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मानसून की चुनौती आपदा नहीं दावों और सिस्टम की बेरूखी अब तैयारी की परीक्षा

18/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
देशभर में सक्रिय दक्षिण-पश्चिम मानसून ने कई राज्यों में भारी तबाही मचा रहा है। पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में लगातार हो रही बारिश से भूस्खलन और बाढ़ जैसी स्थिति बनी हुई है। यहां 300 से अधिक सड़कें बंद हैं और कई इलाकों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है। इस बीच, मौसम विभाग ने मैदानी राज्यों में अगले कुछ दिनों तक कम बारिश होने का अनुमान जताया है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार सतर्कता बरतने की सलाह दी है।उत्तराखंड में तीन राष्ट्रीय राजमार्ग सहित 120 सड़कें, जबकि हिमाचल प्रदेश में 189 सड़कें, 146 से ज्यादा बिजली के ट्रांसफॉर्मर और 104 पेयजल योजनाएं बंद हैं। वहीं, यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा बह जाने से फंसे करीब 100 श्रद्धालुओं को रस्सियों के सहारे सुरक्षित निकाला गया। बारिश के कारण सड़कें खोलने का काम प्रभावित हो रहा है।वर्तमान मानसून संकट में अप्रत्याशित वर्षा पैटर्न के कारण गंभीर व्यवधान उत्पन्न होते हैं, जिससे विनाशकारी बाढ़ और लंबे समय तक चलने वाले सूखे की चरम स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। इसके प्रमुख पर्यावरणीय प्रभावों में अनियमित वर्षा की घटनाएं शामिल हैं – नियमित मौसमी बौछारों की जगह मूसलाधार बारिश की छोटी-छोटी बौछारें आ रही हैं। उत्तराखंड में यह स्थिति हर मौसम में बढ़ती जा रही है। भीषण बाढ़ के कारण, पुराने जल निकासी तंत्र और अचानक होने वाली भारी बारिश से शहरी क्षेत्र जलमग्न हो जाते हैं।कई स्थानों पर, बारिश के बीच लंबे समय तक सूखे के कारण भूजल स्तर कम हो जाता है। भीषण गर्मी से हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना तेज हो जाता है, जिससे नदियों में बाढ़ की स्थिति और बिगड़ जाती है। नदी किनारे बसी कई बस्तियाँ इसके दुष्परिणाम भुगतती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारी बहाव से उपजाऊ ऊपरी मिट्टी बह जाती है और भूस्खलन होता है। अनियमित बारिश से गर्मियों की फसलें नष्ट हो जाती हैं, जिससे बाजारों में खाद्य पदार्थों की कीमतें सीधे तौर पर बढ़ जाती हैं, जिसके कारण किसानों को अपने निवेश का नुकसान होता है, जिससे आर्थिक संकट और गरीबी बढ़ जाती है।देशभर में बाढ़ से अरबों रुपये के बुनियादी ढांचे, घर और व्यवसाय नष्ट हो जाते हैं। अगर अपेक्षित बारिश नहीं होती है, तो बांधों में जलस्तर कम होने से मांग के चरम समय में पनबिजली उत्पादन बाधित हो जाता है। साथ ही, भारी बारिश का पानी पीने के पानी के जलभंडारों को भरने के बजाय बह जाता है, जो ऐसे जलभंडारों पर निर्भर क्षेत्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मैदानी इलाकों में कई जगहों पर रुके हुए पानी से डेंगू, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है। बड़े पैमाने पर विस्थापन भी होता है – बाढ़ और भूस्खलन के कारण हजारों लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। मानसून में देरी से जानलेवा लू भी लंबी चलती है।इसलिए, कुछ महत्वपूर्ण समाधानों की आवश्यकता है, जिन पर नगर योजनाकारों को विशेष ध्यान देना चाहिए। जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बुनियादी ढांचे की आवश्यकता है – बेहतर शहरी जल निकासी व्यवस्था और जल-अवशोषक प्रणाली का निर्माण करना। कृषि को सूखा-प्रतिरोधी फसलों और ड्रिप सिंचाई प्रणालियों की ओर रुख करना होगा। जल संचयन को एक सामान्य प्रक्रिया बनाना होगा, और भारी मात्रा में बहने वाले पानी को इकट्ठा करने के लिए स्थानीय वर्षा जल भंडारण को बढ़ाना होगा।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जमीनी स्तर तक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लागू होनी चाहिए, जिससे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से समय रहते निकासी सुनिश्चित हो सके। देश के हर हिस्से में इन और अन्य उपायों की आवश्यकता नहीं हो सकती है, लेकिन स्थिति की बेहतर समझ से जान और माल की रक्षा के लिए आवश्यक प्रतिक्रिया सुनिश्चित होगी।उत्तराखंड में भूस्खलन और बारिश से सैकड़ों सड़कें बंद हो गईं। उत्तराखंड सबसे अधिक प्रभावित हुआ, जहां कई जिलों में भूस्खलन, सड़कें बंद होने, नदियों का जलस्तर बढ़ने और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा हैभारी बारिश की चेतावनी को देखते हुए मौसम विज्ञान केंद्र ने स्थानीय लोगों और सैलानियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में भूस्खलन और मिट्टी धंसने की संभावना है। पहाड़ी रास्तों पर यात्रा करते समय सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। निचले इलाकों में जलभराव और सड़कों पर फिसलन के कारण यातायात प्रभावित हो सकता है। वाहन चालकों को कम दृश्यता में सावधानी से चलने को कहा गया है। नदी-नालों के पास जाने या नौका विहार करने से बचने की भी सलाह दी गई है।मानसून के दौरान होने वाली परेशानी को अक्सर प्राकृतिक आपदा मानकर छोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है। तेज वर्षा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, पर उसके प्रभाव को योजनाबद्ध ढंग से काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि जल निकासी की व्यवस्था मजबूत हो, नालों की नियमित सफाई हो, वर्षा जल के प्राकृतिक मार्ग सुरक्षित रहें और निर्माण कार्य वैज्ञानिक मानकों के अनुसार किए जाएं, तो नुकसान बहुत कम हो सकता है। दुर्भाग्य से अनेक स्थानों पर इन मूलभूत बातों की अनदेखी वर्षों से होती रही है। हर वर्ष वर्षा से पहले नगर निकाय और संबंधित विभाग तैयारियों के बड़े दावे करते हैं। सफाई अभियान चलाने, पंपों की व्यवस्था करने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने की घोषणाएं होती हैं। मगर पहली तेज बारिश के साथ ही अधिकांश दावे खोखले साबित हो जाते हैं। जिन स्थानों पर हर वर्ष जलभराव होता है, वहीं सबसे पहले यातायात ठप पड़ जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं और उनका प्रभाव धरातल पर नहीं दिखता।शहरी विस्तार भी इस समस्या का बड़ा कारण बन चुका है। अनेक शहरों में तालाब, आर्द्रभूमियां और प्राकृतिक जलमार्ग अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। उनके स्थान पर इमारतें और सड़कें बना दी गईं, जिससे वर्षा का पानी निकलने का स्वाभाविक रास्ता समाप्त हो गया। परिणाम यह हुआ कि थोड़ी देर की वर्षा भी बड़े क्षेत्रों को जलमग्न कर देती है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप अधिक अनिश्चित अवश्य हुआ है, पर अधिकांश समस्याएं अव्यवस्थित विकास और कमजोर शहरी नियोजन से जुड़ी हैं।देश ने पिछले वर्षों में राजमार्गों, पुलों, हवाई अड्डों और अनेक आधुनिक परियोजनाओं के निर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है। इससे यह सिद्ध होता है कि संसाधनों, तकनीक और अभियंत्रिकी क्षमता की कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि यही गंभीरता वर्षा प्रबंधन, जल निकासी तंत्र, भवन निर्माण नियमों और पर्यावरण संरक्षण में भी दिखाई दे। विकास का अर्थ भव्य निर्माण भर नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना भी है जो कठिन परिस्थितियों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। प्राकृतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण भी चिंता का विषय है। पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जबकि महानगरों में जलभराव सामान्य समस्या बन चुका है। उत्तराखंड के जोशीमठ में भूमि धंसने की घटना और बेंगलुरु जैसे बड़े नगरों में बार-बार होने वाला जलभराव यह संकेत देता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य की चुनौतियों का सामना करना कठिन होगा।समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष जवाबदेही का अभाव भी है। हर बड़ी घटना के बाद जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और सुधार के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन अगले वर्ष स्थिति फिर वैसी ही दिखाई देती है। आपदा आने के बाद राहत कार्य आवश्यक हैं, पर उससे अधिक महत्वपूर्ण है ऐसी व्यवस्था विकसित करना जिससे नुकसान होने की संभावना पहले ही कम हो जाए। रोकथाम पर निवेश हमेशा राहत कार्यों की तुलना में अधिक प्रभावी और लाभकारी सिद्ध होता हैआज आवश्यकता अल्पकालिक उपायों की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सोच की है। नगर नियोजन, जल संरक्षण, प्राकृतिक जलमार्गों की सुरक्षा, नियमित रखरखाव, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और निर्माण नियमों का कठोर पालन भविष्य की प्राथमिकता बनना चाहिए। जब तक इन विषयों पर पूरे वर्ष गंभीरता से कार्य नहीं होगा, तब तक मानसून के साथ आने वाली परेशानियां भी हर वर्ष दोहराती रहेंगीभारत के लिए मानसून किसी संकट का प्रतीक नहीं है। यह जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। चुनौती वर्षा नहीं, बल्कि हमारी तैयारी और व्यवस्था की है। यदि नीति निर्माण में दूरदृष्टि, प्रशासन में जवाबदेही और विकास में पर्यावरणीय संतुलन को समान महत्व दिया जाए, तो मानसून फिर से समृद्धि का संदेशवाहक बन सकता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि वह अनुमानित चुनौतियों का सामना पहले से कितनी तैयारी के साथ करता है। अब समय आ गया है कि मानसून को दोष देने के स्थान पर व्यवस्था को अधिक सक्षम और उत्तरदायी बनाया जाए।मानसून के दौरान होने वाली परेशानी को अक्सर प्राकृतिक आपदा मानकर छोड़ दिया जाता है, जबकि भारत के लिए मानसून किसी संकट का प्रतीक नहीं है। यह जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। चुनौती वर्षा नहीं, बल्कि हमारी तैयारी और व्यवस्था की है। यदि नीति निर्माण में दूरदृष्टि, प्रशासन में जवाबदेही और विकास में पर्यावरणीय संतुलन को समान महत्व दिया जाए, तो मानसून फिर से समृद्धि का संदेशवाहक बन सकता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि वह अनुमानित चुनौतियों का सामना पहले से कितनी तैयारी के साथ करता है। अब समय आ गया है कि मानसून को दोष देने के स्थान पर व्यवस्था को अधिक सक्षम और उत्तरदायी बनाया जाए।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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