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कभी लीची के लिए पहचान रखने वाले दून में अब घटते जा रहे बगीचे

09/03/20
in उत्तराखंड, हेल्थ
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
लीची एक फल के रूप में जाना जाता है, जिसे वैज्ञानिक नाम से बुलाते हैं, जीनस लीची का एकमात्र सदस्य है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊष्णकटिबन्धीय फल है, जिसका मूल निवास चीन है चीन दुनिया का नम्बर एक लीची उत्पादक देश है। भारत का स्थान दूसरा है। भारत में कुल 92 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में लीची की खेती होती है। बिहार भारत का सबसे बड़ा लीची उत्पाद राज्य है। यहां करीब 32 हजार हेक्टेयर में लीची के बगान हैं। यह कुल खेती का 40 फीसदी हिस्सा है। बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, असम और त्रिपुरा में लीची की पैदावार होती है। लेकिन मुजफ्फरपुर की शाही लीची का कोई जवाब नहीं है। देश.विदेश में इसकी धूम है। मुजफ्फरपुर के अलावा वैशाली, पूर्वी चम्पारण, समस्तीपुर, बेगूसराय और भागलपुर जिले में भी लीची की खेती होती है। 2017 में बिहार में 3 लाख मीट्रिक टन लीची का उत्पादन हुआ था। 2018-19 में बिहार से 137.27 लाख रुपये की लीची का निर्यात हुआ था। बिहार में करीब 50 हजार किसान परिवार लीची से रोजी.रोटी चलाते हैं।
फल के अंदर एक भूरे रंग का बड़ा सा बीज होता है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल फ़रवरी से जून तक होता है। इसके फल में शर्करा, मैलिक अम्ल, साइट्रिक अम्ल, टार्टरिक अम्ल, विटामिन तथा खनिज पदार्थ पाये जाते हैं। गर्मियों में जब शरीर में पानी व खनिज लवणों की कमी हो जाती है तब लीची का रस बहुत फायदेमंद रहता है। लीची सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद फल है। इसमें बहुत से पोषक तत्व जैसे कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, सोडियम, विटामिन सी, विटामिन ए, विटामिन बी .कांपलेक्स, विटामिन के, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और आयरन जैसे मिनरल्स पाए जाते हैं। इसके इन्हीं गुणों के कारण इसे सुपर. फल भी कहा जाता है।
देहरादून की लीची की प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में अलग पहचान है। दून समेत पहाड़ और अन्य प्रदेशों के लोग दून आने पर यहां की लीची जरूर खरीदकर ले जाते हैं। बिहार में चमकी बुखार में लीची का नाम जुड़ने से लीची के ग्राहक कम हो गए हैं। निरंजनपुर मंडी समिति के निरीक्षक अजय डबराल कहते हैं कि मंडी से रोजाना 200 से 250 किलो लीची की कम बिक्री हो रही है। जिससे लीची कारोबारियों में मायूसी है। बिहार में चमकी बुखार से बच्चों की मौत, लीची का नाम इससे जुड़ने और सोशल साइट्स पर तमाम अफवाह उड़ने की वजह से दून में लीची का कारोबार लड़खड़ा गया है। लीची 120 रुपये प्रति किलो बिक रही थी। अब लीची 60 से 80 रुपये प्रतिकिलो बिक रही है। बावजूद लीची के खरीदार नहीं मिल रहे हैं लीची से किसी प्रकार के बुखार का वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। चमकी बुखार असल में वायरल इन्सीफ्लाइटिस है। फल से बीमारी नहीं फैलती है, वातावरण में वायरस जरूर होता है। इससे बचाव करना चाहिये। सफाई पर ध्यान देना चाहिये, फॉगिंग करानी चाहिये। लीची विक्रेता लालपुल मंडी में मोहम्मद यूनुस कहते हैं कि सोशल मीडिया पर चल रहे कई वीडियो ने लोगों में डर पैदा कर दिया है। पहले लोग एक से दो किलो लीची खरीदकर ले जाते थे। अब कीमत कम होने के बाद भी वे लीची कम ही खरीद रहे हैं। हनुमान चौक मंडी के लीची विक्रेता रिजवान का कहना है कि लीची के दाम पीछे से कम हो चुके हैं, 60 से 80 रुपए प्रतिकिलो के बाद भी ग्राहक नहीं मिल रहे हैं। निरंजनपुर में लीची के थोक व्यापारी महेश गुप्ता का कहना है राजधानी देहरादून में बढ़ते कंकरीट के जंगल और बदलते वातावरण में दून की पहचान खत्म होती जा रही है। कभी देश और दूनिया के बाजारों में लीची की रौनकर देखने को मिलती थी, लेकिन आज बदलते मौसम के साथ लीची की पैदावार और स्वाद में भी गिरावट आई है।
एक समय देहरादून अपने मौसम के साथ यहां के बासमती चावल और लीची के लिए जाना जाता था, लेकिन धीरे.धीरे दून की आबोहवा में आये बदलाव ने न केवल बासमती बल्कि लीची की रंगत को भी बेरंग कर दिया है। आंकड़े बताते हैं कि दून की लीची कैसे साल दर साल अपनी पहचान खोती चली गई जानकारी के अनुसार साल 1970 में करीब 6500 हेक्टेयर लीची के बाग देहरादून में मौजूद थे, जो धीरे.धीरे अब महज 3070 हेक्टेयर भूमि पर ही रह गए है। पिछले साल करीब 8000 मीट्रिक टन लीची का उत्पादन हुआ था, जबकि इस बार इसमें और अधिक गिरावट देखने को मिली है। देहरादून में न केवल लीची का उत्पादन कम हुआ है, बल्कि लीची के स्वरूप और स्वाद में भी अंतर आ गया है। पहले के मुकाबले लीची छोटी हो गई है। वहीं, उसके रंग और मिठास भी पहले से फीका हो गया है। स्थानीय लोगों कि माने तो पहले दून की लीची के लेने के लिए अन्य प्रदेशों से भी लोग आते थे, लेकिन अब पहले वाली बात नहीं रही। देहरादून में खासतौर पर विकासनगर, नारायणपुर, बसंत विहार, रायपुर, कौलागढ़, राजपुर और डालनवाला क्षेत्रों में लीची के सबसे ज्यादा बाग थे, लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद देहरादून के घोषित होते ही जमीनों के बढ़ते दामों के चलते दून के तमाम बागों पर कंक्रीट के जंगल उग आए। दून में विकास कार्यों ने ऐसी रफ्तार पकड़ी की यहां की आबोहवा भी बदल गई। जिसका सीधा असर लीची के स्वाद पर और इसकी पैदावार पर दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि कभी लीची के लिए पहचाने जाने वाले देहरादून में आज लीची ही खत्म होती जा रही है। फलों की रानी व जूसी फ्रूट लीची की इन दिनों गरमी की तपन बढ़ने के साथ महानगर में डिमांड बढ़ते जा रही है, लेकिन मार्केट में डिमांड के अनुसार लीची की आवक कुछ कम ही है।
जिस तरह तपन की चुभन बढ़ रही है, उसी तरह इसके भाव भी करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि के साथ चिल्लर बाजार में 200 से 240 रुपये प्रतिकिलो पर पहुंच गये हैं। जूसी फ्रूट में आम, तरबूज, खरबूजा और लीची को बहुत अधिक पसंद किया जाता थी। यह स्वादिष्ट होने के साथ ही काफी पौष्टिक भी होती है। लीची गर्मियों की जान है, लीची का नाम आते ही मुंह में मिठास और रस घुल जाता है। इस समय मार्केट में कोलकाता और इसकी सीमा से लगे बिहार से लीची की आवक हो रही है। मौसम के बदलाव ने इस बार लीची की फसल पर खासा असर डाला है। दून भोपुर.रानीपखरी में लीची ख़राब हो गयी है और इस बार लीची के प्रेमियों को लीची के स्वाद के लिए अभी और इंतज़ार करना पड़ेगा साथ ही इस बार कुछ ज्यादा ही जेब ढीली करनी पड़ सकती है। दून घाटी का जायदातर हिस्सा अपने फलों के बगीचे के लिए जाना जाता है दून घटी अपने रसीले फल लीची के लिए विशेष पहचान रखती है और यहाँ के बागवानो में गर्मियों में मुह में पानी ले आने वाली लीची अपनी खुशबु बिखेरती है।
रानीपोखरी और भोगपुर, डालनवाला, ये दून घाटी की वो जगह है जो लीची बागानों के लिए मशहूर है। इस बार लगातार हो रहे मौसमी बदलाव और गर्मी की तपिश ने बागवानो की पूरी मेहनत पर असर डाला है। जिसके चलते लीची का उत्पादन घटा और इस बार देहरादून की मशहुर लीची को बाज़ार में आने के लिए थोडा और इंतज़ार करना पड़ेगा एऔर लीची के स्वाद के कद्रदानो को इसकी थोड़ी ज्यादा कीमत भी चुकानी पड़ेगी। राज्य में कृषि और उद्यान के भारी भरकम विभाग तो है पर किसानो और बागवानो को हो रहे आर्थिक नुकसान के लिए कोई ठोस नीती नहीं है जिस का खामियाजा यहाँ के लोगो को हर साल उठाना पड़ता है। मौसम की मार से हर साल लीची की फसलों को भारी नुकसान होता है लेकिन सरकार ठोस कृषि निति न होने से कभी भी किसानो और बागवानो की मदद नहीं कर पाती ए और वो साल दर साल भारी नुक्सान उठाते है। फिलहाल किसानों और कास्तकारों को उम्मीद है की आने वाले समय में लीची की फसल सही हो सकेगी।छोटे राज्य में रोजगार का सबसे आसान तरीका कृषि और बागवानी है जो पलायन पर कुछ हद तक रोक लगाये हुयी है धीरे .धीरे युवा भी नगदी फसलों के जरिये इस क्षेत्र में अपनी पहचान बना रहे है ऐसे में कृषि मंत्रालय को भी इन के समय.समय हो रहे नुकसान के लिए भी ठोस कदम उठाने चाहिए, जिससे युवा स्व रोजगार के जरिये अपनी रोज़ी रोटी कम कर पलायान पर अंकुश लगा सकेगे और उत्तराखंड भी हिमाचल की तर्ज़ पर विकास कर सकेगा। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पंजाब, असम और त्रिपुरा आदि राज्यों में भी लीची उगाई जाती है पर न के बराबर। हिंदुस्तान में लीची की फसल विशेषकर उत्तरपूर्वी भागों तक ही सीमित है।

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