डोईवाला, (प्रियांशु सक्सेना)। जिन खेतों में कभी परंपरागत फसलें उगाई जाती थीं, आज वहीं से यूरोपीय देशों के लिए जैविक मसालों और हर्ब्स की आपूर्ति हो रही है। डोईवाला की धरती पर उग रहे ऑर्गेनिक हर्ब्स व मसालों की खुशबू अब देश की सीमाएं लांघकर यूरोप के किचन तक पहुंच चुकी है। यूं तो भारत प्राचीन काल से ही मसालों का वैश्विक केंद्र रहा है। इतिहास गवाह है कि भारतीय मसालों ने दुनिया को अपनी ओर आकर्षित किया है। दुनिया में मसालों की सर्वाधिक किस्में उगाने वाला देश हिंदुस्तान है और वैश्विक मसाला उत्पादन में अग्रणी स्थान रखता है।
किसी भी व्यंजन को विशिष्ट स्वाद और पहचान देने में मसालों एवं हर्ब्स की अहम भूमिका होती है। इसी पहचान के साथ आज डोईवाला के ऑर्गेनिक मसाले और हर्ब्स अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहे हैं। इस उपलब्धि के पीछे स्थानीय किसान परमजीत सिंह काकू की मेहनत, धैर्य और दूरदर्शी सोच है।उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो गांव से वैश्विक बाजार तक का सफर तय किया जा सकता है। जैविक पद्धति से उगाए गए ये मसाले यूरोपीय देशों में निर्यात होकर न केवल किसान की आर्थिकी को मजबूती दे रहे हैं बल्कि देश का नाम भी रोशन कर रहे हैं। विकासखंड डोईवाला के मारखम ग्रांट ग्राम पंचायत के धर्मुचक गांव निवासी किसान परमजीत सिंह काकू ने वर्ष 2000 में परंपरागत खेती के साथ-साथ मसालों और विदेशी हर्ब्स की जैविक खेती पर ध्यान देना शुरू किया था। वर्तमान में वह लगभग 25 बीघा भूमि में धनिया, पार्सले, डिल (सोया), सेज, बेसिल, मिंट, मार्जरम, ऑरिगेनो और थाइम जैसी नकदी फसलों की खेती कर रहे हैं। खास बात यह है कि इन फसलों की तीन महीने में कटाई हो जाती है और साल में दो से तीन बार उत्पादन मिलता है। प्रति बीघा औसतन 2.5 से 3 टन तक ताज़ी विदेशी हर्ब्स की उपज मिलने से यह खेती पारंपरिक अनाज की तुलना में कहीं अधिक लाभकारी साबित हो रही है। किसान परमजीत सिंह काकू ने बताया कि उनकी खेती लालतप्पड़ स्थित एक कंपनी के साथ अनुबंध के तहत होती है। कंपनी उन्हें क्षेत्र और मांग के अनुसार बीज उपलब्ध कराती है तथा फसल की खरीद की गारंटी भी देती है। तय दर पर खरीद होने से किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव की चिंता नहीं रहती। उन्होंने बताया कि कंपनी में प्रोसेसिंग के बाद इन जैविक मसालों और विदेशी हर्ब्स को यूरोपीय देशों में निर्यात किया जाता है। अक्टूबर माह में बुवाई के बाद दिसंबर और जनवरी में पहली फसल मिल जाती है, जबकि दूसरी फसल भी शीघ्र तैयार हो जाती है। पूरी तरह जैविक उत्पादन होने के कारण इसमें श्रमिकों की आवश्यकता भी अपेक्षाकृत कम पड़ती है। किसान परमजीत सिंह का कहना है कि जैविक खेती में रसायनों का प्रयोग नहीं होता, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है। उनका मानना है कि किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए परंपरागत खेती से हटकर जैविक मसालों और विदेशी हर्ब्स की खेती अपनाना समय की जरूरत है। विदेशों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।












