रिपोर्ट-सत्यपाल नेगी/रुद्रप्रयाग।
जहाँ पूरे विश्व के साथ.साथ हमारे देश.प्रदेश में भी पानी को लेकर गम्भीर चिन्तायें जताई जा रही हैं, धीरे-धीरे पौराणिक जल स्रोत्रों से भी पानी कम व सूखने की कगार पर है। ऐसे में आने वाला समय मानव जाति से लेकर मवेशियों के जीवन पर बड़ा संकट खड़ा करेगा।

जन मैत्री संगठन, जो पहाड़ों में वर्षा जल संरक्षण एवं संग्रहण के कार्यों में जुटा हुआ है, के बची भाई ने एक बहुत महत्वपूर्ण और व्यवहार्य सुझाव दिया है कि जो जितना अधिक पानी खरचता है, वह वर्षा जल संग्रहण से इसे पूरा करे। इसको वास्तव में अनिवार्य करने की आवश्यकता है।
अब तक के उपभोक्तावाद ने पानी को मुफ्त का सामान समझ कर मनमाना उपयोग किया है। नजदीकी स्रोत कम पड़ा तो दूर से लाओ। हजार रुपये की योजना से काम न चला तो हजारों करोड़ की योजना बनाओ की तर्ज पर सारे स्रोत हड़प लिए, धरती के पेट उधेड़ कर उसकी जीवनी शक्ति. भूजल भंडार. खाली कर दिए, लेकिन आसमान से बरसने वाले अकूत पानी को संग्रह करने का कष्ट नहीं उठाया, यह हमारे नियोजन का मूरखपन और पागलपन नहीं तो और क्या है कि उसने मुफ्त में मिलने वाले वर्षा जल को एकत्र और संग्रहीत करने के कारगर प्रयास अभी तक नहीं किए हैं। इसे जल प्रबंधकों की प्राथमिकता में शामिल नहीं किया गया है। पीने के लिये उपचारित जल से कपड़े और गाड़ियां धोई जा रहीं हैं। बागवानी और व्यापार किया जाता है। बड़े.बड़े भवन.स्वामियों को मनमाना पानी उपलब्ध कराने के लिए सरकारें आमजन के हिस्से का पैसा मनमाने ढंग से खर्च करने में जरा भी शर्म.संकोच नहीं करती।
4-5 पीढियां पहले तक के हमारे समाजों ने जल संरक्षण और उपयोग के जो तरीके तलाशे और विकसित किये थे, उन्हें हमने प्रोद्यौगिकी के विस्तार के साथ आधुनिक बनाने में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई, जितनी खर्चीली तकनीकों के उपयोग व विकास में दिखाई है। इसे कोई राजनेता अपनी कार्ययोजनाओं और राजनीतिक दल अपने घोषणा.पत्र का हिस्सा बनाने को तैयार नहीं है।
वही 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में सामाजिक कार्यों की अग्रणी संस्था लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के निदेशक और पर्यावरणवादी डॉ रवि चोपड़ा के नेतृत्व में जल संस्कृति अभियान के अंतर्गत राजनीतिक दलों से अपील की गई थी कि वे अपने घोषणा.पत्रों में उत्तराखण्ड की जल नीति का मुद्दा भी शामिल करें, लेकिन यह नहीं किया गया। जल संस्कृति अभियान द्वारा पूरे उत्तराखण्ड के विचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ विचार.विमर्श के द्वारा उत्तराखण्ड की जलनीति का मसौदा तैयार कर मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवाड़ी जी को सौंपा गया।
उन्होंने उसकी प्रशंसा की और राज्य में लागू करने की घोषणा भी की लेकिन किया नहीं। जल संस्कृति पत्रिका, जिसके सम्पादन की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई थी, ने अनेक विद्वानों के सहयोग से उत्तराखण्ड की उन्नत जल प्रबंधन.परम्पराओं का प्रकाशन किया और इसे आगे बढ़ाने हेतु जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन राज और समाज.दोनों ने उससे सीख नहीं ली।
जन मैत्री संगठन व भाई बची सिंह बिष्ट समेत अनेक लोग जल के संरक्षण.संग्रहण में लगे हैं।यह बड़ा और बुनियादी काम है। जब भी उत्तराखंडी समाज, मजबूरी में ही सही अपनी जड़ों की ओर लौटेगा, इन कार्यों से सीख लेकर पानी के संरक्षण और समुचित उपयोग की दिशा में प्रवृत्त होगा, यह पक्का विश्वास है।











