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पहाड़ की लोक आस्था से जुड़े सातूं-आठूं

19/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
विहंगम हिमालयी भूभाग को शिव की भूमि माना जाता है। अलग-अलग स्थानों में शिव के कई रूपों में पूजा होती है। उनकी अर्धांगिनी पार्वती हैं। शिव और शक्ति के प्रतीक शिवलिंग का यही अर्थ है। शिव पुरुष के प्रतीक और शक्‍ति स्‍वरूपा पार्वती प्रकृति की। पुरुष और प्रकृति के बीच यदि संतुलन न हो, तो सृष्टि का कोई भी कार्य भलीभांति संपन्न नहीं हो सकता है। संसार के इसी संतुलन को बनाए रखने का पर्व है सातों-आठों। जो उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। खासकर कुमाऊं के पूर्वोत्तर भूभाग में।सातों-आठों पर्व एक तरीके से बेटी की विदाई का जैसा ही समारोह होता है। जिसमें माता गौरी को मायके से अपने पति के साथ ससुराल को विदा किया जाता है। इस अवसर पर गांव वाले भरे मन व नम आंखों से अपनी बेटी गमरा को जमाई राजा महेश्वर के साथ ससुराल की तरफ विदा कर देते हैं। साथ ही साथ अगले वर्ष फिर से गौरा के अपने मायके आने का इंतजार करते हैं। लोक पर्व सातों-आठों की शुरुआत भाद्रपद मास (अगस्त-सितंबर) की पंचमी तिथि से होती है। इसे बिरुड पंचमी भी कहते हैं । इस दिन हर घर में तांबे के एक बर्तन में पांच अनाजों मक्का, गेहूं , गहत, ग्रूस व कलू को भिगोकर मंदिर के समीप रखा जाता है। इन अनाजों को सामान्य भाषा में बिरुडे या बिरुडा भी बोला जाता है। ये अनाज औषधीय गुणों से भी भरपूर होते हैं। व स्वास्थ्य के लिए भी अति लाभप्रद होते हैं। इन्हीं अनाजों को प्रसाद के रूप में बांटा एवं खाया जाता है। दो दिन बाद सप्तमी के दिन शादीशुदा महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं। दोपहर बाद अपना पूरा सोलह श्रृंगार कर धान के हरे भरे खेतों में निकल पड़ती हैं। धान के खेतों में एक विशेष प्रकार का पौधा ( जिसे सौं का पौधा कहते हैं ) भी उगता है। उस पौधे को महिलाएं उखाड़ लेती हैं। साथ में कुछ धान के पौधे भी।इन्हीं पौधों से माता पार्वती की एक आकृति बनाई जाती है। फिर उस आकृति को एक डलिया में थोड़ी सी मिट्टी के बीच में स्थापित कर दिया जाता है। उसके बाद उनको नए वस्त्र व आभूषण पहनाए जाते हैं। पौधों से बनी इसी आकृति को गमरा या माता गौरी का नाम दिया जाता है।उसके बाद महिलाएं गमरा सहित डलिया को सिर पर रखकर लोकगीत गाते हुए गांव में वापस आती हैं। फिर मूर्ति स्थापना होती है। मान्यता है कि माता गौरी भगवान भोलेनाथ से रुठ कर अपने मायके चली आती हैं। अगले दिन अष्टमी को भगवान भोलेनाथ माता पार्वती को मनाने ससुराल आते हैं। इसीलिए अगले दिन महिलाएं फिर से सज धज कर धान के हरे भरे खेतों में पहुंचती हैं। वहां से सौं और धान के कुछ पौधे उखाड़ कर उनको एक पुरुष की आकृति में ढाल दिया जाता है। महेश्वर को भी एक डलिया में रखकर उनको भी नए वस्त्र आभूषण पहनाए जाते हैं। और उस डलिया को भी सिर पर रखकर नाचते गाते हुए गांव की तरफ लाते हैं और फिर उनको माता पार्वती के समीप विधि विधान के साथ स्थापित कर दिया जाता है। गमरा व महेश्वर की पूजा होती है। इस अवसर पर एक अनोखी रस्म भी निभाई जाती है। जिसमें एक बड़े से कपड़े के बीचो-बीच कुछ बिरूडे व फल रखे जाते हैं। फिर दो लोग दोनों तरफ से उस कपड़े के कोनों को पकड़कर उस में रखी चीजों को ऊपर की तरफ उछालते हैं। कुंवारी लड़कियां व शादीशुदा महिलाएं अपना आंचल फैलाकर इनको इकट्ठा कर लेती हैं। यह बहुत ही शुभ व मंगलकारी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई कुंवारी लड़की इनको इकट्ठा कर लेती हैं तो उस लड़की की शादी अगले पर्व से पहले-पहले हो जाती है  दूब की गांठों को डोरी में बांध दुबड़ा पहना और बिरुड़ों का प्रसाद ग्रहण किया। मां पार्वती के आशीर्वाद से दसवें माह उसकी कोख से पुत्र ने जन्म लिया।कहा जाता है कि इस पूजा से जिनके घर में अन्न नहीं होता अन्न आता है, जिसके घर में धन नहीं होता, धन आता है और जिसके घर में संतान नहीं होती, संतान आती है। स्त्री केन्द्रित इस उत्सव में समूचा समाज गतिशील होकर एकता की मिसाल पेश करता है। मानव जीवन और खास कर खेतिहर समाजों के लिए नई उमंग ले कर आने वाली ऋतु वर्षा के विदा होने के लगभग मनाया जाने वाला यह लोक उत्सव मानव जीवन और खास कर खेतिहर समाजों के लिए नई उमंग लेकर आता है।। पर्व के समापन के बाद कई जगहों पर हिलजात्रा का भी आयोजन किया जाता है। देवभूमि उत्तराखंड को अपने संस्कृति के लिए जाना जाता है. देवभूमि में कई ऐसे ऐतिहासिक पर्व हैं, जिनका लोग साल भर बेसब्री से इंतजार करते हैं. जिसमें से एक लोकप्रिय त्यौहार सातू-आठू (गौरा-महेश पूजा) भी है. यह पर्व (भादौ) भाद्रमाह के सप्तमी-अष्टमी को मनाया जाता है. मान्यता है कि सप्तमी को मां गौरा अपने मायके से रूठकर मायके आती हैं और जिसके बाद उन्हें लेने अष्टमी को भगवान शिव लेने आते हैं. सातू आठू सप्तमी व अष्टमी को मनाया जाता है. सातू-आठू में सप्तमी के दिन मां गौरा व अष्टमी को भगवान शिव की मूर्ति बनाई जाती है. मूर्ति बनाने के लिए मक्का, तिल, बाजरा आदि के पौधे का प्रयोग होता है, जिन्हें सुंदर वस्त्र पहनाकर पूजा की जाती है. वहीं झोड़ा-चाचरी गाते हुए गौरा-महेश के प्रतीकों को खूब नचाया जाता है. महिलाएं दोनों दिन उपवास रखती हैं. अष्टमी की सुबह गौरा-महेश को बिरुड़ चढ़ाए जाते हैं. प्रसाद स्वरूप इसे सभी में बांटा जाता है और गीत गाते हुए मां गौरा को ससुराल के लिए बिदा किया जाता है. मूर्तियों को स्थानीय मंदिर या नौले (प्राकृतिक जल स्रोत) के पास विसर्जित किया जाता है. हमारी जम्मेदारी है कि उसे अगली पीढ़ी को देते जाए. नहीं तो बुढ़ तो एक दिन जाएंगे ही, मगर भाग सरा नहीं पायेंगे. इस क्रम के टूटने का डर बना रहता है क्योंकि चक्र टूटने का मतलब सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओ की विलुप्ति. कुमाऊँ में भी अब सांस्कृतिक विरारत व्यावसायिक लोगों के भरोसे जीवित है. आज हमें हर गाव में एक पुरूषार्थी आमा की आवश्यकता है जो जीवनमूल्यों, परम्पराओं की सांस्कृतिक धरोहर संजो कर रख सके.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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