डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
मुनस्यारी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का श्रेय कोलकाता के सदानंद बाबू मजूमदार और न्यूजीलैंड की मार्केल क्लार्क को दिया जाता है। सदानंद बाबू वर्ष 1981 में यहां मुनस्यारी तक सड़क बनने के बाद नैनीताल शहर में होटल चलाने पहुंचे थे। उस समय हिमाच्छादित यह इलाका पर्यटन के तौर पर विकसित नहीं था। मुनस्यारी में जनजातीय लोग अधिक रहते हैं। सौ से अधिक उपजातियां यहां निवास करती हैं। सदानंद बाबू ने मुनस्यारी की अलौकिक सुंदरता से अभिभूत होकर इसके बारे में लोगों को बताया और इसका खूब प्रचार भी किया। इसका फल यह हुआ कि कोलकाता से निकलने वाली ‘भ्रमण’ नामक पत्रिका की टीम मुनस्यारी आई। इस पत्रिका के माध्यम से मुनस्यारी की खूबसूरती का इतना प्रचार किया गया कि इसके बाद बड़ी संख्या में बंगाली पर्यटक यहां का रुख करने लगे। 1985 के आसपास न्यूजीलैंड की महिला पर्यटक मार्केल क्लार्क मुनस्यारी आईं। उन्होंने हिमालय के सौंदर्य का प्रचार- प्रसार दुनिया भर में किया। क्लार्क और मजूमदार की इस पहल के बाद ही मुनस्यारी दुनिया के फलक पर छाया। उच्च हिमालय और उच्च मध्य हिमालय आकर्षक व दुर्लभ पशु-पक्षियों का वासस्थल है। मुनस्यार दो शब्दों ‘मुन’और ‘स्यार’ से मिलकर बना है। मुन का अर्थ है बर्फ (हिमकण जिसे स्थानीय भाषा में ‘मुण’ भी कहा जाता है) और स्यार का अर्थ है कीचड़। मतलब इस बर्फीले इलाके में बर्फ व कीचड़ के घालमेल की वजह से ही इस शब्द की उत्पत्ति हुई। जिस पर्वत पर यह इलाका बसा है, उसे खलिया पर्वत कहा जाता है। खलिया टाप क्षेत्र में रेड फाक्स, स्नो काक, स्टायर ट्रोपागान आदि अब झुंडों में नजर आने लगे हैं। खास बात यह है कि नर लाल लोमड़ी भी अब पर्यटकों और ट्रैकरों को दिखने लगे हैं। दरअसल मध्य हिमालय में खलिया ट्रैक सबसे सुगम और सड़क से जुड़ा क्षेत्र है। शीतकाल में खलिया से लेकर मुनस्यारी के आसपास के क्षेत्र में उच्च हिमालयी पशु-पक्षी पहुंच जाते हैं। खलिया टाप के जीरो प्वाइंट एरिया में इनका अधिकांश समय आवास रहता है। वर्ष 2012 से इस क्षेत्र में बर्ड वाचिंग व वन्यजीव तथा पक्षियों के संरक्षण का कार्य करने वाली मोनाल संस्था के सुरेंद्र पवार बताते हैं कि थल-मुनस्यारी मार्ग में पड़ने वाले गिनी बैंड से लेकर मुनस्यारी-मदकोट मार्ग में लगभग पचास किमी दायरे के जंगलों में पक्षियों का एक अद्भुत संसार बस चुका है। जो प्रकृति प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना है। खलिया टॉप मुनस्यारी की पर्यटन अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां आने वाले पर्यटकों से स्थानीय कारोबारियों, गाइडों और अन्य लोगों को रोजगार मिलता है. ऐसे में जरूरी है कि पर्यटन गतिविधियां नियमों के तहत संचालित हों, ताकि स्थानीय आजीविका भी सुरक्षित रहे और प्राकृतिक धरोहर को भी नुकसान न पहुंचे.सीमांत पिथौरागढ़ जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खलिया टॉप में पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था को लेकर अनियमितताओं का मामला सामने आया है. यहां निर्धारित नियमों के विपरीत टेंट लगाकर पर्यटकों को ठहराए जाने की शिकायतों के बीच वन विभाग ने निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया है.खलिया टॉप अपनी प्राकृतिक सुंदरता, बुग्यालों, हिमालय की मनोरम पर्वत श्रृंखलाओं और ट्रैकिंग मार्ग के लिए देश-विदेश के पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है. हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पहुंचते हैं. पर्यटन गतिविधियों में बढ़ोतरी से स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलते हैं, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.खलिया टॉप क्षेत्र में टेंट लगाकर पर्यटकों को ठहराने की व्यवस्था की जाती है. हालांकि, सिर्फ 12 टैंट लगाने की अनुमति दी जाती है. लेकिन निरीक्षण के दौरान 30 टैंट लगे हुए पाए गए. वन विभाग के औचक निरीक्षण के दौरान टेंट संचालन से जुड़ी व्यवस्थाओं की जांच भी की. ऐसे में अनुमति की शर्तों और वास्तविक स्थिति की जांच महत्वपूर्ण हो गई है. नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित संचालकों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी की जा रही है.विशेषज्ञों के मुताबिक, उच्च हिमालयी बुग्याल बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है. यहां अनियंत्रित पर्यटन, प्लास्टिक कचरा, खुले में छोड़ा गया अपशिष्ट और अनियोजित निर्माण प्राकृतिक वनस्पतियों और वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या, ठहरने की व्यवस्था और कचरा निस्तारण के लिए स्पष्ट नियमों का पालन जरूरी है. विशेषज्ञों के मुताबिक, उच्च हिमालयी बुग्याल बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है. यहां अनियंत्रित पर्यटन, प्लास्टिक कचरा, खुले में छोड़ा गया अपशिष्ट और अनियोजित निर्माण प्राकृतिक वनस्पतियों और वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचा सकते हैं. ऐसे क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या, ठहरने की व्यवस्था और कचरा निस्तारण के लिए स्पष्ट नियमों का पालन जरूरी है.खलिया टॉप मुनस्यारी की पर्यटन अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां आने वाले पर्यटकों से स्थानीय कारोबारियों, गाइडों और अन्य लोगों को रोजगार मिलता है. ऐसे में जरूरी है कि पर्यटन गतिविधियां नियमों के तहत संचालित हों, ताकि स्थानीय आजीविका भी सुरक्षित रहे और प्राकृतिक धरोहर को भी नुकसान न पहुंचे. खलिया टॉप ट्रेक हिमालय के छिपे हुए रत्नों में से एक है जो कहीं ज़्यादा पहचान का हकदार है। पॉपुलर ट्रेक के उलट, खलिया टॉप का रास्ता शांत और सुकून भरा रहता है, जो बिना भीड़ के पहाड़ों का मज़ा लेने का एक बहुत कम मिलने वाला मौका देता है। यह सफ़र अपने आप में बहुत मज़ेदार है—शांत जंगलों, खुले बुग्यालों और घुमावदार रास्तों से होकर गुज़रते हुए, जहाँ रास्ते में बर्फ़ से ढकी चोटियों, गहरी घाटियों और दूर के गाँवों की झलक मिलती है। वर्तमान में यहां सरकार द्वारा सुविधाजनक रिजॉर्ट, होटल का निर्माण कर पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है. अमूमन पहाड़ी गडरिये ही सच्चे हिमालय प्रेमी व प्रहरी होते हैं. हम आज की आभासी दुनिया से समय निकालकर भले अपनी हाजिरी लगाकर सेल्फी लिया करते हैं लेकिन पहाड़ी चरवाहों की तरह हिमालय प्रेमी व प्रहरी नहीं बन पाए हैं. हिमनगरी मुनस्यारी को प्रकृति ने खूबसूरत नेमतें दी हैं। वन विभाग के नियंत्रण वाले इस क्षेत्र में आजकल बुरांस के पेड़ फूलों से खिल जाते हैं। खास बात यह है कि यहां लाल के अलावा बैंगनी, सफेद और पीले रंग के फूल भी खिलते हैं। यहां पैदल ट्रैक से न केवल अपने बर्ड वाचिंग के शौक को पूरा कर सकते हैं बल्कि एकांत व कलरव को एक साथ महसूस भी कर सकते हैं। यहां पर बुग्याल होने के साथ हिमालय का दीदार करने के लिए बड़ी संख्या में सैलानी पहुंच रहे हैं, लेकिन यहां पर सरकार और पर्यटन विभाग की ओर से सुविधाएं मुहैया नहीं कराई गई हैं. जिससे पर्यटकों को मायूस होना पड़ रहा है. गौर हो कि एक दशक पहले कुमाऊं मंडल विकास निगम ने खलिया टॉप के पास एक पर्यटक आवास गृह बनाया था. लेकिन यहां पर बिजली, पानी, सड़क आदि कोई व्यवस्था नहीं की गई है. इस कारण पर्यटक यहां रुकना पसंद नहीं करते थे. हालांकि, बाद में केएमवीएन ने इसे पीपीपी मोड में सौंप दिया. इसके बावजूद भी यहां पर आज तक बिजली, इंटरनेट समेत अन्य कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है. सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने की बात तो करती है, लेकिन खलिया टॉप जैसे कई पर्यटक स्थल ऐसे हैं, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है. स्थानीय लोगों और पर्यटकों ने सरकार से सुविधा मुहैया कर पर्यटन को बढ़ावा देने की मांग की है. एक बहुत पुरानी कहावत प्रचलित है-आधा संसार, एक मुनस्यार यानी हिमालय की तलहटी में बसे और बेपनाह खूबसूरती को समेटे मुनस्यारी की तुलना आधे संसार से कर देने का मतलब है इस क्षेत्र को कुदरत ने जन्नत की तरह सजाया है। सामने पंचाचुली यानी हिमालय की पांच विहंगम चोटियों के दर्शन होते हैं तो जैसे पर्यटकों की मुंहमांगी मुरादें पूरी हो जाती हैं। सुबह-शाम अलौकिक छटा बिखेरने की वजह से इस क्षेत्र को हिमनगरी भी कहा जाता है। बर्फ से ढकी चोटियां सिर्फ यहां की शान ही नहीं, जीवन भी हैं खलिया बुग्याल पर्यावरण और जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां बुरांश और भोजपत्र जैसी वनस्पतियों के साथ राज्य पक्षी मोनाल सहित कई तरह के वन्यजीव और पक्षी पाए जाते हैं। प्राकृतिक सुंदरता के कारण यह क्षेत्र पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। स्थानीय लोगों का कहना है कि टेंट लगाने के लिए जमीन खोदने और अन्य गतिविधियों से बुग्याल के प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंच रहा है। यदि ऐसी गतिविधियों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसका असर स्थानीय पर्यावरण पर पड़ सकता है।मल्ला जोहार विकास समिति के अध्यक्ष ने खलिया बुग्याल में हो रही गतिविधियों पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां से मुनस्यारी नगर और पर्यटकों के लिए पेयजल उपलब्ध कराने वाली योजना जुड़ी हुई है। उनका कहना है कि बुग्याल में अनियंत्रित कैंपिंग और जमीन की खुदाई से जल स्रोतों के दूषित होने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।वन विभाग की ओर से अवैध टेंट लगाने वाले ऑपरेटरों के खिलाफ कार्रवाई के बाद अब जुर्माना तय किया जाएगा। विभाग का कहना है कि नियमों का उल्लंघन करने वालों को निर्धारित राशि जमा करनी होगी। ऐसा नहीं करने पर आगे की कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाएगी। इस घटना ने एक बार फिर पर्यटन गतिविधियों के संचालन में नियमों के पालन और संवेदनशील प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण की जरूरत को सामने रखा है। विश्व प्रसिद्ध खलिया बुग्याल में बगैर अनुमति अवैध तरीके से टैंट लगाने का मामला सामने आया है। टूर ऑपरेटरों ने वन विभाग की आंखों में धूल झोंककर बुग्याल में बगैर अनुमति के 18 टैंट लगा दिए और उनमें मोटी रकम लेकर पर्यटकों को ठहरा दिया। मामले की भनक लगी तो वन विभाग ने सात टूर ऑपरेटरों का चालान कर अवैध टैंट हटाए। अब वन विभाग संबंधित टूर ऑपरेटरों से वसूली करेगा। यदि ऑपरेटरों ने जुर्माना नहीं भरा तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी।मुनस्यारी में प्रसिद्ध हरा-भरा खलिया बुग्याल जैव विविधता का मजबूत स्तंभ है। इस बुग्याल में दुर्लभ बुरांश, भोजपत्र के पेड़ों के साथ ही राज्य पक्षी मोनाल, हिरन सहित विभिन्न दुर्लभ पशु-पक्षियों की मौजूदगी है। यही कारण है कि यह बुग्याल पर्यटकों की पहली पसंद है। खलिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सिर्फ 12 टैंट लगाए जा सकते हैं जिनमें पर्यटक रात्रि में ठहर सकते हैं। इसके अलावा यहां पक्का निर्माण प्रतिबंधित है। टैंट लगाने वालों को वन विभाग से अनुमति लेकर शुल्क जमा करना अनिवार्य है। खलिया बुग्याल में कई टूर ऑपरेटरों ने बगैर अनुमति के लिए 18 टैंट लगा डाले और उनमें पर्यटकों को ठहराकर मोटा मुनाफा कमाते रहे। वन विभाग को इसकी भनक लगी तो टीम खलिया पहुंची तो टूर ऑपरेटरों का यह कारनामा सार्वजनिक हुआ। ऐसे में वन विभाग ने अवैध तरीके से टैंट लगाने वाले सात टूर ऑपरेटरों का चालान करते हुए अवैध टैंट हटाए हैं। वन विभाग जुर्माने का आंकलन कर रहा है। टूट ऑपरेटरों को जुर्माना भरना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। खलिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सिर्फ 12 टैंट लगाए जा सकते हैं जिनमें पर्यटक रात्रि में ठहर सकते हैं। इसके अलावा यहां पक्का निर्माण प्रतिबंधित है। टैंट लगाने वालों को वन विभाग से अनुमति लेकर शुल्क जमा करना अनिवार्य है। खलिया बुग्याल में कई टूर ऑपरेटरों ने बगैर अनुमति के लिए 18 टैंट लगा डाले और उनमें पर्यटकों को ठहराकर मोटा मुनाफा कमाते रहे। वन विभाग को इसकी भनक लगी तो टीम खलिया पहुंची तो टूर ऑपरेटरों का यह कारनामा सार्वजनिक हुआ लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














