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युवाओं से वसूली नौकरी में कंजूसी किसका विकास?

26/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उम्मीदों के आसमान तले खड़ा भारत आज एक कड़वी हकीकत से जूझ रहा हैयुवा शक्ति होने के बावजूद युवा ही सबसे अधिक असुरक्षित और आक्रोशित है। आंखों में सपने, हाथों में डिग्रियां और मन में अटूट विश्वास लिए करोड़ों अभ्यर्थी सरकारी नौकरी को अपने भविष्य की अंतिम सीढ़ी मानते हैं। परंतु जब बेरोज़गारी भयावह रूप ले चुकी हो, तब यह सपना संघर्ष में बदल जाता है। ऐसे निर्णायक समय में, राज्यसभा सांसद ने भर्ती व्यवस्था की उस अनदेखी सच्चाई पर प्रहार किया है, जिस पर अब तक चुप्पी साधी गई थी। उनका सीधा प्रश्न है—जब एक पद के लिए लाखों आवेदन लेकर भारी परीक्षा शुल्क वसूला जाता है, तो असफल अभ्यर्थियों की फीस वापस क्यों नहीं की जाती? यह मुद्दा अब केवल पैसों का नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी और संवेदनशील शासन का प्रश्न बन गया है।यह प्रश्न किसी एक दिन की उपज नहीं, बल्कि वर्षों से भीतर ही भीतर धधक रहे युवाओं के आक्रोश की गूंज है। राघव चड्ढा ने उसी दबे दर्द को शब्द दिए हैं। आज देश में स्थिति ऐसी हो गई है कि कई सरकारी भर्तियों में कुछ ही पदों के लिए दस लाख से अधिक आवेदन आना भी सामान्य बात बन चुकी है। हर आवेदन के साथ 500 से 1500 रुपये तक शुल्क लिया जाता है, और जब इन आंकड़ों को जोड़ा जाता है तो एक भर्ती से सरकार को सैकड़ों करोड़ रुपये प्राप्त होते हैं, जबकि चयनित अभ्यर्थियों की संख्या नगण्य रहती है। बाकी लाखों युवा असफलता का भार लेकर लौटते हैं। वे केवल परीक्षा नहीं हारते, बल्कि अपना समय, धन और आत्मविश्वास भी गंवा बैठते हैं। ऐसे में यह संदेह स्वाभाविक है कि कहीं यह व्यवस्था युवाओं की विवशता को राजस्व के स्रोत में तो नहीं बदल रही।परीक्षा शुल्क का उद्देश्य आयोजन की लागत—प्रश्नपत्र निर्माण, केंद्र प्रबंधन, पर्यवेक्षक मानदेय और मूल्यांकन—को पूरा करना होना चाहिए। परंतु वास्तविकता में एकत्रित राशि अक्सर इन खर्चों से कहीं अधिक होती है। कई बार परीक्षाएं रद्द होती हैं, पेपर लीक होते हैं या परिणामों में अनावश्यक देरी होती है, फिर भी अभ्यर्थियों को कोई राहत नहीं मिलती। मध्यम और निम्न वर्ग के छात्र परिवार की सीमित आय से यह शुल्क चुकाते हैं, जबकि कोचिंग, पुस्तकें, आवास और यात्रा का अतिरिक्त बोझ अलग होता है। जब अंततः परिणाम निराशा देता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक पीड़ा बन जाती है।जब रोजगार के अवसर सीमित हों, तब संवेदनशील शासन की पहचान उसकी नीतियों से होती है। राज्यसभा सांसद का स्पष्ट मत है कि यदि सरकार पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध नहीं करा पा रही, तो कम से कम परीक्षा शुल्क को न्यूनतम रखा जाए या असफल अभ्यर्थियों को आंशिक रिफंड दिया जाए। उनका तर्क है कि प्रतियोगी परीक्षा सफलता की गारंटी नहीं देती, इसलिए शुल्क को रोजगार का प्रवेश-पत्र मानकर वसूलना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। यह विचार सीधे युवाओं की भावनाओं को अभिव्यक्ति देता है। आज लाखों अभ्यर्थी वर्षों तक तैयारी करते हैं, कई बार आयु सीमा भी पार कर जाते हैं और अंततः निराश होकर निजी या अस्थायी कार्य की ओर मुड़ते हैं। उनके लिए परीक्षा शुल्क महज रकम नहीं, बल्कि भविष्य में किया गया निवेश होता है।निस्संदेह, रिफंड व्यवस्था लागू करना सरल नहीं होगा। प्रशासनिक जटिलताएं, तकनीकी प्रबंधन और बजटीय प्रभाव जैसी चुनौतियां सामने आ सकती हैं। फिर भी समाधान संभव हैं। शुल्क को प्रतीकात्मक बनाया जा सकता है, एक पंजीकरण से कई परीक्षाओं में भागीदारी की सुविधा दी जा सकती है, या परीक्षा रद्द होने पर स्वतः रिफंड अनिवार्य किया जा सकता है। डिजिटल भुगतान और सत्यापन प्रणालियों के इस दौर में पारदर्शिता सुनिश्चित करना असंभव नहीं है। आवश्यकता केवल स्पष्ट नीति और ठोस इच्छाशक्ति की है, ताकि व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण बन सके।यह प्रश्न केवल धनराशि का नहीं, बल्कि युवाओं के मनोबल और सामाजिक संतुलन का भी है। वर्षों की तैयारी, परिवार की उम्मीदें और समाज की अपेक्षाएं मिलकर अभ्यर्थियों पर गहरा मानसिक दबाव बनाती हैं। असफलता के बाद अनेक युवा निराशा और अवसाद से जूझते हैं, कुछ चरम कदम भी उठा लेते हैं। जब व्यवस्था उन्हें केवल आंकड़ों में बदल देती है, तो स्वाभाविक रूप से भीतर असंतोष जन्म लेता है। ऐसे समय में यदि सरकार संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाए और शुल्क नीति में सुधार करे, तो यह भरोसा पुनर्स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। इससे युवाओं को महसूस होगा कि उनकी मेहनत और संघर्ष को समझा जा रहा है।राघव चड्ढा द्वारा उठाया गया यह प्रश्न दलगत राजनीति से आगे बढ़कर सामाजिक चेतावनी का रूप ले चुका है। यह व्यवस्था को संकेत देता है कि केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं, बल्कि ठोस और व्यावहारिक सुधार आवश्यक हैं। भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और पर्याप्त पद सृजन अनिवार्य हैं। यदि सरकार युवाओं से शुल्क लेती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और प्रभावी हो। अन्यथा यही शुल्क अनजाने में अप्रत्यक्ष कर जैसा प्रतीत होने लगता है, जिसका भार उसी संघर्षरत वर्ग पर पड़ता है जो पहले से ही सीमित संसाधनों में भविष्य गढ़ने का प्रयास कर रहा है।आज आवश्यकता है कि नीति-निर्माता इस उठती आवाज को केवल सुनें ही नहीं, उस पर ठोस निर्णय भी लें। बेरोज़गारी के इस दौर में युवाओं पर आर्थिक बोझ डालना अत्यंत संवेदनशील विषय है। यदि नौकरियां सीमित हैं, तो कम से कम अवसर की लागत अवश्य घटाई जानी चाहिए। परीक्षा शुल्क में सुधार, आंशिक रिफंड या नाममात्र शुल्क जैसी पहलें न केवल आर्थिक राहत देंगी, बल्कि व्यवस्था पर विश्वास भी मजबूत करेंगी। अंततः किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके युवा होते हैं। यदि उनके सपनों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव डाला जाएगा, तो विकास की गति प्रभावित होगी। इसलिए आवश्यक है कि भर्ती प्रणाली अधिक न्यायपूर्ण, पारदर्शी और मानवीय बने—ताकि हर युवा महसूस कर सके कि व्यवस्था उसके साथ है, उसके खिलाफ नहीं। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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