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पहाड़ में साहित्य सृजन में महादेवी वर्मा का महत्वपूर्ण योगदान

26/03/25
in उत्तराखंड, देहरादून, साहित्य
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य में छायावादी युग की महान कवयित्री हैं। महादेवी वर्मा को हिन्दी साहित्य के
छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के
साथ गिनती की जाती है। कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च, 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद
में हुआ था। महादेवी वर्मा की शादी सिर्फ 14 साल की उम्र में ही कर दी गई थी।महादेवी वर्मा की शादी
बरेली के डॉक्टर स्वरूपनारायण वर्मा से हुई थी। महादेवी वर्मा कुछ वक्त के बाद ससुराल से पढ़ाई के लिए
इलाहाबाद आ गईं।अपने 80 साल के जीवन काल में उन्होंने महान कवयित्री प्रयाग महिला विद्यापीठ की
प्राचार्य और कुलपति, स्वतंत्रता सेनानी जैसे अनेक प्रकार के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महादेवी
वर्मा के परिवार में पीढ़ियो सें लड़की पैदा नहीं हुई थी। महादेवी वर्मा अपने घर मेंदो सौ सालों से सालों में
पैदा होने वाली पहली लड़की थीं। महादेवी वर्मा ने पंचतंत्र और संस्कृत का अध्ययन किया। महादेवी वर्मा
के बारें में कहा जाता है कि वो एक भिक्षु बनना चाहती थी लेकिन महात्मा गांधी से मिलने के बाद उनका
मन समाज-सेवा की तरफ चला गया। महादेवी वर्मा को एक काव्य प्रतियोगिता में ‘चांदी का कटोरा’ मिला
था जिसे उन्होंने गांधीजी को उपहार में दिया था। महादेवी वर्मा ने सत्याग्रह आंदोलन में भाग लिया।
महादेवी वर्मा की लेखनी में गद्य, काव्य में नए आयाम बनाए। उनकी लेखनी आम लोगों से जुड़ी हुई थी।
महादेवी के काव्य संग्रहों में ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्य गीत’, ‘यामा’, ‘नीहार’, ‘दीपशिखा’, और ‘सप्तपर्णा’ का
आज भी कोई तोड़ नहीं है, ये जितनी पहले प्रासागिंक थीं, उतनी आज भी है। इनके गद्य में ‘स्मृति की
रेखाएं’, ‘अतीत के चलचित्र’, ‘पथ के साथी’ और ‘मेरा परिवार’ हिदी साहित्य जगत के चमचमाते सितारे
हैं। महादेवी वर्मा आधुनिक युग की मीरा कहीं जाती हैं। भक्ति काल में जो स्थान मीरा को मिला था वहीं
स्थान आधुनिक युग में महादेवी वर्मा का है मीरा का प्रियतम सगुण, साकार गिरधर गोपाल हैं। महादेवी का
प्रसिद्ध गीत, ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ इस बात के साफ कर देता है कि बहुत बड़ी कृष्ण भक्त थी।
महादेवी वर्मा के उनके हिन्दी साहित्य में योगदान के लिए कई बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
उन्हें भारत सरकार के द्वारा भारत के सबसे बड़े पुरस्कारों पद्म भूषण, ज्ञानपीठ और पद्म विभूषण से
सम्मानित किया जा चुका हैमहादेवी वर्मा को 27 अप्रैल, 1982 में काव्य संकलन “यामा” के लिए ज्ञानपीठ
पुरस्कार, 1979 में साहित्य अकादमी फेलोशिप, 1988 में पद्म विभूषण और 1956 में पद्म भूषण से
सम्मानित किया गया था। मीरा कुटीर’ के कुछ हिस्से उसी तरह संजोकर रखे गए हैं जैसे कि वह महादेवी
वर्मा के समय में थे। उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली वस्तुएं आज भी वैसी ही हैं। आपको बता दें कि
आज भी साहित्य प्रेमी साल में एक बार यहां एकत्र होते हैं और उनकी याद में गोष्ठी-संगोष्ठियों का आयोजन
होता है। कुछ साहित्य प्रेमी पर्यटकों को भी उनके आवास के कोने में बैठे घंटों लेखन करते देखा गया है।
रामगढ़ में महादेवी वर्मा से पहले विश्वविख्यात कवि और भारतीय साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता
गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर आ चुके थे और वे यहां विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे।
रामगढ़ की सुरम्य वादियों से प्रभावित होकर राष्ट्रगान रचयिता ने अंग्रेज मित्र डेरियाज से भूमि खरीद ली
थी। 1901 में टैगोर ने कुछ दिन यहां बिताए और गीतांजलि रचना के कुछ अंश लिखे। कोलकाता में सात
मई 1861 को जन्मे टैगोर 1901 में पहली बार रामगढ़ पहुंचे। यहां की मनोरम छटा से अभिभूत हुए तो
40 एकड़जमीन खरीद ली। जगह को नाम दिया हिमंती गार्डन। और आज इस जगह को टैगोर टॉप नाम से
जाना जाता है। 1903 में पत्नी मृणालिनी के देहावसान के बाद टैगोर 12 वर्षीय बेटी रेनुका के साथ रामगढ़
आए। रेनुका टीबी से ग्रस्त थी। हालांकि बाद में बेटी के निधन से वह दुखी हुए। इस दौरान उन्होंने शिशु
नामक कविता रची। गीतांजलि की रचना के लिए 1913 में टैगोर को साहित्य का नोबल दिया गया।
गीतांजलि के कुछ अंश को उन्होंने रामगढ़ में रचा। उत्तराखंड से लगाव रखने वाले टैगोर ने सात अगस्त
1941 को संसार से विदा ले ली।लेकिन अच्छी बात यह है कि गुरूदेव टैगोर के जाने के बाद आज उनकी
अंतिम इच्छा सार्थक होती नजर आ रही है। शासन ने रामगढ़ में स्वीकृत केंद्रीय विश्वभारती परिसर के लिए

निशुल्क भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब जमीन उपलब्ध होने के बाद विश्वभारती विवि
परिसर की जल्द स्थापना होने की उम्मीद है। विश्वभारती विश्वविद्यालय ने परिसर के लिए 150 करोड़
रुपये का प्रस्ताव रखा गया है। रामगढ़ क्षेत्र के टैगोर टाप में विश्वभारती केंद्रीय विश्वविद्यालय परिसर की
स्थापना के लिए भूमि को लेकर कैबिनेट में निर्णय होना बड़ी उपलब्धि है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना
को लेकर वर्षों से जुटे हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायटी (हडर्स) व शांति निकेतन ट्रस्ट
फार हिमालया के सदस्यों ने खुशी जताई है। सचिव ने कहा कि 150 करोड़ रुपये से बनने वाले इस परिसर
में 535 विद्यार्थियों के लिए आवासीय भवन भी बनना है। जमीन उद्यान विभाग से विश्वविद्यालय को
हस्तांतरित हो जाएगी। प्रस्तावित परिसर में ग्राम्य विकास, कौशल विकास एवं उद्यमशीलता, राजनीति
शास्त्र, समाजशास्त्र, योग एवं अध्यात्म जैसे विषयों पर स्नातक व स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम एवं शोध कार्य
आरंभ किया जाएगा। इसे आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में तैयार किया जाएगा। अंग्रेजी शासन के समय
से ही रामगढ़ शांतिप्रिय लोगों की पसंदीदा जगह रहा है। शांतिएवं एकांत में समय बिताने के शौकीन कुछ
अंग्रेजों ने यहां अपने लिए बंगलेबनवाए थे। निकट ही महेशखान के जंगल में अंग्रेजों का बनवाया हुआ डाक
बंगला है, 113 वर्ष पुराना, जो अब वन विभाग के पास है। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को अपनी कुमाऊं यात्रा
में यह स्थान बहुत पसंद आया था। वे पहली बार 1903 में यहां आए थे। फिर 1914, 1927 और 1937 में
भी आए। अपनी बीमार बेटी को लेकर यहां लम्बे समय तक रहे। आज भी टैगोर टॉप यहां की सबसे सुंदर
जगहों में एक है।महादेवी वर्मा जब 1933 में शांति निकेतन गईं तो गुरुदेव ने उन्हें रामगढ़ के सौंदर्य तथा
शांति के बारे में बताया। एक-दो वर्ष बाद बदरीनाथ से लौटते हुए महादेवी रामगढ़ आईं। इसकी शांति,
शीतलता और हरियाली ने उन्हें प्रभावित किया। तब उन्होंने उमागढ़ में जमीन ली और 1936 में ‘मीरा
कुटीर’ बनवाया। वे प्रति वर्ष गर्मियों में यहां रहती थीं। उनकी कई रचनाएं यहीं लिखी गईं। उनके आमंत्रण
पर मीरा कुटीर में कई लेखक आए, रहे और उन्होंने यहां साहित्य सृजन भी किया। मीरा कुटीर आज एक
स्मारक के रूप में मौजूद है। वहां एक अतिथि गृह भी लगभग तैयार है, जहां लेखक ठहर सकेंगे। ग्वालियर
के सिंधिया घराने ने यहां बहुत बड़ा इलाका खरीदा था, जो उनके ट्रस्ट के अधीन होने के कारण आज भी
बिचौलियों और अतिक्रमण से बचा हुआ है। आज़ादी से पहले और बाद में तो बहुत सारे नेताओं,
अधिकारियों, उद्यमियों, लेखकों-पत्रकारों ने यहां अपने कॉटेज बनवाए। रामगढ़ के उमागढ़ गांव में देवीथान
के नाम से मशहूर एक और छोटी सी पहाड़ी पर प्रसिद्ध हिंदी लेखिका और कवयित्री महादेवी वर्मा का घर
है। आधुनिक मीरा के नाम से मशहूर छायावादी कविता की प्रमुख प्रतिपादकों में से एक महादेवी वर्मा को
उनके द्वारा लिखे गए उन चित्रों के लिए भी याद किया जाता है, जो अनजाने में उनके जीवन में आए थे।
उन्हें ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।अपने शानदार
साहित्यिक करियर के अलावा, वह जानवरों के प्रति गहरी सहानुभूति और उनके प्रति लगभग माँ के समान
प्रेम के लिए भी जानी जाती थीं। वह जानवरों के प्रति क्रूरता के सख्त खिलाफ थीं और उन्होंने अपने पालतू
जानवरों के बारे में कई मजेदार किस्से लिखे जो अप्रत्याशित रूप से उनके जीवन का अभिन्न अंग बन गए।
इनमें उनका मोर नीलकंठ, गौरा, उनकी बहन द्वारा उन्हें उपहार में दी गई गाय और दुर्मुख नामक खरगोश
शामिल हैं। गिलू नामक गिलहरी के बारे में लिखते हुए, जिसकी जान उन्होंने बचाई थी, वह बड़े प्यार से
बताती हैं कि कैसे एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना में गिल्लू ने अपने हिस्से के काजू का बलिदान कर दिया था, जो
उन्हें घर वापस आने पर अपने झूले पर ढेर में मिले थे। गिल्लू ने उनकी थाली से खाने वाला एकमात्र
जानवर होने का विशेष विशेषाधिकार अर्जित किया था! एक और मार्मिक कहानी उनके पालतू हिरण सोना
के बारे में है। वह महादेवी जी से इतनी जुड़ी हुई थी कि उनकी अनुपस्थिति सोना को इतनी बेचैनी और
बेचैनी देती थी कि एक बार जब महादेवी जी बद्रीनाथ की अपनी वार्षिक यात्रा पर गई हुई थीं, तो सोना
वियोग की पीड़ा सहन नहीं कर सकी और अपनी स्वामिनी की तलाश में पास के जंगल में चली गई। बंधे
होने के बावजूद, वह खुद को खोलने में कामयाब रही और एक ऐसे ही दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास में, जंगल में कुछ
दूर तक चली गई, दुर्भाग्य से कभी वापस नहीं लौटी! *लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक*
*वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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