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उत्तराखंड के लाल सुंदरलाल बहुगुणा की विरासत

09/01/22 - Updated on 18/01/22
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

पद्म विभूषण सुंदर लाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को टिहरी गढ़वाल के मरोड़ा गांव में हुआ था. 13 साल की उम्र में उनके राजनीतिक करियर शुरुआत हुई. दरअसल, राजनीति में आने के लिए उनके दोस्त श्रीदेव सुमन ने उनको प्रेरित किया था. सुमन गांधीजी के अहिंसा के सिद्धांतों के पक्के अनुयायी थे. सुंदरलाल ने उनसे सीखा कि कैसे अहिंसा के मार्ग से समस्याओं का समाधान करना है. 18 साल की उम्र में वह पढ़ने के लिए लाहौर गए. 23 साल की उम्र में उनका विवाह विमला देवी के साथ हुआ.

1956 में उनकी शादी होने के बाद राजनीतिक जीवन से उन्होंने संन्यास ले लिया. उसके बाद उन्होंने गांव में रहने का फैसला किया और पहाड़ियों में एक आश्रम खोला. उन्होंने टिहरी के आसपास के इलाके में शराब के खिलाफ मोर्चा खोला. पर्यावरण सुरक्षा के लिए 1970 में शुरू हुआ आंदोलन पूरे भारत में फैलने लगा. चिपको आंदोलन उसी का एक हिस्सा था. गढ़वाल हिमालय में पेड़ों के काटने को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन बढ़ रहे थे. 26 मार्च, 1974 को चमोली जिला की ग्रामीण महिलाएं उस समय पेड़ से चिपककर खड़ी हो गईं, जब ठेकेदार के आदमी पेड़ काटने के लिए आए. यह विरोध प्रदर्शन तुरंत पूरे देश में फैल गए.

1980 की शुरुआत में बहुगुणा ने हिमालय की 5000 किलोमीटर की यात्रा की. उन्होंने यात्रा के दौरान गांवों का दौरा किया और लोगों के बीच पर्यावरण सुरक्षा का संदेश फैलाया. उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भेंट की और इंदिरा गांधी से 15 सालों तक के लिए पेड़ों के काटने पर रोक लगाने का आग्रह किया. इसके बाद पेड़ों के काटने पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई.1960 के दशक में उन्होंने अपना ध्यान वन और पेड़ की सुरक्षा पर केंद्रित किया. बहुगुणा ने टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने कई बार भूख हड़ताल की.

तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव के शासनकाल के दौरान उन्होंने डेढ़ महीने तक भूख हड़ताल की थी. सालों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद 2004 में बांध पर फिर से काम शुरू किया गया. उनका कहना है कि इससे सिर्फ धनी किसानों को फायदा होगा और टिहरी के जंगल में बर्बाद हो जाएंगे. उन्होंने कहा कि भले ही बांध भूकंप का सामना कर लेगा, लेकिन यह पहाड़ियां नहीं कर पाएंगे.

उन्होंने कहा कि पहले से ही पहाड़ियों में दरारें पड़ गई हैं. अगर बांध टूटा तो 12 घंटे के अंदर बुलंदशहर तक का इलाका उसमें डूब जाएगा. संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 को ‘अक्षय विकास के लिए बुनियादी विज्ञान का अंतरराष्ट्रीय वर्ष’ (इंटरनेशनल ईयर ऑफ बेसिस साइंसेज फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट) घोषित किया है। अक्षय विकास का मूल मंत्र है पारिस्थितिक विकास। जब इसकी बात चलती है, तो पृथ्वी के भविष्य को संवारने की प्रेरणा देते हुए सुंदरलाल बहुगुणा का पारिस्थितिक योग कर्मी व्यक्तित्व हमारे मस्तिष्क पटल पर उभर आता है। यदि जीवन को ऑक्सीजन की नैसर्गिक आपूर्ति करने वाले वनों के इस प्रहरी ने कोरोना की विषैली लहर में ऑक्सीजन की कमी से अपने जीवन की आहुति न दी होती, तो आज वह अपने जीवन के 95 वसंत पूर्ण कर लेते।

सुंदरलाल बहुगुणा एक ऐसे दार्शनिक हुए, जिन्होंने वनों को ही एक नया आधार दिया है। उनके दर्शन शास्त्र ने पारिस्थितिक पिरामिड के शिखर पर बैठे मानव को उसके अस्तित्व के आधार के दर्शन कराए हैं।पृथ्वी पर जीवन को उसके मूल से जोड़नेवाले बहुगुणा जी ने एक ऐसा दर्शन शास्त्र रचा है, जो स्वयं में कालजयी सिद्ध होगा। उस दर्शन शास्त्र के बिना मानव की जीवन-शून्यता अवश्यंभावी है। इसे प्रकृति के विकास क्रम का लक्ष्य कहें या लाखों अन्य जीव-जंतुओं से चहकती-महकती प्रकृति का अबलापन कि आज संपूर्ण प्रकृति पर मानव का आधिपत्य है। मानव अस्तित्व प्रकृति से है, यह एक सनातन सत्य है। लेकिन इस सत्य पर भारी है एक अर्धसत्य, कि संपूर्ण प्रकृति पर मानव का नियंत्रण है।सुंदरलाल जी का नाम सदैव चिपको आंदोलन से जोड़ा जाता है। यह सत्य है कि अगर चिपको आंदोलन को उनका नेतृत्व न मिलता, तो मांग पूरी होने के साथ आंदोलन मर गया होता।

लेकिन चिपको आंदोलन अमर है। बहुगुणा जी ने चिपको आंदोलन को एक दर्शन में रूपांतरित कर दिया। और यह दर्शन संसार में घर कर गया। इस दर्शन के मूल में वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से सूर्यदेव पृथ्वी पर उतर आते हैं अपनी प्रकाश ऊर्जा को जीव ऊर्जा में रूपांतरित करने के लिए, पृथ्वी पर जीवन प्रवाह स्थापित करने के लिए। यही प्रकाश संश्लेषण है।चिपको आंदोलन से विश्व भर के संवेदनशील लोग जुड़ गए, वैज्ञानिकों से लेकर प्रकृति प्रेमियों, योजनाकारों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं तक ने चिपको आंदोलन को समर्थन दिया और सरकार ने वन कटान पर प्रतिबंध भी लगा दया। इसके पीछे बहुगुणा जी की ओजस्विता और पर्यावरण दार्शनिकता ही थी, जो जनमानस के मन में अंकुरित होने लगी थी।

बहुगुणा जी की सादगी का प्रमाण यह कि उन्होंने कभी चिपको आंदोलन के नेतृत्व का श्रेय नहीं लिया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक खुद को चिपको आंदोलन का एक संदेशवाहक बताते हुए कहा कि इस आंदोलन का नेतृत्व तो पहाड़ की महिलाएं कर रही हैं।बहुगुणा जी के दर्शन से जीवन के यश का झरना फूटता है उनके इस कथन से : ‘जीवन की जय, मृत्यु का क्षय।’ जीवन की जय में उनका केंद्रबिंदु मानव ही नहीं, बल्कि जैव मंडल के सभी जीव-जंतु हैं। मानव जाति का अस्तित्व अन्य सभी जीवों के अस्तित्व पर टिका है। बहुगुणा जी की सोच मानव-केंद्रित नहीं, प्रकृति-केंद्रित है।

यही सोच 1987 की ब्रंटलैंड रिपोर्ट ‘हमारा साझा भविष्य’ में समाहित हुई है, जहां से टिकाऊ विकास जैसी अवधारणा आर्थिक विकास की धुरी बनी।बहुगुणा जी ने हिमालय में बड़े बांध के विरोध में आंदोलन छेड़ा था और उन्हें पर्यावरण, पारिस्थितिकी, समाज और संस्कृति के लिए एक बड़ा खतरा बताया था। भागीरथी पर जब एशिया के सबसे ऊंचे बांध का निर्माण आरंभ हुआ, तो उन्होंने 84 दिन लंबे अपने उपवास और वैज्ञानिक तर्कों के जरिये टिहरी बांध के खतरों के प्रति आगाह किया।

 

उन्होंने नदियों के अविरल बहने की महत्ता भी समझाई। उनके विचारों की छाप दुनिया भर में पड़ी और टिहरी बांध निर्माण पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध भी लगा, पर योजनाकारों, ठेकेदारों, इंजीनियरों और राजनेताओं के गठजोड़ से भागीरथी पर 260.5 मीटर ऊंचा बांध बनकर खड़ा हो गया और बांध के पीछे समुद्र-सी एक झील भी अस्तित्व में आ गई। और उसी के साथ शुरू हुई बहुआयामी संकटों की एक अटूट शृंखला।बहुगुणा जी की दूरदृष्टि देखिए कि विकसित देशों ने बड़े बांधों को बहुआयामी संकटों का कारण मानते हुए तिरस्कृत कर दिया है।अगर हमारी सरकारें बहुगुणा जी की दार्शनिकता को अपनातीं, तो पर्यावरण और पारिस्थितिकीय संकट पराकाष्ठा पर न पहुंच जाते।

देश के स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान देने वाले बहुगुणा जी पर्यावरण विनाश और प्रदूषण से भी देश को स्वतंत्र कराने के लिए आंदोलन करते रहे। पारिस्थितिक दर्शन शास्त्र सुंदरलाल बहुगुणा की एक अनमोल सार्वभौमिक विरासत है, जिसमें सभी संकटों का हल छिपा है। उस संकट का भी, जिसके हल के लिए 2021 में ग्लासगो में विभिन्न राष्ट्राध्यक्ष और वैज्ञानिक दो सप्ताह तक मंथन करते रहे। देश के पर्यावरण को संरक्षित करने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले विश्व विख्यात पर्यावरणविद्, पद्म विभूषण सुंदरलाल बहुगुणा की आज 95वीं जयंती है. उत्तराखंड के विभूषण सुंदरलाल बहुगुणा की जयंती पर उन्हें याद करते उन्हें नमन किया है.

सुंदर लाल बहुगुणा ने अपने जीवनकाल में सदियों पुरानी प्रकृति के साथ रहने की रीति को जिंदा रखा. उनकी सादगी और दया भाव भुलाए नहीं जा सकते हैं. टिहरी से करीब 1,800 किलोमीटर दूर स्थित गढ़चिरौली में उनकी उपस्थिति ने इस आंदोलन में जोश भर दिया था। चिपको आंदोलन को लेकर जब उनसे एक साक्षात्कार में पूछा गया था कि पेड़ों को बचाने के लिए आपके मन में यह नवोन्मेषी विचार कैसे आया, तो उन्होंने जो कुछ कहा उसमें उनके जीवन का सार नजर आता है।

उन्होंने काव्यात्मक जवाब देते हुए कहा, क्या है जंगल का उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार हैं जीने के आधार। इसका अर्थ है कि वनों ने हमें शुद्ध मिट्टी, पानी और हवा दी है, जो कि जीवन के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने बताया था कि चिपको आंदोलन मूलतः पहाड़ की महिलाओं का शुरू किया आंदोलन था। ये महिलाएं नारा लगाती थीं, लाठी गोली खाएंगे, अपने पेड़ बचाएंगे। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा की. उन्होंने इसे यह कहकर लेेने से इंकार कर दिया कि जब तक पेड़ कटते रहेंगे मैं यह सम्मान नहीं ले सकता. हालांकि उनके काम को देखते हुये उन्हें प्रतिष्ठित जमनालाल पुरस्कार, शेर-ए-कश्मीर, राइट लाइवलीवुड पुरस्कार, सरस्वती सम्मान, आईआईटी से मानद डाक्टरेट, पहल सम्मान, गांधी सेवा सम्मान, सांसदों के फोरम ने सत्यपाल मित्तल अवार्ड और भारत सरकार ने पदविभूषण से सम्मानित किया.

इन पुरस्कारों के तो वे हकदार थे ही, लेकिन सबसे संतोष की बात यह है कि हमारी पीढ़ी के लोगों ने उनके सान्निध्य में हिमालय और पर्यावरण की हिफाजत की जिम्मेदारियों को उठाने वाले एक समाज को बनते-खड़े होते देखा है. यही कारण है कि उन्हें पर्यावरण का ‘गांधी’ भी कहा जाता है.सुंदरलाल बहुगुणा जी अवॉर्ड और सम्मानों से कहीं ऊपर थे उत्तराखंड सरकार ने पर्यावरणविद स्वर्गीय सुंदर लाल बहुगुणा की स्मृति में प्रकृति एवं पर्यावरण पुरस्कार के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई है दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न जाने-माने पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा को मरणोपरांत मांग की है.

गौरतलब है कि, स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले चुके स्व. सुंदरलाल बहुगुणा का कद अपने जीवनकाल में ही पर्यावरण क्षेत्र में किये गए कामों की बदौलत एक खासे ऊंचे मकाम पर पहुंच चुका था। जीवनपर्यंत गांधीवादी विचारधारा को प्रफुल्लित करते रहे बहुगुणा जैसे विराट व्यक्तित्व में भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक दिलचस्पी न होना स्वभाविक बात थी। वैसे भी शुरुआती दिनों में स्व. बहुगुणा काँग्रेस से जुड़े रहे थे। हालांकि बाद में वह काँग्रेस से विरक्त होकर स्वतन्त्र रूप से पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत रहे।

मृत्यु से ढाई महीने बाद भी उनकी मिलने वाली पेंशन पत्नी को स्थानांतरित नहीं हो पाई है। इस शर्मनाक वाकये का खुलासा स्वर्गीय बहुगुणा के बेटे राजीवनयन बहुगुणा ने अपनी एफबी वॉल पर किया था। उत्तराखंड के जाने माने पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा की स्मृति में उत्तराखंड में सुंदर लाल बहुगुणा प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। राज्यपाल ने इसके लिए स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसके अंतर्गत प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किये गये महत्वपूर्ण योगदान, उसके प्रभाव, पर्यावरण की सुरक्षा एवं उसके समग्र सुधार के सम्बन्ध में किये गये उत्कृष्ट, सराहनीय कार्यों के लिए वर्ष 2023 से प्रति वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून के अवसर पर विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे। 

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