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जनप्रतिनिधियों के दावों और सिस्टम की बेरूखी में फंसा कोपा मुंसारी गांव

18/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जिला उधम सिंह नगर, कृषि की प्रचुरता और औद्योगिक गतिशीलता से भरपूर एक जिला है, जो उत्तराखंड के हरे-भरे तराई क्षेत्र में स्थित है।अक्टूबर 1995 में स्थापित,पूर्व नैनीताल जिले से अलग होकर, हमारे जिले का नाम श्रद्धेय स्वतंत्रता सेनानी, शहीद उधम सिंह के सम्मान में रखा गया है, जो साहस और अटूट भावना के प्रतीक हैं।जिले की गदरपुर विधानसभा का कोपा मुंसारी व हरिपुरा जलाशय गांव आजादी के बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. आधुनिक भारत की विकास यात्रा के बीच यह गांव आज भी ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीने को मजबूर है, जहां रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोगों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है. करीब 5 हजार की आबादी वाले इस गांव के लोगों के लिए हर दिन की शुरुआत नाव से जलाशय पार करने के साथ होती है.ग्रामीण ने बताया कि गांव तक पहुंचने के लिए करीब 500 मीटर चौड़े हरिपुरा जलाशय को नाव से पार करना पड़ता है. बरसात के मौसम में यह सफर और भी खतरनाक हो जाता है. तेज हवाओं और जलस्तर बढ़ने के कारण हर दिन दुर्घटना का खतरा बना रहता है. गांव में आने-जाने का यही एकमात्र रास्ता होने के कारण बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और किसान सभी इसी पर निर्भर हैं. ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आज तक पक्की सड़क नहीं बन सकी है. स्वास्थ्य सेवाओं की भी भारी कमी है. गांव में अस्पताल नहीं होने के कारण किसी भी मरीज को उपचार के लिए जलाशय पार कर बाहर जाना पड़ता है. गर्भवती महिलाओं, गंभीर रूप से बीमार मरीजों और छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है. कई बार समय पर इलाज न मिलने से लोगों की जान पर बन आती है. शिक्षा व्यवस्था भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चिंता का विषय है. गांव में बेहतर शिक्षा की सुविधा नहीं होने के कारण बच्चों को भी रोज नाव के सहारे बाहर जाना पड़ता है. खराब मौसम में अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है. गांव की एक बुजुर्ग महिला ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि वर्ष 2020 में उनकी बहू दवाई लेने के लिए नाव से बाहर जा रही थी, लेकिन रास्ते में नाव हादसे का शिकार हो गई और उसकी मौत हो गई. इस दर्दनाक घटना को याद करते हुए महिला की आंखें नम हो जाती हैं. ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सरकारी उपेक्षा का परिणाम है. ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने कई बार मुख्यमंत्री और क्षेत्रीय विधायक से पुल और सड़क निर्माण की मांग की. जनप्रतिनिधियों के समक्ष अपनी समस्याएं भी रखीं, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. उनका कहना है कि चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर उपेक्षा का शिकार हो जाता है.  आखिरकार पांच वर्ष बाद वो घड़ी आ ही गयी, जब जनता जनता नेताओं की भाग्य विधाता बनेगी। छोटे से काम के लिए लगातार टहलाने वाले नेता दर-दर जाकर खुद के लिए वोट डालने की गुहार लगाएंगे। लेकिन अब सोच लिया है वोट उसी को दिया जाएगा जो नेता जीतने के बाद सुख-दुख में जनता के साथ रहेगा। सभी नेता केवल विकास की बात करते हैं और विकास के लिए पूर्व में किए गए अपने काम गिनाते हैं। देश के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक हर कोई विकास की ही बात कर रहा है।पंचायत से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक सभी विकास की ही बात करते हैं। फिर भी यह सोचने वाली बात है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी पूरी तरह से विकास क्यों नहीं कर पाया।  सियासी दल की घोषणाओं पर यकीन करके अपना पांच साल का भविष्य उसके हाथों में सौंपते हैं. पहाड़ पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का काफी अभाव है। जनप्रतिनिधि चुनावी मौसम में विकास के वादे तो करते हैं पर वे हकीकत में कितना उतरते हैं सभी को पता ही है। चुनाव जीतने के बाद जनता से किए गए वादे असल धरातल पर नहीं उतर पाते है। राजनैतिक दल जो दावा नहीं करते हैं आदर्श आधारित, मूल्य आधरित राजनीति करते हैं, ऐसे राजनैतिक दल इनका कोई उसूल नहीं है, वो अपने आप में सेलफिश टाइप राजनैतिक दल हैं, अपनी जरूरतों के हिसाब से चाल-चरित्र और चेहरा बदलते हैं.  सियासी दल की घोषणाओं पर यकीन करके अपना पांच साल का भविष्य उसके हाथों में सौंपते हैं. पहाड़ पर आज भी मूलभूत सुविधाओं का काफी अभाव है। जनप्रतिनिधि चुनावी मौसम में विकास के वादे तो करते हैं पर वे हकीकत में कितना उतरते हैं सभी को पता ही है। चुनाव जीतने के बाद जनता से किए गए वादे असल धरातल पर नहीं उतर पाते है। राजनैतिक दल जो दावा नहीं करते हैं आदर्श आधारित, मूल्य आधरित राजनीति करते हैं, ऐसे राजनैतिक दल इनका कोई उसूल नहीं है, वो अपने आप में सेलफिश टाइप राजनैतिक दल हैं, अपनी जरूरतों के हिसाब से चाल-चरित्र और चेहरा बदलते हैं. लेकिन सवाल तो यह है कि क्या भविष्य के सुनहरे सपने दिखा कर, वहां रह रहे लोगों की वर्तमान मूलभूत जरूरतों से महरूम रखा जा सकता है ? आखिर वह लोग कौन से जुर्म की सजा इस काले पानी के रूप में भुगत रहे हैं।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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