• About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact
Uttarakhand Samachar
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल
No Result
View All Result
Uttarakhand Samachar
No Result
View All Result

उत्तराखंड के विख्यात लोक गायक हीरा सिंह राणा

17/09/24
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
69
SHARES
86
VIEWS
Share on FacebookShare on WhatsAppShare on Twitter

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला। हीरा सिंह राणा उत्तराखंड लोक संगीत के महान संवाहक व रक्षक रहे हैं। उनके रचे गीतों में तरह तरह के भाव, रस, प्रतीक, विम्बों का प्रयोग हुआ। जो उन्हें आधुनिक संगीत संसार में एक महान गीत रचयिता और गायक की श्रेणी में रखने को काफी हैं।

16 सितंबर, 1942 को डंढ़ोली गांव (मनिला) अल्मोड़ा में जन्मे लोक कवि हीरा सिंह राणा का प्रारंभिक जीवन-संघर्ष दिल्ली और कोलकता में रहा। प्रवास से मन हटा तो वापस पहाड़ आकर लोक कलाकार बन गए। धीरे-धीरे आकाशवाणी और दूरदर्शन के बाद देश-विदेश में अपनी पहचान बनाई।

हीरा सिंह राणा ने कई विषयों पर गीत लिखे और बहु विषयों पर गीत गाए। इन गीतों में गीतों में पहाड़ी मानवीय प्रकृति व पहाड़ों के भौगोलिक प्रकृति वर्णन अन्यन लगते हैं। ‘के भला मनिखा हो हमारा पहाड़ मा’ गीत में पहाड़ों की मानवीय संस्कृति व पहाड़ों की भौगोलिक प्रकृति का ऐसा संगम देखने को मिलता है जो हीरा सिंह को स्वयं ही एक ऊंचाई देने में सक्षम है।

बारामासा गीत में हीरा सिंह राणा ने हर महीने बदलती भौगोलिक स्थिति व उस हिसाब से सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यों में परिवर्तन की जो झलक बिखेरी वह इस गीत को एक विशेष काव्य बना देता है। ’आयु पूस माख… मैत जुला खुल कोनी पंचमी उत्तरैणी…’ जैसे प्रतीक प्रयोग यह बताने में सक्षम हैं कि पहाड़ों की जिंदगी प्रकृति मय है और पहाड़ी अपनी सांस्कृतिक प्रकृति भौगोलिक हिसाब से बदलता रहता है जिससे कि मानव व प्रकृति में सामंजस्य बना रहे।हीरा सिंह राणा पहाड़ी भौगोलिक प्रकृति से इतने प्रभावित रहे कि ‘हे मेरी मानिले हम तेरी बलाइ ल्यूला’ जैसे गीत, जागर में गंगा, पाणी, घाट व स्थानीय नामों जैसे प्रतीकों का प्रयोग कर उत्तराखंड के भौगोलिक विस्तार का वर्णन देने से नहीं चुके। उन्होने भक्ति रस में प्रकृति रस की भरमार कर डाली। इसी तरह पूर्ण श्रृंगारिक गीत ‘रंगीला बिंदी घाघरी काई धोती लाल किनार वाइ’ मे नायिका के आभूषणो से श्रृंगार रस प्राप्ति के लिए हीरा सिंह राणा ‘फ्यूंली (प्योली) फूली वाइ आंख मा’ जैसे भौगोलिक प्रकृति प्रतीक देने से नही चूकते। इसी तरह ’अजकाल हरे ज्वाना मेर नौली पराण’ जैसे संयोग श्रृंगार युक्त रसीले गीत में भी गांव गदेरे जैसे प्रतीकों से वे कई विम्ब प्रस्तुत करने में सफल रहे। निपट श्रृंगारिक गीत ‘के बाटु मै काइ तू कसी लाग छे ये’ गीत में नायक नायिका की सुंदरता व अन्य गुण वर्णन करने के लिए कई भौगोलिक प्रतीकात्मक शब्द जैसे- बुरांश फूली डाळ, फूल, हिमाला, कार्तिकी माउ, उदंकार आदि का सुंदर प्रयोग हुआ, जो कि शृंगारिता वर्धक प्रतीक साबित हुए हैं।लोक गीतकार हीरा सिंह राणा का ’के संध्या झूली रे छौ भगिवाना नीलकंठा हिमाला’ गीत तो उत्तराखंड की भौगोलिक परिवेश को ही समर्पित है। बहुत कम शब्दों में ही सारा उत्तराखंड का भौगोलिक सुंदरता का वर्णन कर डालता है।

राणा के ’जुग बजाने गया बिनाई’ जैसे आध्यामिक गीत में ’कैकि लागुली पट्ट बुसी कैकि फली फूली’ वनस्पति प्रतीकों से गीतकार वह बात कह गया जो अन्य शब्दों से संभंव ही नही होता। ’अहा धना धना धानुली धन तेरो पराणी’ गीत में तो ’बौली का सेरा’ जैसे प्रतीक श्रोताओं के मन में मनमाफिक विम्ब बनाने में सफल रहे। स्थान विशेष नाम भी प्रकृति विम्ब प्रदान करने में सफल होते हैं। हीरा सिंह राणा ने एक श्रृंगारिक गीत ‘हिटे अल्मोड़ा बजार, हिटे नंदादेवी म्याल देखुला’ में भौगोलिक स्थान व विशेष स्थानीय परिधानो, स्थानीय मिठाई आदि का प्रयोग कर अपना प्रकृति प्रतीक प्रेम बताया। इन प्रतीकों से गीत को ऊंचाई देने में राणा को सफलता मिली। ’घाम गयो धार मा’ जैसे गीतों में भी हीरा सिंह प्रकृति प्रतीकों से सफल विम्ब देने में सफल हुए रहे थे। हीरा सिंह राणा के गीतों में मानवीय व्यवहार व भौगोलिक प्रकृति प्रतीकों का सुंदर प्रयोग हुआ। और वांछनीय फल प्राप्ति करने में राणा सफल भी रहे विभिन्न जन आंदोलनों के लिए उन्होंने गीत रचे और आंदोलनों के मंच पर जा कर गाये भी.

 लसका कमर बांधा,हिम्मत का साथा,

फिर भोला उज्याली होली,कां ले रौली राता

उनका यह गीत तो उत्तराखंड के आंदोलनों,संघर्षों का निरंतर ही सांझी रहा.आखिरकार कठिन से कठिन समय में भी रास्ता तो कमर कस कर एकजुट हो कर लड़ने का ही रास्ता है और अंधेरे से अंधेरे वक्त में भी लड़ते हुए यह आस तो सर्वाधिक बलवती है ही कि रात का साम्राज्य आखिर कब तक रहेगा, कल तो सवेरा होगा,कल तो उजाला होगा ही थे। पहाड़ की महिला के संघर्ष को महसूस किया तो रचना फूटी ‘पहाड़ाक महिलाओंक तप और त्याग, आफी बड़ा जैले आपड़ भाग, राजुली सैक्याणी मालू घस्यारी, रामी बैराणा पहाड़ की नारी..।’ वह राज्य आंदोलन में भी सक्रिय रहे। नवोदित उत्तरांचल राज्य बनने की खुशी में गीत रचते हुए लिखा ‘उत्तरांचल राज्य हैगो गीत गाओ, फूंको हो रणसिंह नगाड़ ढोल बजाओ..।’ मगर राज्य बनने के बाद भी हालात नहीं बदले। पलायन, बेरोजगारी की पीड़ा को महसूस करते हुए उन्होंने मार्मिक कविता रची। ‘त्यर पहाड़ म्यर पहाड़, रयो दुखों को ड्यर पहाड़, बुजुर्गों लै जोड़ पहाड़, राजनीति लै तोड़ पहाड़, ठेकदारों लै फोड़ पहाड़, नानतिनू लै छोड़ पहाड़..। इसके बाद भी हीरा राणा हौसला और उम्मीद भरते हुए लिखते हैं ‘लस्का कमर बांधा हिम्मत का साथ, फिर भोल उज्याल होली कां लै रोली रात..।’ हीरा सिंह राणा भले हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके कालजयी गीत हमें सदा आनंदित करते रहेंगे। हीरा सिंह राणा को उनके ठेठ पहाड़ी प्रतीकों वाले गीतों के लिए भी जाना जाता था. लेकिन इस दौरान भी वो लोक संगीत की बेहतरी के लिए संगीत जगत से जुड़े रहे. उनका उत्तराखंड के लोक गीतों को देश-दुनिया तक पहुंचाने में अहम योगदान रहा. हीरा सिंह राणा ने 70 के दशक में हीरा सिंह राणा ने कालजयी गीतों से अपनी पहचान बनाई. देश विदेश में विभिन्न मंचों तक उत्तराखंड की लोक संस्कृति को पहुंचाया. 1987 में प्यूली व बुराशं नाम से उनका कविता संग्रह प्रकाशित हुआ. उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान उनके जनगीत लस्का कमर बॉदा हिम्मत क साथा, भोल फिर उजियाली होली कालै रैली राता ने राज्य आंदोलन में एक नई ऊर्जा का संचार किया.हीरा सिंह राणा के गीतों में पहाड़ बसता है. कहीं गीतों में पहाड़ पर पड़ने वाली धूप से उपजा श्रृंगार है तो कहीं बंजर पड़े पहाड़ की पीड़ा है. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद चली लूस-खसोट और खोखले विकास पर दुःख और टीस उनके गीतों में सहज दिखती है. हीरा सिंह राणा के जन्मदिन पर आज उनके गीत की यह पंक्ति खूब याद आती है-

कैक तरक्की कैक विकास

हर आँखा में आंस ही आंस

जे.ई कैजां बिल के पास

ए.ई मारूँ पैसों गास

अटैच्यू में भौरो पहाड़…

यानी किसकी तरक्की किसका विकास, हर आंख में बस उम्मीद ही उम्मीद है, जेई बिल पास करता है और एई पैसों का गास कहता है अटैची में भरा हुआ है पहाड़. राणा जी की जीवनी बताती है कि वे 15 साल की उम्र से ही उत्तराखंड की संस्कृति से जुड़कर गीत गाने लगे थे. रामलीला, पारंपरिक लोक उत्सव, वैवाहिक कार्यक्रम, आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली, लखनऊ और देश-विदेश में उन्होंने खूब गाया. बच्चों को सिखाया भी,लेकिन उन्हें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में यह चिंता भी सताती रही जिसे उन्होंने दो वर्ष पहले अपने जन्म दिन के अवसर पर व्यक्त किया-“आज हमारे लोक संगीत की चिंता नही है किसी को बबा! यह बहुत दुखद है.अपनी लोक संस्कृति और लोक परंपराओं को नहीं बचाओगे तो अपनी आंखों से अपनी सांस्कृतिक विरासत को लुप्त होते हुए देखोगे !”दरअसल, हीरा सिंह राणा जैसा कलाकार सदियों में पैदा होता है और हीरा सिंह राणा जैसा बनने के लिए भी सदियां लग जाती हैं.हीरा सिंह राणा कहा करते थे कि “हमारे नौनिहाल अपनी भाषा-बोली के प्रति जागरूक हों,अपने लोक संस्कृति को जानें समझें, और उन गीतों में उकेरी पीड़ा को जानने की कोशिश करें,जो लोकगीत आज बिखरे हुए हैं,उन्हें संकलित करने का प्रयास करे.सही अर्थों में यही हमारा सम्मान होगा.” राजनीति में उठापटक और वीरान होते पहाड़ के दर्द को उकेरने वाले लोकगायक हीरा सिंह राणा पहाड़ों की आवाज़ थे. उन्होंने पहाड़ की लोक संस्कृति को नयी पहचान ही नहीं दिलाई बल्कि विश्व सांस्कृतिक मंच पर उसे स्थापित भी किया.उनके साहित्यिक और लोकगायिकी से कुमाउँनी भाषा और संस्कृति को लोकप्रियता के नए आयाम मिले हैं, इसलिए हीरा सिंह राणा का आज नहीं रहना पर्वतीय लोक संस्कृति के लिए भी अपूरणीय क्षति है.आज हीरा सिंह राणा जी के जन्मदिन पर उन्हें शत शत नमन! (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।)लेखक दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं)।

Share28SendTweet17
Previous Post

मार्च 2025 तक राज्य के शत प्रतिशत गांव में कचरा प्रबंधन का कार्य शुरू करना हमारा लक्ष्य: मुख्यमंत्री

Next Post

जोरदार जयकारों के साथ नंदादेवी भगवती की उत्सव डोली नंदा सिद्धपीठ देवराड़ा में 6 माह के लिए प्रवास पर

Related Posts

उत्तराखंड

मुख्यमंत्री धामी की घोषणा, मिली मंजूरी महाबगढ़ मंदिर का होगा सौंदर्यीकरण

August 4, 2026
3
उत्तराखंड

डोईवाला: पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिष्ट को दी श्रद्धांजलि

August 4, 2026
13
उत्तराखंड

डोईवाला: सौंग नदी का अस्थायी सिंचाई बांध टूटा, 15 हजार से अधिक किसान प्रभावित

August 4, 2026
52
उत्तराखंड

ई-कचरे को रोज़गार के बेहतर अवसरों में बदलने पर ज़ोर

August 4, 2026
5
उत्तराखंड

स्वर्गीय सोबन सिंह जीना कुशल वक्ता, कूटनीतिज्ञ के अलावा पर्वतीय विकास के पैरोकार भी रहे

August 4, 2026
3
उत्तराखंड

पुष्पवर्षा और चरण प्रक्षालन के साथ देवभूमि ने किया शिवभक्त कांवड़ियों का अभिनंदन

August 4, 2026
2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular Stories

  • चार जिलों के जिलाधिकारी बदले गए

    67716 shares
    Share 27086 Tweet 16929
  • डोईवाला : पुलिस,पीएसी व आईआरबी के जवानों का आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण सम्पन्न

    45786 shares
    Share 18314 Tweet 11447
  • ऑपरेशन कामधेनु को सफल बनाये हेतु जनपद के अन्य विभागों से मांगा गया सहयोग

    38072 shares
    Share 15229 Tweet 9518
  •  ढहते घर, गिरती दीवारें, दिलों में खौफ… जोशीमठ ही नहीं

    37453 shares
    Share 14981 Tweet 9363
  • विकासखंड देवाल क्षेत्र की होनहार छात्रा ज्योति बिष्ट ने किया उत्तराखंड का नाम रोशन

    37370 shares
    Share 14948 Tweet 9343

Stay Connected

संपादक- शंकर सिंह भाटिया

पता- ग्राम एवं पोस्ट आफिस- नागल ज्वालापुर, डोईवाला, जनपद-देहरादून, पिन-248140

फ़ोन- 9837887384

ईमेल- shankar.bhatia25@gmail.com

 

Uttarakhand Samachar

उत्तराखंड समाचार डाॅट काम वेबसाइड 2015 से खासकर हिमालय क्षेत्र के समाचारों, सरोकारों को समर्पित एक समाचार पोर्टल है। इस पोर्टल के माध्यम से हम मध्य हिमालय क्षेत्र के गांवों, गाड़, गधेरों, शहरों, कस्बों और पर्यावरण की खबरों पर फोकस करते हैं। हमारी कोशिश है कि आपको इस वंचित क्षेत्र की छिपी हुई सूचनाएं पहुंचा सकें।
संपादक

Browse by Category

  • Bitcoin News
  • Education
  • अल्मोड़ा
  • अवर्गीकृत
  • उत्तरकाशी
  • उत्तराखंड
  • उधमसिंह नगर
  • ऋषिकेश
  • कालसी
  • केदारनाथ
  • कोटद्वार
  • क्राइम
  • खेल
  • चकराता
  • चमोली
  • चम्पावत
  • जॉब
  • जोशीमठ
  • जौनसार
  • टिहरी
  • डोईवाला
  • दुनिया
  • देहरादून
  • नैनीताल
  • पर्यटन
  • पिथौरागढ़
  • पौड़ी गढ़वाल
  • बद्रीनाथ
  • बागेश्वर
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • राजनीति
  • रुद्रप्रयाग
  • रुद्रप्रयाग
  • विकासनगर
  • वीडियो
  • संपादकीय
  • संस्कृति
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • साहिया
  • हरिद्वार
  • हेल्थ

Recent News

मुख्यमंत्री धामी की घोषणा, मिली मंजूरी महाबगढ़ मंदिर का होगा सौंदर्यीकरण

August 4, 2026

डोईवाला: पूर्व कैबिनेट मंत्री हीरा सिंह बिष्ट को दी श्रद्धांजलि

August 4, 2026
  • About Us
  • Privacy Policy
  • Cookie Policy
  • Terms & Conditions
  • Refund Policy
  • Disclaimer
  • DMCA
  • Contact

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.

No Result
View All Result
  • Home
  • संपादकीय
  • उत्तराखंड
    • अल्मोड़ा
    • उत्तरकाशी
    • उधमसिंह नगर
    • देहरादून
    • चमोली
    • चम्पावत
    • टिहरी
    • नैनीताल
    • पिथौरागढ़
    • पौड़ी गढ़वाल
    • बागेश्वर
    • रुद्रप्रयाग
    • हरिद्वार
  • संस्कृति
  • पर्यटन
    • यात्रा
  • दुनिया
  • वीडियो
    • मनोरंजन
  • साक्षात्कार
  • साहित्य
  • हेल्थ
  • क्राइम
  • जॉब
  • खेल

© 2015-21 Uttarakhand Samachar - All Rights Reserved.