्लास और नयी प्रेरणा- यह बसंत का महत्वपूर्ण अवदान है और इसकी प्रस्तुति का बहाना है होली जैसा अनूठा एवं विलक्षण पर्व। मनुष्य भीतर से खुलता है वक्त का पारदर्शी टुकड़ा बनकर, सपने सजाता है और उनमें सचाई का रंग भरने का प्राणवान संकल्प करता है। इसलिय होली को वास्तविक रूप में मनाने के लिये माहौल भी चाहिए और मन भी। तभी हम मन की गंदी परतों को उतार कर न केवल बाहरी बल्कि भीतर परिवेश को मजबूत बना सकते हैं।होली सबसे आनंदमय त्यौहारों में से एक है, यही होली सभी के हृदय को उल्लास से भर देती है और गलियों को रंगों से सजा देती है। लेकिन इन रंगों की मस्ती और उल्लासपूर्ण उत्सवों के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा है, एक ऐसा संदेश जो हमारे जीवन को बदलने की शक्ति रखता है।होलाष्टक का काल भारतीय संस्कृति में केवल तिथियों का समूह नहीं है, बल्कि यह समय के उस सूक्ष्म अंतराल का प्रतीक है जहाँ प्रकृति, ग्रह-नक्षत्र और मानवीय चेतना एक विशिष्ट रूपांतरण से गुजरते हैं। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से शुरू होकर पूर्णिमा तक चलने वाले ये आठ दिन जिन्हें हम होलाष्टक कहते हैं, वर्ष 2026 में 24 फरवरी से आरंभ होकर 3 मार्च तक अपनी व्याप्ति बनाए रखेंगे। इस अवधि को सामान्यतः शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है, लेकिन यदि हम इसके आध्यात्मिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक धरातल को गहराई से देखें, तो यह वर्जना वास्तव में एक गहरी तैयारी और आंतरिक शुद्धि का निमंत्रण है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इन आठ दिनों में सौरमंडल के आठ प्रमुख ग्रह—चंद्रमा, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि और राहु—क्रमशः अपनी उग्र अवस्था में होते हैं। ग्रहों की यह उग्रता सीधे तौर पर मानव मस्तिष्क और उसकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। जब ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं इतनी अस्थिर और प्रखर हों, तो किसी भी नए जीवन-प्रसंग जैसे विवाह, गृह-प्रवेश या व्यापारिक प्रतिष्ठान की नींव रखना जोखिम भरा माना जाता है क्योंकि अस्थिर नींव पर खड़ा भवन दीर्घजीवी नहीं होता।अष्टमी तिथि को जब होलाष्टक का आरंभ होता है, तब चंद्रमा अपनी चंचलता के चरम पर होता है। चंद्रमा मन का कारक है, और इसकी उग्रता व्यक्ति के भीतर भावनाओं का ज्वार पैदा करती है। यही कारण है कि होली के शुरुआती दिनों में लोग अक्सर बिना किसी ठोस कारण के बेचैनी या मानसिक भारीपन महसूस करते हैं। जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, सूर्य, मंगल और शनि जैसे क्रूर ग्रहों का प्रभाव बढ़ता जाता है, जिससे अहंकार, क्रोध और आलस्य की प्रवृत्तियां उभरने लगती हैं। पौराणिक संदर्भों में इस काल को प्रह्लाद की यातनाओं से जोड़कर देखा गया है। राक्षसराज हिरण्यकशिपु ने अपने ही पुत्र को भक्ति मार्ग से विचलित करने के लिए इन आठ दिनों में जो क्रूरतम प्रयास किए, वे मानवीय सीमाओं की परीक्षा थे। कभी प्रह्लाद को ऊँचे पर्वत से नीचे फेंका गया, कभी विषधर सर्पों के बीच छोड़ा गया और कभी मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाने का प्रयास हुआ। यह कथा हमें यह सिखाती है कि जब बाहरी परिस्थितियां अत्यंत प्रतिकूल हों और चारों ओर नकारात्मक शक्तियों का घेरा हो, तब केवल आंतरिक विश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण ही रक्षा कवच का कार्य करता है। प्रह्लाद की वह भक्ति आज के संदर्भ में हमारे ‘आत्म-बल’ का प्रतीक है।वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होलाष्टक का समय ऋतु परिवर्तन का संधिकाल है। उत्तर भारत में शीत ऋतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म का आगमन पदचाप सुनाने लगता है। इस संक्रमण काल में वातावरण में नमी और तापमान का संतुलन बिगड़ता है, जिससे सूक्ष्म जीवाणु और वायरस अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। हमारे पूर्वजों ने इस समय को ‘अशौच’ या संयम का समय इसलिए घोषित किया ताकि लोग भीड़भाड़ वाले आयोजनों से बचें और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें। होली के दौरान होलिका रोपण की परंपरा भी इसी वैज्ञानिक बोध का हिस्सा है। गाँव के चौराहे पर लकड़ियाँ और सूखी टहनियाँ एकत्र करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि परिवेश की स्वच्छता का अभियान है। होलिका दहन के समय निकलने वाली अग्नि और उसमें डाली जाने वाली औषधियाँ जैसे कपूर, गूगल और लोबान वातावरण को विसंक्रमित करने का कार्य करती हैं। इस प्रकार, जो हमें धार्मिक निषेध दिखाई देता है, उसके मूल में जन-स्वास्थ्य की गहरी चिंता छिपी हुई है।आधुनिक जीवनशैली में जहाँ तनाव और ‘बर्नआउट’ एक महामारी का रूप ले चुके हैं, वहाँ होलाष्टक को एक ‘कॉस्मिक डिटॉक्स’ या ‘डिजिटल डिटॉक्स’ के रूप में अपनाया जाना चाहिए। आज के दौर में हम सूचनाओं के निरंतर बमबारी के बीच जी रहे हैं, जहाँ सोशल मीडिया और तकनीक ने हमारे एकांत को समाप्त कर दिया है। होलाष्टक के ये आठ दिन हमें ठहरने का संदेश देते हैं। चूँकि इन दिनों ग्रहों की स्थिति उग्र है, इसलिए बाहरी दुनिया में विस्तार करने के बजाय अपने भीतर सिमटना अधिक श्रेयस्कर है। यह समय आत्म-निरीक्षण का है कि पिछले एक वर्ष में हमने कितनी ईर्ष्या, कितना द्वेष और कितना अहंकार अपने भीतर पाल लिया है। जैसे होलिका दहन में सूखी लकड़ियाँ जलाई जाती हैं, वैसे ही इन आठ दिनों के संयम से हमें अपने भीतर की नकारात्मकता को भस्म करने की तैयारी करनी चाहिए। ध्यान और मौन इस काल के सबसे प्रभावी अस्त्र हैं। जब हम मौन रहते हैं, तो हमारी ऊर्जा बाहर नष्ट होने के बजाय भीतर की ओर प्रवाहित होने लगती है, जिससे हमारे तंत्रिका तंत्र को विश्राम मिलता है।ज्योतिष शास्त्र की सलाह है कि होली के दौरान विशेष रूप से मेष, वृश्चिक और सिंह जैसी उग्र स्वभाव वाली राशियों को अपनी वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। मंगल का प्रभाव व्यक्ति को अकारण विवादों में धकेल सकता है। यदि हम इस अवधि में महामृत्युंजय मंत्र का जाप या हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, तो वह केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि ध्वनियों का एक ऐसा विज्ञान है जो हमारे मस्तिष्क की तरंगों को शांत करता है। दान की परंपरा भी इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दान देने से ‘अहं’ का विसर्जन होता है। जब हम अपनी प्रिय वस्तु या धन किसी जरूरतमंद को देते हैं, तो हमारे भीतर का ‘मैं’ छोटा होता है और ब्रह्मांडीय करुणा का संचार होता है। होलाष्टक में काले तिल, वस्त्र और गुड़ का दान विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है क्योंकि ये चीजें शरीर में ऊर्जा के स्तर को बनाए रखने और शनि-मंगल जैसे ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में सहायक होती हैं।वर्ष 2026 का होलाष्टक विशेष इसलिए भी है क्योंकि यह एक ऐसे समय में आ रहा है जब दुनिया स्थिरता की तलाश में है। तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में मानवीय संवेदनाएं कहीं पीछे छूटती जा रही हैं। ऐसे में होली की यह आठ दिवसीय साधना हमें पुनः जड़ों से जोड़ने का कार्य करेगी। 4 मार्च को जब हम रंगों की होली खेलेंगे, तो वह केवल बाहरी रंग नहीं होंगे, बल्कि वे हमारे भीतर की प्रसन्नता और शुद्धता के रंग होंगे। एक शुद्ध मन ही उत्सव का सच्चा पात्र होता है। जिस प्रकार सोना आग में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार होलाष्टक की इस आठ दिनों की मर्यादित अग्नि में तपकर मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता है।, होलाष्टक को केवल ‘अशुभ’ मानकर डरने की आवश्यकता नहीं है। भारतीय मनीषा में कुछ भी पूर्णतः अशुभ नहीं होता; हर निषेध के पीछे एक सृजनात्मक उद्देश्य होता है। यह काल हमें सिखाता है कि उत्सव मनाने से पहले आत्म-शुद्धि अनिवार्य है। यदि पात्र गंदा हो तो उसमें अमृत भी विष बन जाता है। अतः, इन आठ दिनों को अपनी आदतों को सुधारने, स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने और अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को संचित करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। जब हम इस दृष्टिकोण से होलाष्टक को जिएंगे, तो 2026 की होली हमारे जीवन में न केवल रंग लेकर आएगी, बल्कि एक नई चेतना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करेगी। यह यात्रा उग्रता से शांति की ओर, विकार से शुद्धि की ओर और प्रह्लाद जैसी अडिग आस्था की ओर एक सफल प्रस्थान होगी। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- ये पांच तत्व हैं। शरीर इन्हीं पांच तत्वों से निर्मित है। इनके अलग-अलग स्थान निर्धारित हैं। माना गया है कि पैर के घुटने तक का स्थान पृथ्वी तत्व प्रधान है। घुटने से लेकर दृष्टि तक का स्थान जल तत्व प्रधान है। कटि से लेकर पेट तक का भाग अग्नि तत्व प्रधान है। वहां से हृदय तक का भाग आकाश तत्व प्रधान है। तत्वों के अपने रंग भी होते हैं। पृथ्वी तत्व का रंग पीला है। जल तत्व का रंग श्वेत है। अग्नितत्व का रंग लाल है। वायुतत्व का रंग हरा-नीला है। आकाशतत्व का रंग नीला है। ये रंग हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। पूरी रंग थेरेपी, क्रोमो थेरेपी रंगों के आधार पर ही काम करते हैं। होली पर इन पांच तत्व और उनसे जुड़े रंगों का ध्यान करने से हमारा न केवल शरीर बल्कि सम्पूर्ण वातावरण शुद्ध और सशक्त बन जाता है। रंगों से खेलने एवं रंगों के ध्यान के पीछे एक बड़ा दर्शन है, एक स्पष्ट कारण है। निराश, हताश और मुरझाएं जीवन में इससे एक नई ताजगी, एक नई रंगीनी एवं एक नई ऊर्जा आती है। रंग बाहर से ही नहीं, आदमी को भीतर से भी बहुत गहरे सराबोर कर देता है।होली के अवसर पर आध्यात्मिक रंगों से होली खेलने की प्रेक्षाध्यान की प्रक्रिया निश्चित ही सुखद एवं एक अलौकिक अनुभव है। रंगों का लोकजीवन में ही नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्व है। आओ सब मिलकर होली के इस आध्यात्मिक स्वरूप को समझें और इस पर्व के साथ जुड़ रही विसंगतियों को उखाड़ फेकें। प्राचीन काल में होली को नवान्नेष्टि पर्व कहा जाता था. यह नए अन्न का यज्ञ था. इस समय नया अनाज तैयार होता था और कच्चे अन्न की बालियों को भूनकर खाने से कफ और पित्त जैसे रोग शांत होते थे. चरक ऋषि ने इस भुने हुए अन्न को होलक कहा है, जिसे आज होला कहा जाता है. इस प्रकार होली केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, स्वास्थ्यवर्धक और सांस्कृतिक पर्व भी है. भारत ने इस पर्व की प्राचीनता और पवित्रता को आज भी जीवित रखा है.होली हमें सिखाती है कि बाहरी रंगों से पहले अंतरात्मा को रंगना जरूरी है. जब अहंकार जलता है और भक्ति जागती है, तभी जीवन में सच्चा उत्सव आता है. यही होली का वास्तविक संदेश है. सभी के जीवन में आनन्द और उल्लास का समावेश हो, सबको आयु, आरोग्य और ऐश्वर्य प्राप्त हो ,इसी कामना के साथ आप सबका शुभेच्छु !लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












