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लता काचनार के पत्ते हो सकते है थर्माकोल का विकल्प

25/09/19
in उत्तराखंड, संस्कृति
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डा. हरीश चंद्र अंडोला
मालू लता काचनार उत्तराखण्ड के अलावा पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, सिक्किम आदि में भी उपलब्ध होता है। मालू का वैज्ञानिक नाम बाहुनिया वाहली है। मालू सदाबहार पौधा है। मालू में महत्वपूर्ण रासायनिक अवयव उपलब्ध होते है, जिनमें Betulinic acid, Flavonoids, Triterpene, Gallic Acid है। इसमें लिपिड 23.26, प्रोटीन 24.59 और फाइबर 6.21 प्रतिशत तक होते है। एनजीटी की ओर से थर्माकोल पर प्रतिबंध के बाद मालू के पत्ते नए रोजगार की संभावनाएं दे सकते हैं। उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से शादी.ब्याह में मालू के पत्तों का उपयोग होता रहा है। वैज्ञानिकों व चिकित्सकों का कहना है कि पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिहाज से जहां थर्माकोल हानिकारक है, वहीं मालू के पत्ते, फूल व छाल औषधीय गुणों से भरपूर हैं। मालू को हिंदी में लता काचनार कहा जाता है। इसके पत्तों से पत्तल, पूड़े व पूजा की सामग्री बनाई जाती है। साथ ही चारा पत्ती के रूप में भी उपयोग की जाती है। मालू का फूल भौंरों के शहद बनाने में सहायक होने के साथ ही औषधीय उपयोग में भी लाया जाता है। छाल से चटाई व सूखी लकड़ी ईंधन के रूप में काम आती है। छप्पर की छत बनाने में भी पत्तों का उपयोग किया जाता है।
मालू के पौधे जल स्रोत व मृदा संरक्षण का काम करता है। मालू के पौधा पारिस्थितिकीय संतुलन के साथ ही जल स्रोत व मृदा संरक्षण में अहम होता है। औषधीय गुणों से भरपूर बीमारी खांसीए जुकाम व पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने के लिए भी मालू के पत्तों का उपयोग किया जाता है। उपयोग के बाद भी लाभकारी मालू उपयोग के बाद भी लाभकारी होता है। शादी-ब्याह में पत्तल, पूडों के उपयोग के बाद इनसे खाद बनाई जाती है। जबकि थर्माकॉल को नष्ट नहीं किया जा सकता है।यदि इन वनस्पतियो की तरफ सरकार का ध्यान जाए तो काफी अधिक मात्रा में पलायन को रोका जा सकता है। साथ पहाड़ो में बिखरी हुई खेती है जिस कारण से बड़े स्तर पर बागवानी या इस तरह का रोजगार करना मुश्किल हो जाता है।
प्राकृतिक रूप से मिले पानी, भोजन, वनस्पति का ही भोग किया करते थे और जिसे आज हम विकास समझ रहे है वो विकास नहीं बल्कि विनाश है, ऐसे विकास से कोसो दूर थे वो लोग। आज के समय मे भोजन मॉर्डन हो चुका है, प्रदूषण भरा जीवन हो गया खेती में रासायनिक खादों का उपयोग इन्ही कारणों से हमारे हाथों से जीवन रेखा भी धीरे धीरे धुंधली होती जा रही है। लगभग डेढ़ दो दशक से पहले शादी ब्याह देखे होंगे और यहाँ पूजा पाठ से लेकर खाना परोसने के पत्तल तक देखे होंगे तो यह सब मालू के पत्तो से ही तैयार किये जाते थे। पहाड़ो में मालू और तिमला के पत्तो का ही प्रयोग किया जाता था पत्तल और डोने के लिए जब मालू के पत्तल मार्किट में तलाशे तो उन्हें नही मिले जबकि इसके विपरीत प्लास्टिक या थर्माकोल के हर जगह उपलब्ध थे। काफी तलाशने के बाद उन्हें केले के तने की छाल से निर्मित दोने पत्तल मिले। और अब वो होटल में इन्ही का उपयोग करते हैए यदि उनको मालू के पत्तल मिल जाते तो क्या वो उसका उपयोग नही करते किन्तु सभी आधुनिकता की ओर दौड़ में शामिल है। यही पत्तल आदि उपयोग के बाद खाद का काम भी कर सकते है। मालू का पौधा जल तथा मृदा संरक्षण के लिए लाभकारी है।
इन पत्तलों में खाना खाने का एक अलग ही आनंद हुआ करता था। कई जगहों पर तो किसी शादी ब्याह से पहले से पत्तल दौनो का निर्माण कार्य शुरु हो जाता था लेकिन अब तो सबकुछ शॉटकट होता जा रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी जहा हम लोग इसके महत्व को भूलते जा रहे है वही दूसरी ओर पश्चिमी देशों में लोग स्वास्थ्य को लेकर जागरूक हो रहे है और वो लोग इसका प्रयोग पत्तल आदि के रूप में कर रहे है। जर्मनी में इससे बनी पत्तल को नेचुरल लीफ प्लेट के नाम से जाना जाता है और युवाओं में खूब रुचि देखने को मिल रही है। जहां हमने अपने इस पारम्परिक व्यवसाय को खत्म कर दिया वही जर्मनी में इसे लेकर एक बड़े व्यवसाय ने जन्म ले लिया है। वहा इससे निर्मित पत्तलों आदि का प्रयोग होटलों में भी किया जा रहा है। यह एक फैशन बन चुका है। यूरोप में बहुत से बड़े होटलों में इन पत्तलों का भारी मात्रा में आयात भी किया जाता है। यदि इन वनस्पतियो की तरफ सरकार का ध्यान जाए तो काफी अधिक मात्रा में पलायन को रोका जा सकता है। साथ पहाड़ो में बिखरी हुई खेती है जिस कारण से बड़े स्तर पर बागवानी या इस तरह का रोजगार करना मुश्किल हो जाता है, यदि चकबन्दी होती है तो इन बिखरे खेतों के बदले एक, दो या तीन चकों में भी यदि हमें हमारे सभी खेत मिल जाये तो इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट पर किसान काम कर सकते हैं और साथ ही देखरेख भी आराम से कर सकते है।

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