डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के पहाड़ों में पैदा होने वाली कीवी अब देश की राजधानी दिल्ली के बाजारों में अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ रही है. चमोली की बागवानी को बड़े बाजार से जोड़ने की दिशा में पहली बार जनपद से 200 कुंतल कीवी की खेप दिल्ली की आजादपुर मंडी के लिए रवाना की गई. अब तक स्थानीय बाजारों पर निर्भर रहने वाले काश्तकारों को अपनी उपज देश की प्रमुख फल-सब्जी मंडियों में पहुंचाने का अवसर मिलेगा. इससे किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने और उनकी आय बढ़ाने की उम्मीद जगी है.मुख्यमंत्री के नेतृत्व में प्रदेश में उद्यानिकी और फल उत्पादन को बढ़ावा देने के प्रयासों के बीच चमोली से कीवी की खेप दिल्ली भेजे जाने को महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है. मुख्य विकास अधिकारी ने विकास भवन परिसर से हरी झंडी दिखाकर कीवी से लदे वाहनों को रवाना किया. इस पहल के जरिए जिले की कीवी को बड़े बाजार तक पहुंचाने के साथ ही किसानों के लिए विपणन के नए रास्ते खोलने का प्रयास किया जा रहा है. चमोली जनपद में कीवी उत्पादन किसानों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभर रहा है. मिशन कीवी के तहत जिले में करीब 800 काश्तकार लगभग 62 हेक्टेयर भूमि पर कीवी की खेती कर रहे हैं. इस वर्ष जनपद में 500 कुंतल से अधिक कीवी का उत्पादन हुआ है. अब तक उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा था, लेकिन किसानों की उपज को उचित बाजार तक पहुंचाना भी एक बड़ी चुनौती रही है. ऐसे में पहली बार 200 कुंतल कीवी दिल्ली की आजादपुर मंडी भेजे जाने से विपणन व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है. दिल्ली की मंडी तक पहुंच बनने से किसानों को अपनी उपज के लिए नए खरीदार तलाशने और बड़े बाजार में कारोबार की संभावनाएं समझने का अवसर मिलेगा. किसानों को वास्तविक लाभ कितना मिलेगा, यह मंडी में मिलने वाले भाव, परिवहन खर्च और अन्य विपणन लागत पर निर्भर करेगा. मुख्य विकास अधिकारी ने बताया किसानों को कीवी उत्पादन के लिए उद्यान विभाग के माध्यम से तकनीकी सहयोग और पैकेजिंग सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है. किसानों की विपणन संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं. उद्देश्य यह है कि पहाड़ों में पैदा होने वाले फलों को बेहतर तरीके से बाजार तक पहुंचाया जा सके. किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए सीमित विकल्पों पर निर्भर न रहना पड़े. जनपद में कीवी उत्पादन की संभावनाओं को देखते हुए वर्ष 2026-27 में 60 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में इसकी खेती का विस्तार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इसके तहत करीब 400 नए किसानों को कीवी उत्पादन से जोड़ने की योजना है.इसके लिए हावर्डस, एलिसन, मॉन्टी, ब्रूनो, एबॉट और लिमोन एलिना सहित कीवी की विभिन्न प्रजातियों को प्रोत्साहित किया जाएगा. कीवी का पहली बार दिल्ली की आजादपुर मंडी पहुंचना जिले के बागवानों के लिए एक नई शुरुआत है. पहाड़ी क्षेत्रों में फल उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं, लेकिन बाजार तक पहुंच, पैकेजिंग और परिवहन जैसी चुनौतियां किसानों के सामने बनी रहती हैं. ऐसे में यदि विपणन की यह व्यवस्था नियमित रूप से आगे बढ़ती है, तो स्थानीय उत्पादकों को अपनी उपज बेचने के लिए नए विकल्प मिल सकते हैं. हिमाचल और उत्तराखंड दोनों ही पहाड़ी राज्य हैं. दोनों का क्लाइमेट भी एक ऐसा जैसा ही है. इसलिए उन्होंने हिमाचल से प्रेरणा लेकर अपने खेत में कीवी की बागवानी करना शुरू किया. इस बार उनकी 2 क्विंटल कीवी की पैदावार हुई है. कीवी की बागवानी में फल का साइज बड़ा महत्व रखता है. कीवी का साइज 90 से 100 ग्राम को होना चाहिये जिससे बाजार में किसानों कीवी के अच्छे दाम मिलते हैं. उनकी एक कीवी का वजन 85 से 100 तक का है. वे 30 रुपये एक फल के हिसाब से कीवी को बाजार में बेच रहे हैं. 80 ग्राम से कम वजन वाली कीवी को वे 20 से 25 रुपये तक की कीमत में बेचते हैं. बताया कि पर्वतीय क्षेत्रों में काश्तकार काफी मात्रा में कीवी की खेती कर रहे हैं. लेकिन इसके लिए किसानों को इसकी बागवानी के बारे में जानकारी होना जरूरी होती है. इसके पेड़ों की विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है. समय-समय पर इसकी कटाई छटाई होना जरूरी है. इसके बाद ही पेड़ अच्छे फल देता है. कीवी की बागवानी मुनाफे का सौदा है. इसे जंगली जानवर भी नुकसान नही पहुंचते हैं. केवल जब फल पक जाते हैं, उस समय पक्षियां इसके फलों को नुकसान पहुंचाते हैं. इसके लिए बगीचे जाल की मदद से फलों को बचाया जा सकता है. कीवी मानव की रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करने के साथ ही ब्लड प्रेशर, कब्ज, आंख संबंधी रोगों में लाभकारी बताया गया है. इसके साथ ही यह त्वचा को सुंदर बनाने और वजन को सामान्य करने में भी मददगार होता है. डेंगू, मलेरिया जैसे रोगों में चिकित्सकों की ओर से कीवी के फल के सेवन की सलाह दी जाती है. वहीं, हाल ही में युवा हुए उत्तराखंड में इन व्यवस्थाओं को बनने में समय लगेगा. ऐसे में कीवी के क्षेत्र में संभावनाओं को तलाशना होगा. कीवी उत्पादन और सेब उत्पादन की तुलना की जाए तो उत्तराखंड में कीवी, सेब उत्पादन को पीछे छोड़ता नजर आ रहा है. इसके सबसे बड़ी वजह उत्पादन में आने वाली समस्याएं हैं. सेब उत्पादन में जहां एक तरफ जंगली जानवरों का खतरा और देखरेख में अत्यधिक ध्यान देने की जरूरत पड़ती है तो वहीं दूसरी तरफ मौसम का अनुकूल रहना भी जरूरी होता है.जबकि, कीवी फल उत्पादन में यह सारी समस्याएं आड़े नहीं आती हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि कीवी फल को बंदर नहीं खाते हैं. कीवी फल के देखरेख में इतनी सारी समस्याएं नहीं है. दूसरी तरफ मौसम के हिसाब से कीवी खुद को ढाल लेता है. कीवी के लिए वेदर डिस्टरबेंस भी चुनौती नहीं है. इससे साफ है कि कीवी की खेती मुनाफे की साबित हो सकती है. ऐसे में स्थानीय लोगों को तो रोजगार मिलेगा ही साथ ही इसके उत्पादन से आमदनी भी बढ़ेगी. प्रशासन की मानें तो जल्द ही धरातल पर इसके परिणाम देखने को मिलेंगे.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.














