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भारतीय नव वर्ष का शुभारंभ सनातनी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मनाया जाता है

18/03/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत में विक्रम संवत के आधार पर बनाया गया पंचांग प्रयुक्त होता है। इसके आधार पर ही हिंदू धर्म के त्योहार और तिथियों का निर्धारण होता है। विक्रम संवत हमारे ऋतुचक्र से भी जुड़ा हुआ है। इस समय वसंत की शुरुआत होती है। प्रकृति में नए रंगों से खिल जाती है। पेड़ों में नए पत्ते आते हैं। इसी नवागमन के साथ विक्रम संवत की भी शुरुआत होती है। खास बात यह है कि इसे ऋषि मुनियों ने समावेशी तरीके से तैयार किया है इसलिए यह व्यक्ति विशेष से चलायमाननहींहै।नवसंवत्सर की पूजा का महत्व है। हिंदू धर्म में हर मांगलिक और धार्मिक कार्य में संवत के नाम का प्रयोग किया जाता है। संवत्सर की प्रतिमा स्थापित करके उसकी पूजा करने का भी महत्व है। संवत्सर से आने वाला साल सुखमय होने और सभी दुख-परेशानियां, अनिष्ट दूर करने की प्रार्थना की जाती है।विक्रम संवत भारत के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण पंचांगों में से एक है, जिसका उपयोग हिंदू समुदाय में धार्मिक त्योहारों, कृषि गतिविधियों और सांस्कृतिक समारोहों की महत्वपूर्ण तिथियों को निर्धारित करने के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। भारतीय विरासत से अपने गहरे जुड़ाव के लिए प्रसिद्ध, यह पंचांग भारतीय उपमहाद्वीप के समृद्ध इतिहास का प्रमाण है और सदियों से लाखों लोगों के जीवन में इसका महत्वपूर्ण स्थान रहा हैविक्रम संवत पंचांग 57 ईसा पूर्व का है और इसकी स्थापना उज्जैन के महान भारतीय राजा विक्रमादित्य ने की थी । लोककथाओं के अनुसार, राजा विक्रमादित्य ने अपने राज्य पर आक्रमण करने वाले शक शासकों को परास्त किया था और उनकी इस विजय की स्मृति में एक पंचांग की स्थापना की गई थी। इस पंचांग का नाम वीरता, न्याय और ज्ञान के प्रतीक राजा विक्रमादित्य के सम्मान में रखा गया है, जिनके शासनकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है।विक्रम संवत कैलेंडर की उत्पत्ति हिंदू पौराणिक कथाओं और ब्रह्मांडीय चक्रों में विश्वास से गहराई से जुड़ी हुई है। ग्रेगोरियन कैलेंडर, जो सौर चक्र पर आधारित है, के विपरीत, विक्रम संवत एक चंद्र-सौर कैलेंडर है , जिसका अर्थ है कि इसमें चंद्रमा और सूर्य दोनों की गतियों को शामिल किया गया है। यह अनूठा संयोजन कैलेंडर को चंद्रमा और सूर्य की प्राकृतिक लय को ध्यान में रखने में सक्षम बनाता है, जिससे यह कृषि पद्धतियों और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के लिए अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है।विक्रम संवत पंचांग की शुरुआत, 57 ईसा पूर्व, भारतीय इतिहास में एक नए युग की आरंभिक तिथि है, जो साहित्य, विज्ञान, कला और संस्कृति के उत्कर्ष से परिपूर्ण है। वर्षों से, क्षेत्रीय विविधताओं को ध्यान में रखते हुए पंचांग में बदलाव हुए हैं और यह विश्वभर के हिंदुओं के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीक बन गया है।विक्रम संवत पंचांग चंद्र माह पर आधारित है, लेकिन यह सौर वर्ष के साथ समकालिक है, इसलिए इसे चंद्र-सौर पंचांग कहा जाता है । इसमें 12 चंद्र माह होते हैं , जिनमें से प्रत्येक की शुरुआत अमावस्या से होती है । चंद्र माह को दो पखवाड़ों में विभाजित किया गया है: शुक्ल पक्ष (चंद्रमा का बढ़ता चरण) और कृष्ण पक्ष (चंद्रमा का घटता चरण)। इनमें से प्रत्येक चरण लगभग 15 दिनों का होता है, जिससे एक माह में कुल 30 दिन होते हैं ।विक्रम संवत पंचांग में एक वर्ष में 354 दिन होते हैं , जो सौर वर्ष के 365 दिनों से 11 दिन कम है। इस अंतर को पाटने और पंचांग को सौर वर्ष के अनुरूप बनाने के लिए, प्रत्येक कुछ वर्षों में अधिक मास नामक एक अतिरिक्त माह जोड़ा जाता है। यह समायोजन सुनिश्चित करता है कि पंचांग बदलते मौसमों के साथ तालमेल बनाए रखे और कृषि गतिविधियों के लिए उपयुक्त हो।विक्रम संवत पंचांग के अनुसार, हिंदू नव वर्ष चैत्र महीने से शुरू होता है , जो आमतौर पर मार्च या अप्रैल में पड़ता है। भारत के विभिन्न हिस्सों में हिंदू नव वर्ष को बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है और इसे विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है, जबकि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इसे उगादी के नाम से जाना जाता  राजस्थान और गुजरात में इसे थपना या वर्षा प्रतिपदा कहा जाता है ।महाराष्ट्र में नव वर्ष की शुरुआत गुड़ी (कपड़े और बर्तन से सजा हुआ एक खंभा) लगाने से होती है , जो विजय और समृद्धि का प्रतीक है। लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, नए कपड़े पहनते हैं, विशेष पकवान बनाते हैं और नव वर्ष का स्वागत करने के लिए रीति-रिवाजों और प्रार्थनाओं में भाग लेते हैं। यह त्योहार लोगों को बीते वर्ष पर विचार करने, नए लक्ष्य निर्धारित करने और स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर भी प्रदान करता है।विक्रम संवत 2080 वर्तमान हिंदू नव वर्ष का प्रतीक है, जिसे विभिन्न रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और धार्मिक समारोहों के साथ मनाया जाता है। यह पारिवारिक मिलन, सामूहिक प्रार्थना और प्रियजनों के बीच शुभकामनाओं और सद्भावनाओं के आदान-प्रदान का समय है।आधुनिक युग में, आधिकारिक और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर के व्यापक उपयोग के बावजूद, विक्रम संवत लाखों लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है। यह कैलेंडर भारत की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव का माध्यम है और इसका पालन करने वालों को पहचान और निरंतरता का बोध कराता है।विक्रम संवत पारंपरिक ज्ञान और प्रथाओं को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। मानव गतिविधियों को प्राकृतिक चक्रों के साथ जोड़कर, यह कैलेंडर पर्यावरण के अनुकूल एक सतत जीवनशैली को बढ़ावा देता है। यह बात आज विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।इसके अतिरिक्त, विक्रम संवत कैलेंडर सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक सामंजस्य को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कैलेंडर के आधार पर मनाए जाने वाले त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और कृषि गतिविधियाँ लोगों को एक साथ लाती हैं और सामाजिक संबंधों को मजबूत करती हैं। यह कैलेंडर सामुदायिक उत्सवों के लिए एक ढांचा प्रदान करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सांस्कृतिक परंपराएँ पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहें।विक्रम संवत महज एक कैलेंडर से कहीं अधिक हैयह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, प्राचीन परंपराओं की बुद्धिमत्ता का प्रमाण है और प्राकृतिक जगत के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए जीवन जीने का मार्गदर्शक है। पौराणिक राजा विक्रमादित्य द्वारा स्थापित यह कैलेंडर सदियों से विकसित होकर हिंदू संस्कृति और समाज का अभिन्न अंग बन गया है।दिवाली और होली जैसे प्रमुख त्योहारों की तिथियों के निर्धारण से लेकर कृषि पद्धतियों और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के मार्गदर्शन तक, विक्रम संवत लाखों लोगों के जीवन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी चंद्र-सौर संरचना, प्राकृतिक चक्रों के साथ इसका सामंजस्य और हिंदू पौराणिक कथाओं से इसका गहरा संबंध इसे जीवन की लय को समझने का एक अनूठा और अमूल्य साधन बनाते हैं।जैसे-जैसे हम हिंदू नव वर्ष मनाते हैं, परंपराओं का सम्मान करते हैं और नई शुरुआत का स्वागत करते हैं, विक्रम संवत हमें एकता, कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा जैसे शाश्वत मूल्यों की याद दिलाता है। यह एक ऐसी विरासत है जो समय की कसौटी पर खरी उतरी है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। भारतीय ज्ञान पर‍ंपरा की शुरुआत विश्‍व पटल पर नजर आती है. इसका उदाहरण जब अरब ने गणित को भारत से लिया. आज भी आधुनिक विज्ञान में बहुत से ऐसे रहस्‍य हैं, जिसमें शोध की आवश्‍यकता है. हमारा वैदिक विज्ञान आधुनिक विज्ञान के साथ मिलकर नई दिशा प्रदान कर सकता है.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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