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तीन साल तक थमा रहा लामबगड़ में भूस्खलन, अब फिर हुआ शुरू

25/07/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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https://uttarakhandsamachar.com/wp-content/uploads/2025/11/Video-60-sec-UKRajat-jayanti.mp4

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में वर्षाकाल के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की डरावनी तस्वीर है। कब कहां अतिवृष्टि से जमीन दरक जाए, कहा नहीं जा सकता। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं। एक जनवरी, 2015 से अब तक के परिदृश्य को देखें तो राज्य में 4662 स्थानों पर भूस्खलन से बड़े पैमाने पर क्षति हुई है।पौड़ी जिले में भूस्खलन की सर्वाधिक 2040 घटनाएं हुईं, जबकि नैनीताल (सात) में सबसे कम। राज्यभर में अब तक भूस्खलन की चपेट में आकर 319 व्यक्तियों की जान जा चुकी है, जबकि 192 लोग घायल हुए और 19 लापता हैं। घरों, गोशालाओं, मवेशियों, कृषि भूमि, सड़कों समेत अन्य परिसंपत्तियों को भी नुकसान पहुंचा है। उत्तराखंड में हर साल औसतन 1529 मिलीमीटर वर्षा होती है, इसमें 1121 मिलीमीटर का योगदान अकेले वर्षाकाल के चार महीनों का है। यही नहीं, बीते कुछ वर्षों से वर्षा के पैटर्न में भी बदलाव दिख रहा है। पूर्व में सप्ताहभर तक चलने वाली झड़ी अब बेहद कम हो गई हैं। स्थिति यह है कि कुछ जगह अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कुछ में बेहद कम। अतिवृष्टि व बादल फटने से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ी हैं। इन्हीं में अधिक क्षति हो रही है।राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों पर जिलेवार नजर दौड़ाएं तो भूस्खलन की दृष्टि से पौड़ी जिला अधिक संवेदनशील है, जहां साढ़े 10 वर्ष में 2040 स्थानों पर भूस्खलन हुआ। दूसरे स्थान पर पिथौरागढ़ है, जहां 1426 घटनाएं हुई हैं। अलबत्ता, नैनीताल जिला ऐसा है, जहां इस अवधि में भूस्खलन की सात घटनाएं हुई हैं। बदरीनाथ हाईवे पर भूस्खलन क्षेत्र लामबगड़ में तीन साल बाद फिर से भूस्खलन सक्रिय हो गया है। यहां चट्टान से बोल्डर छिटककर हाईवे पर गिर रहे हैं। हिल साइड निर्मित दीवार भी कई जगहों पर ध्वस्त हो गई है। अब सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने फिर से भूस्खलन क्षेत्र का ट्रीटमेंट शुरू कर दिया है। भूस्खलन वाली चट्टान के शीर्ष भाग पर दो पोकलेन मशीन भेजी गई हैं जो बोल्डर और लबे को हटाने में जुट गई हैं।लामबगड़ में बार-बार भूस्खलन होने से कई बार बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा बाधित रही। इसके अलावा चीन सीमा क्षेत्र में सेना की आवाजाही भी बाधित हुई जिसे देखते हुए वर्ष 2015 में इसका ट्रीटमेंट शुरू हुआ। अलकनंदा किनारे से करीब 120 मीटर लंबी नई सड़क का निर्माण किया गया जबकि भूस्खलन वाली चट्टान के बाहर से दीवार निर्माण किया गया है। तीन वर्षों तक यहां वाहनों की आवाजाही सुगमता से हुई लेकिन अब फिर से यहां भूस्खलन सक्रिय हो गया है। अब बीआरओ ने फिर से भूस्खलन क्षेत्र का ट्रीटमेंट शुरू कर दिया है। बीआरओ के कमांडर कर्नल ने बताया कि लामबगड़ भूस्खलन क्षेत्र का स्थायी उपचार कर दिया गया था। हाईवे चौड़ा होने के कारण वाहनों की आवाजाही तो नहीं रुक रही है लेकिन अब बोल्डर छिटककर हाईवे पर गिर रहे हैं। इसका ट्रीटमेंट किया जा रहा है। लामबगड़ में बार-बार भूस्खलन होने से कई बार बदरीनाथ धाम की तीर्थयात्रा बाधित रही। इसके अलावा चीन सीमा क्षेत्र में सेना की आवाजाही भी बाधित हुई जिसे देखते हुए वर्ष 2015 में इसका ट्रीटमेंट शुरू हुआ। ।। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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