डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
अल्मोड़ा की सुप्रसिद्ध मिठाई सिंगौड़ी भले ही देश-दुनिया में अलग पहचान रखती हो लेकिन मिठाई को सुरक्षित रखने के लिए लगाया जाने वाला पत्ता भी कई औषधीय गुणों से भरपूर है. कहा जाता है कि सिंगौड़ी मिठाई को मालू पत्ता में रखने से कई दिनों तक मिठाई खराब नहीं होती है क्योंकि मालू का पत्ता औषधीय गुणों से भरपूर है. इसका नतीजा है कि इस पत्ते में मिठाई कई दिन सुरक्षित रहती है. ऐसे में हल्द्वानी वन अनुसंधान केंद्र इस मालू पत्ता को संरक्षित करने का भी काम कर रहा है, जिससे कि औषधि से भरपूर इस पत्ते को लोग जान सकें.हल्द्वानी स्थित वन अनुसंधान केंद्र में कई विलुप्त हो रहे पौधों को संरक्षित करने का काम किया जा रहा है. अनुसंधान केंद्र ने जैव विविधता और औषधि के क्षेत्र में भी बेहतर काम कर औषधि से भरपूर कई प्रजातियों को भी संरक्षित किया है. इसी के तहत अनुसंधान केंद्र ने लता वाटिका तैयार की है. लता युक्त (बेल नुमा) 40 प्रजातियों के पौधों को संरक्षित करने का काम किया है, जो औषधि से भरपूर हैं, जिसमें मुख्य रूप से मालू पत्ता, विदारा, गिलोय, दम बूटी, बिदारी कंद, गंजारु सहित कई औषधि युक्त जंगली बेलें हैं, जिन को संरक्षित करने का काम किया जा रहा है. उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की बाल मिठाई तो दुनियाभर में मशहूर है ही, लेकिन आज हम आपको यहां की एक और ऐसी मिठाई के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी दीवानगी बाल मिठाई से जरा भी कम नहीं है. हम बात कर रहे हैं सिंगौड़ी की. यह मिठाई शुद्ध खोया से बनाई जाती है और इसमें चीनी के अलावा कुछ और नहीं मिलाया जाता. हालांकि अब कई दुकानदार इसमें ड्राई फ्रूट्स भी डालने लगे हैं. इसका टेस्ट ऐसा होता है कि आप बाकी मिठाई भूल जाते हैं. सिंगौड़ी के लिए मालू के पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है. मिठाई को इसी पत्ते में भरा जाता है और कोन शेप में तैयार किया जाता है. अल्मोड़ा की मशहूर मिठाई की दुकान खीम सिंह मोहन सिंह के अलावा अन्य दुकानों पर भी यह मिठाई मिल जाएगी. इसकी कीमत 380 रुपये किलो है. स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले पर्यटक भी सिंगौड़ी अपने साथ लेकर जाते हैं.कोलकाता से आए पर्यटक ने कहा कि उन्होंने खीम सिंह मोहन सिंह के वहां से सिंगौड़ी का स्वाद चखा. यह मिठाई बहुत स्वादिष्ट है. इस मिठाई की खास बात यह है कि बहुत ही कम मीठा इसमें मिक्स किया जाता है. जिस तरीके से पहले मिठाइयों में टेस्ट था,वह टेस्ट अब कम जगहों पर देखने को मिलता है, पर यहां पर वह टेस्ट अभी भी बरकरार है. इस मिठाई को वह कोलकाता भी लेकर जा रहे हैं. अल्मोड़ा की बाल मिठाई के साथ यहां की चॉकलेट और सिंगौड़ी भी काफी मशहूर है. इसे बनाने के लिए शुद्ध खोया का प्रयोग किया जाता है और इसमें चीनी के अलावा कई दुकानदार ड्राईफ्रूट्स भी डालते हैं. सिंगौड़ी को भरने के लिए मालू के पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसके स्वाद को और भी बढ़ा देता है. ठंड के समय में यह मिठाई 3 से 4 दिन चल जाती है और गर्मियों के समय में 1 से 2 दिन इसकी गुणवत्ता बनी रहती है. इसकी कीमत ₹380 किलो है. औषधीय गुणों से भरपूर और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाने वाले मालू के पत्तों को वेद-पुराणों में शुद्ध व शुभ माना गया है. पहाड़ों में आज भी इस पत्ते का खूब प्रयोग किया जाता है. साधु-संत इस पत्ते को बेहद शुद्ध मानते हैं. किसी भी संस्कार में इसका उपयोग जरूर किया जाता है.गौरतलब है कि मालू का पत्ता प्लास्टिक डिस्पोजल आइटम्स का बेहतर विकल्प बन सकता है. पहाड़ों में मालू के पेड़ काफी संख्या में हैं और अगर सरकार इस ओर ध्यान दे, तो हमें प्लास्टिक डिस्पोजल से छुटकारा मिल सकता है, हम पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं, वहीं इससे स्थानीय लोगों को भी रोजगार से जोड़ा जा सकता है.। दक्षिण भारतीय क्षेत्रों में केले के पत्तों पर भोजन करने की परम्परा है। वैसे ही पर्वतीय क्षेत्रों में मालू का पत्ता भोजन परोसने में प्रयोग आता रहा है। उत्तराखंड की देवभूमि अपने प्राकृतिक वैभव,सांस्कृतिक पवित्रता और पारंपरिक जीवनशैली के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसी आध्यात्मिक और प्राकृतिक धरोहर में एक अनमोल उपहार छिपा है-मालू का पत्ता,जिससे बनने वाले पत्तल-डोने सदियों से पहाड़ की संस्कृति,स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का आधार रहे हैं। आज जब दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ रही है,तब उत्तराखंड का यह प्राकृतिक विकल्प न केवल पर्यावरण हितैषी है,बल्कि ग्रामीण परिवारों के लिए मजबूत रोजगार का स्रोत भी बन सकता है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि आधुनिकता की दौड़ में यह परंपरा और मालू वृक्ष विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। मालू एक चौड़ी,मजबूत,आकर्षक और सुगंधयुक्त पत्तियों वाला पर्वतीय पौधा है। वैज्ञानिक रूप से इसे बौहिनिया वल्ली के नाम से जाना जाता है,जिसका हिंदी रूप बौहिनिया बेल कहा जा सकता है। मालू वृक्ष न केवल पत्तल बनाने के लिए उपयुक्त है,बल्कि मिट्टी को कटाव से बचाता हैं,पहाड़ी ढलानों को मजबूती देता हैजंगलों की जैव विविधता बढ़ाता है,प्राकृतिक खाद तैयार करने में मदद करता है। देवभूमि में मालू का धार्मिक,सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व मालू पत्ते का उपयोग इन अवसरों पर विशेष रूप से होता है विवाह और शुभ मांगलिक कार्यों में भोजन परोसने हेतु,मुंडन संस्कार और देवपूजन में,जन्मदिन,गृहप्रवेश और धार्मिक पर्वों में,देवी-देवताओं की थाली सजाने में,श्राद्ध कर्मों में पितरों को अर्पण हेतु,उड़द दाल की पकोड़ी जैसे विशेष व्यंजन बनाते समय,जब अधिक पत्तलों की जरूरत होती है,आज भी पहाड़ों में बुजुर्ग लोग दूर जंगलों से मालू के पत्ते लाते हैं क्योंकि इसे पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। स्वास्थ्य के लिहाज से मालू पत्तल-एक वरदान 100 प्रतिशत प्राकृतिक और रसायनमुक्त मालू पत्तों में किसी भी प्रकार का रासायनिक तत्व नहीं होता,जिससे भोजन सुरक्षित और पूर्णतः प्राकृतिक रहता है,प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण चौड़ी पत्तियों में रोग-प्रतिरोधक तत्व भोजन को बैक्टीरिया से सुरक्षित रखते हैं,भोजन का स्वाद बढ़ाने वाला प्राकृतिक सुगंधकारी पत्ता,मालू पत्ते पर परोसे भोजन में हल्की प्राकृतिक सुगंध मिलती है जो स्वाद को दोगुना कर देती है। गर्म भोजन परोसने में भी सुरक्षित,प्लास्टिक या थर्मोकोल की तरह यह पिघलता नहीं और न ही कोई विषाक्त तत्व छोड़ता है। पोषण और औषधीय गुणों से भरपूर। अनुसंधानों के अनुसार मालू पत्ते में 23.26% लिपिड,24% प्रोटीन,6.2% फाइबर पाया जाता है। इसके बीज और छाल में भी औषधीय गुण हैं,जिनका उपयोग खांसी,जुकाम,पाचन सुधार में किया जाता है। मालू के पत्ते,बीज और छाल को पारंपरिक आयुर्वेद में एंटीऑक्सीडेंट और एंटीसेप्टिक गुणों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उत्तराखंड की प्रसिद्ध सिंगौरी मिठाई (खोया और ड्राईफ्रूट मिश्रित) को आज भी मालू के पत्तों में लपेटकर बेचा जाता है। इससे मिठाई लंबे समय तक ताजी रहती है,प्राकृतिक सुगंध मिलती है और प्लास्टिक पैकिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती,पहाड़ों में चाट और अन्य खानपान में भी परंपरागत रूप से मालू के पत्तों का खूब उपयोग होता था। मालू से बने घरेलू पारंपरिक उत्पाद-एक संपूर्ण लोक कारीगरी ख्वाका-दालों और अनाज को सुरक्षित रखने के लिए मालू पत्तों और डंठलों से बनाया जाने वाला पारंपरिक भंडार,बारिश से बचने के लिए स्थानीय लोगों द्वारा पत्तियों से बनाया जाने वाला अस्थायी छाता,बेल की छाल से कालीन/चटाई-बेहद मजबूत और टिकाऊ,ये सभी उत्पाद बताते हैं कि मालू उत्तराखंड के पारंपरिक ग्रामीण जीवन का एक व्यापक स्तंभ था। पहाड़ों में कई परिवार विशेषकर महिलाएं समूह बनाकर पत्तल-डोना बनाती थीं और अच्छे दाम पर बेचकर घर की आर्थिक स्थिति मजबूत करती थीं। आज प्लास्टिक प्रतिबंध के बाद प्राकृतिक पत्तलों की मांग कई दर्जन गुना बढ़ चुकी है। रोजगार बढ़ाने के प्रमुख आधार स्वयं सहायता समूह बनाकर पत्तल निर्माण,मालू पौधरोपण कर कच्चा माल स्वयं तैयार करना,स्थानीय मेलों,होटलों,मंदिरों और सरकारी आयोजनों में व्यापक मांग,शहरों तक सप्लाई कर अधिक लाभ,कम लागत में अधिक उत्पादन और आय,मालू का एक पौधा 20-25 वर्ष तक लगातार पत्तियाँ देता है-अर्थात लंबे समय तक स्थायी और विश्वसनीय आय का स्रोत। विलुप्ति की कगार पर मालू-संरक्षण की तात्कालिक आवश्यकता,बढ़ते कंक्रीटीकरण,चरम कटाव,जंगलों की कटाई और उपेक्षा के कारण मालू वृक्ष तेजी से खत्म हो रहे हैं। यदि संरक्षण कार्य तुरंत नहीं किए गए,तो आने वाली पीढ़ियां पत्तल-डोना की इस अनमोल परंपरा को केवल पुस्तकों में पढ़ेंगी। सरकार और समाज को उठाने चाहिए ये प्रमुख कदम ग्रामीण कृषकों को निःशुल्क मालू पौधे उपलब्ध कराए जाएं,वन विभाग द्वारा विशेष मालू संरक्षण और पौधारोपण अभियान,महिलाओं को पत्तल-प्रेस मशीनें सब्सिडी पर उपलब्ध हों,सरकारी आयोजनों,स्कूलों और आश्रमों में स्थानीय पत्तलों को प्राथमिकता,हिमालयी लोक उत्पाद बाजार स्थापित कर बिक्री सुनिश्चित की जाए। इन प्रयासों से न केवल रोजगार बढ़ेगा,बल्कि पर्यावरण संरक्षण,सांस्कृतिक पुनर्जीवन,स्थानीय अर्थव्यवस्था तीनों को मजबूती मिलेगी। मालू पत्तल-डोना उत्तराखंड का सिर्फ एक प्राकृतिक उत्पाद नहीं बल्कि हमारी संस्कृति,परंपरा,स्वास्थ्य,पर्यावरण और अर्थव्यवस्था का आधार है। अब समय है कि देवभूमि अपनी इस धरोहर को पुनर्जीवित करे और इसे आधुनिक मांग के अनुरूप लोकल से ग्लोबल बनाए। यदि सरकार और ग्रामीण समाज मिलकर प्रयास करें तो मालू पत्तल उद्योग हजारों परिवारों की आर्थिक दिशा बदल सकता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व का विषय बन सकता है। मालू उत्तराखंड में निम्न ऊंचाई से मध्य ऊंचाई तक के जंगलों में बेल पर लगा पाया जाता है। यह वैज्ञानिक रूप से फैबेसी कुल का पौधा है। इसमें एंटी बैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं। भोजन के बाद मिट्टी में दबा देने से खाद के प्रयोग में लाया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार प्राकृतिक पत्तों में भोजन करने से उसके औषधीय गुण हमारे स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाते है। प्राचीन समय में मालू का इस्तेमाल अतिसार व बुखार के दौरान टॉनिक के रूप में किया जाता था। जिसमें कई रासायनिक तत्व पाये जाते हैं। मालू के पौष्टिक गुणों की बात की जाये तो इसमें 24.59 प्रतिशत प्रोटीन, 6.21 प्रतिशत फाइबर व 23.26 प्रतिशत लिपिड पाया जाता है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं












