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उत्तराखंड के संरक्षित क्षेत्रों से हटेगा लैंटाना

26/06/21
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला :

लैंटाना कैमरा कुरी, लैटेना एक फूलों की प्रजाति का पौधा है. लैंटाना उष्णकटिबंधीय इलाके का अमेरिकी पौधा है. इसे भारत में सजावटी तौर के रूप में लाया गया था, लेकिन यह पौधा सजावटी गमलों से निकलकर अब खेतों और जंगलों तक पहुंच गया है. यह अपने मूल मध्य और दक्षिण अमेरिका से करीब 50 देशों में फैल गया है. यह बेहद तेजी से फैलने वाला खरपतवार है, जो जैव विविधता को प्रभावित कर रहा है. अपनी विषाक्तता के कारण कृषि क्षेत्रों पर इसका असर सीधा देखा जा सकता है।

इसकी पत्ती को पशु भी नहीं खाते हैं. जबकि, घनी झाड़ियों के चलते जंगली जानवरों के लिए छिपने के लिए दीवार की भांति काम करता है. इस पौधे को अंगे्रज यहां बंगले और कोठियों को सजाने के लिए विदेश से लेकर आए थे। आजादी के बाद अंग्रेज तो देश को छोड़कर चले गए, लेकिन फसलों की मुसीबत यहीं रह गई। इसलिए इसे इंग्लिश मैन्स फॉली भी कहते हैं। रिसर्च में खुलासा हुआ कि इस पौधे की पत्तियों से अलीलो कैमिक्स नाम से जहरीला पदार्थ निकलता है। जो उपजाऊ जमीन को बंजर कर रहा है। यह पदार्थ इतना जहरीला होता है कि अपने आसपास उगने वाली घास को भी सड़ाकर नष्ट कर देता है।

वहीं इसके पत्ते कांटेदार होते हैं। इस कारण इन्हें मवेशी भी नहीं खाते हैं। विदेशों में तापमान काफी कम रहता है। इसलिए यह पौधा तेजी से विकास नहीं करता है। वहीं भारत में इसे 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान होने के कारण यह काफी तेजी से पनप जाता है। इस पौधे खाद, पानी आदि की कोई जरुरत नहीं होती है।रिसर्च में पता चला है कि लैंटाना की पत्तियों से जहर निकलता है। जो जमीन को बंजर कर रहा है। समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो यह धीरे-धीरे सभी फसलों को तबाह कर देगा। उत्तराखंड में पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो रही कुर्री (लैंटाना कमारा) की झाडि़यों से अब छुटकारा मिलने की उम्मीद जगी है।

चालू वित्तीय वर्ष में मिशन मोड में संचालित होने वाले लैंटाना उन्मूलन अभियान के तहत सूबे के जंगलों और गांवों के इर्द-गिर्द 11882.78 हेक्टेयर क्षेत्र से लैंटाना हटाकर इसकी जगह चारागाह डेपलप किए जाएंगे। इनके माध्यम से पांच हजार से अधिक लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे। वन विभाग के मुखिया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) ने इस संबंध में सभी प्रभागीय वनाधिकारियों और संरक्षित क्षेत्र के निदेशकों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। लैंटाना के फैलने से पेड़-पौधे अपना अस्तित्व खो रहे हैं. इतना ही नहीं लैंटाना से उपजाऊ भूमि भी बंजर होती जा रही है. आलम तो अब ये हो गया है कि लैंटाना धीरे-धीरे हिमालय की ओर बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है. वैसे तो सरकार कई सालों से लैंटाना उन्मूलन को लेकर पहल करने की बात करती आ रही हैं, लेकिन धरातल पर मामला सिफर है.

अब सूबे के मुखिया ने एक बार फिर से लैंटाना को हटाने के निर्देश दिए हैं. लैंटाना/कुरी जैसी प्रजाति को वन क्षेत्र से हटाने के साथ ही स्थानीय प्रजाति के घास/बांस और फलदार पौधों का मिशन मोड़ के तहत रोपण कर जंगलों की गुणवत्ता बढ़ाने को कहा है. साथ ही वन्यजीवों की आवश्यकतानुसार वासस्थल विकसित करने के निर्देश दिए हैं. लैंटाना के तने से क्राफ्ट, फर्नीचर और पत्तियों से खाद और कीटनाशक दवाएं लेंटाना क्राफ्ट, बायो कम्पोस्ट, (खाद) बायो पेस्टीसाइड तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है तैयार कर अपनी आय सृजन का जरिया है. इससे लैंटाना भी खत्म होगा और आय भी बढ़ेगी.  

लैंटाना (लैंटाना कमारा) के निरंतर हो रहे फैलाव ने चिंता व चुनौती दोनों बढ़ा दी हैं। आलम ये है कि पारिस्थितिकीय तंत्र के लिए खतरनाक साबित हो रही लैंटाना की झाड़ियों ने उच्च हिमालयी क्षेत्र में भी दस्तक दे दी है। सरकारी आंकड़े इसकी तस्दीक कर रहे हैं। इनके मुताबिक नंदादेवी व गंगोत्री नेशनल पार्क, केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग, गोविंद वन्यजीव अभयारण्य जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र के संरक्षित इलाकों में यह प्रजाति पहुंच चुकी है। दरअसल, लैंटाना अपने आसपास दूसरी वनस्पतियों को पनपने नहीं देती और वर्षभर खिलते रहने के कारण इसका निरंतर फैलाव हो रहा है। 

घास के लिए कॉर्बेट में छह, राजाजी में तीन, रामनगर में एक नर्सरी तैयार हो रही है। लैंटाना उन्मूलन की थर्ड पॉटी मॉनीटरिंग भी होगी। लैंटाना हटाने को ‘कट रूट तकनीक’ अपनाई जाएगी। इसमें लैंटाना की झाड़ियों को जड़ से काटकर उल्टा रखा जाता जाता है। प्रदेशवासियों, कृषकों, बागबानों और समाजसेवी संस्थाओं को चाहिए कि लैंटाना झाडि़यों को जड़ से समाप्त करने के लिए प्रदेश व्यापी अभियान चलाएं। वन विभाग व सरकार स्थानीय जनता को साथ लेकर इस समस्या के समाधान के लिए कठोर कदम उठाएं, ताकि वनों का अस्तित्व बरकरार रह सके।सरकार व वन विभाग इस बीमारी से निपटने के लिए अपने स्तर पर भले की प्रयासरत हों, लेकिन निकट भविष्य में प्रदेश को इस लैंटाना घास से मुक्ति नहीं मिलने वाली है।

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